Thursday, August 15, 2013

बेटी तो दो कुलों को पवित्र करती है ...

बेटी तो दो कुलों को पवित्र करती है ...

जब सीता जी की विदा का समय आया तो सुनयना जी रोती जाती है और उपदेश करती जा रही थी,- 

"सासु ससुर गुर सेवा करेहू, 
पति रुख लखि आयसु अनुसरेहू, 

अति सनेह बस सखी सयानीं ,
नारि धरम सिखावहिं मृदु बानी"

अर्थात - सास ससुर और गुरु की सेवा करना ,
पति रुख देखकर उनकी आज्ञा का पालन करना सयानी सखियाँ अत्यंत स्नेह के वश कोमल वाणी से स्त्रियों के धर्म सिखलाती है.

यहाँ एक बड़ी सुन्दर बात सुनयना जी ने कही -

"पति रुख आयसु अनुसरेहू"

अर्थात पति का रुख देखकर व्यवहार करना, जिस व्यवहार से पति प्रसन्न हो वही करना,और सीता जी ने इस बात को अंतिम समय तक गाँठ बांधकर रखा और निभाया.

जब सीता जी को दूसरी बार वनवास हुआ (एक बार श्री राम जी के साथ १४ वर्ष का और दूसरी बार श्री राम जी ने वनवास दिया) उस समय सीता जी ८ माह गर्भवती थी लव कुश गर्भ में थे.

जानकी जी भगवान से कह सकती थी प्रभु क्या मेरा सारा जीवन अग्नि परीक्षा में जायेगा,
आपने जिस व्यक्ति के मुख से ऐसा मेरे बारे में सुना आप उसे बुलाए, उसने ऐसा कैसे कह दिया.

प्रभु! मुझे मालूम है राजा बनते समय आपने शपथ ली थी - प्रजा की प्रसन्नता के लिए यदि मुझे जानकी को त्यागना पड़े तो त्याग दूँगा.

पर सीता जी कह सकती थी आपका तेज मेरे गर्भ में है, आठ मास हो चुके है केवल एक मास ही शेष है, उन्हें आपके चरणों में अर्पण कर मै चलि जाऊँगी, ऐसे में तो कोई मजदूर भी अपनी पत्नी को घर से नहीं निकालता.

पर जानकी जी एक शब्द भी नहीं बोली, माँ की बात याद आ गई, आज पति का रुख मेरे विपरीत हो गया है, यदि मुझे वनवास भी मिला तो क्या.!

वे मौन रही और रोई भी नहीं, प्रणाम करके चली गई.

दूसरी बात सुनयनाजी ने कही - बेटी जानकी ! गृहस्थ धर्म की गंगा में अनेक सुख दुःख के क्षण आयेगे, पर जैसे गंगा में अनेक नदी नाले मिलते है पर गंगा कभी मैली नहीं होती, इसी प्रकार अवसर आने पर भूखे रह लेना,फटे पुराने वस्त्रपहन लेना पर परिवार के रोने को लेकर किसी पडोस में नहीं जाना.

अवधपुर और जनकपुर दो कुलों की लाज मै तेरे पल्ले से बाँध रही हूँ, कोई भी कदम उठने से पहले, सोच लेना, अपने बाबू जी की याद कर लेना, मेरे पिता सुनेगे तो क्या कहेगे?

और सुनयना जी की इस बात को भी जानकी जी ने बहुत अच्छे से निभाया.

जब श्री राम जी और सीता जी वनवास के समय चित्रकूट में थे उस समय जनकजी रानी सहित चित्रकूट में गए -

"तापस बेष जनक सिय देखी भयउ प्रेमु परितोषु बिसेषी,
पुत्रि पबित्र किये कुल दोऊ
सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ,"

अर्थात - सीता जो को तपस्विनी वेष में देखकर जनकजी को विशेष प्रेम और संतोष हुआ,उन्होंने कहा - बेटी ! तूने दोनों कुल पवित्र कर दिए, तेरे निर्मल यश से सारा जगत उज्जवल हो रहा है.

ऐसा सब कोई कहते है.
"जिति सुरसरि किरति सरि तोरी,
गवनु कीन्ह बिधि अंड करोरी
गंग अवनि थल तीनि बड़ेरे,
एहिं किए साधु समाज धनेरे"

अर्थात - तेरी कीर्ति रूपी नदी देव नदीगंगा को भी जीतकर (जो एक ही ब्रह्माण्ड में बहती है )करोडो ब्रह्मांडो में बह चली है गंगा जी ने तो पृथ्वी पर तीन ही स्थानों (हरिद्वार , प्रयागराज और गंगासागर)को बड़ा बनाया है पर तेरी इस कीर्ति रूपी नदी ने तो अनेको संत समाज रूपी तीर्थ स्थान बना दिए है...

Jai Hind! Jai Bharat!

Swatantra Hua.. Jab Ye Jantantra..
Us Samay... Neela Tha Neelamber...
Aur Na Hi Neelam Thi.. Ye Nyari Jaan..
Kheli Thi Khoon Ki Holi Jisne...
Hua Tha.. Vasundhra Par Kurbaan...
Jiski Ibadat Se, Aaj Ki Hai Jo Shaan..
Kaafiro' Ne Bna Diya UsKo Haraam..
Jinhone.. Khoon Ka Tilak Lagaya..
Aaj Dharti Unse Hai Anjaan..
Ro' Rahi Hai.. 'Kahan Ho Tum'
Lag Raha.. Saara Jag Veeraan...
Dekh Kr Loktantra Ki Nirmam Hatya..
Roe.. Rahe.. Aaj Wo Kurbaan...
In Saare.. Dukh Ko Alag Kara Kar..
Karte Hain.. Unhe Hum Pranaam...
Chale Gaye Aaj Wo Farishte..
Jinhe Kabhi Kehte The Insaan..

- shiva...
Jai Hind! Jai Bharat!

श्रीमद् भगवदगीता माहात्म्य श्री गणेशाय नमः

श्रीमद् भगवदगीता माहात्म्य
श्री गणेशाय नमः 

धरोवाच

भगवन्परमेशान भक्तिरव्यभिचारिणी
प्रारब्धं भुज्यमानस्य कथं भवति हे प्रभो।।1।।

श्री पृथ्वी देवी ने पूछाः

हे भगवन ! हे परमेश्वर ! हे प्रभो ! प्रारब्धकर्म को भोगते हुए मनुष्य को एकनिष्ठ भक्ति कैसे प्राप्त हो सकती है?(1)

श्रीविष्णुरुवाच

प्रारब्धं भुज्यमानो हि गीताभ्यासरतः सदा।
स मुक्तः स सुखी लोके कर्मणा नोपलिप्यते।।2।।

श्री विष्णु भगवान बोलेः

प्रारब्ध को भोगता हुआ जो मनुष्य सदा श्रीगीता के अभ्यास में आसक्त हो वही इस लोक में मुक्त और सुखी होता है तथा कर्म में लेपायमान नहीं होता।(2)

महापापादिपापानि गीताध्यानं करोति चेत्।
क्वचित्स्पर्शं न कुर्वन्ति नलिनीदलमम्बुवत्।।3।।

जिस प्रकार कमल के पत्ते को जल स्पर्श नहीं करता उसी प्रकार जो मनुष्य श्रीगीता का ध्यान करता है उसे महापापादि पाप कभी स्पर्श नहीं करते।(3)

गीतायाः पुस्तकं यत्र पाठः प्रवर्तते।
तत्र सर्वाणि तीर्थानि प्रयागादीनि तत्र वै।।4।।

जहाँ श्रीगीता की पुस्तक होती है और जहाँ श्रीगीता का पाठ होता है वहाँ प्रयागादि सर्व तीर्थ निवास करते हैं।(4)
सर्वे देवाश्च ऋषयो योगिनः पन्नगाश्च ये।

गोपालबालकृष्णोsपि नारदध्रुवपार्षदैः।।
सहायो जायते शीघ्रं यत्र गीता प्रवर्तते।।5।।

जहाँ श्रीगीता प्रवर्तमान है वहाँ सभी देवों, ऋषियों, योगियों, नागों और गोपालबाल श्रीकृष्ण भी नारद, ध्रुव आदि सभी पार्षदों सहित जल्दी ही सहायक होते हैं।(5)

यत्रगीताविचारश्च पठनं पाठनं श्रुतम्।
तत्राहं निश्चितं पृथ्वि निवसामि सदैव हि।।6।।

जहाँ श्री गीता का विचार, पठन, पाठन तथा श्रवण होता है वहाँ हे पृथ्वी ! मैं अवश्य निवास करता हूँ। (6)

गीताश्रयेऽहं तिष्ठामि गीता मे चोत्तमं गृहम्।
गीताज्ञानमुपाश्रित्य त्रींल्लोकान्पालयाम्यहंम्।।7।।

मैं श्रीगीता के आश्रय में रहता हूँ, श्रीगीता मेरा उत्तम घर है और श्रीगीता के ज्ञान का आश्रय करके मैं तीनों लोकों का पालन करता हूँ।(7)

गीता मे परमा विद्या ब्रह्मरूपा न संशयः।
अर्धमात्राक्षरा नित्या स्वनिर्वाच्यपदात्मिका।।8।।

श्रीगीता अति अवर्णनीय पदोंवाली, अविनाशी, अर्धमात्रा तथा अक्षरस्वरूप, नित्य, ब्रह्मरूपिणी और परम श्रेष्ठ मेरी विद्या है इसमें सन्देह नहीं है।(8)

चिदानन्देन कृष्णेन प्रोक्ता स्वमुखतोऽर्जुनम्।
वेदत्रयी परानन्दा तत्त्वार्थज्ञानसंयुता।।9।।

वह श्रीगीता चिदानन्द श्रीकृष्ण ने अपने मुख से अर्जुन को कही हुई तथा तीनों वेदस्वरूप, परमानन्दस्वरूप तथा तत्त्वरूप पदार्थ के ज्ञान से युक्त है।(9)

योऽष्टादशजपो नित्यं नरो निश्चलमानसः।
ज्ञानसिद्धिं स लभते ततो याति परं पदम्।।10।।

जो मनुष्य स्थिर मन वाला होकर नित्य श्री गीता के 18 अध्यायों का जप-पाठ करता है वह ज्ञानस्थ सिद्धि को प्राप्त होता है और फिर परम पद को पाता है।(10)

पाठेऽसमर्थः संपूर्णे ततोऽर्धं पाठमाचरेत्।
तदा गोदानजं पुण्यं लभते नात्र संशयः।।11।।

संपूर्ण पाठ करने में असमर्थ हो तो आधा पाठ करे, तो भी गाय के दान से होने वाले पुण्य को प्राप्त करता है, इसमें सन्देह नहीं।(11)

त्रिभागं पठमानस्तु गंगास्नानफलं लभेत्।
षडंशं जपमानस्तु सोमयागफलं लभेत्।।12।।

तीसरे भाग का पाठ करे तो गंगास्नान का फल प्राप्त करता है और छठवें भाग का पाठ करे तो सोमयाग का फल पाता है।(12)

एकाध्यायं तु यो नित्यं पठते भक्तिसंयुतः।
रूद्रलोकमवाप्नोति गणो भूत्वा वसेच्चिरम।।13।।

जो मनुष्य भक्तियुक्त होकर नित्य एक अध्याय का भी पाठ करता है, वह रुद्रलोक को प्राप्त होता है और वहाँ शिवजी का गण बनकर चिरकाल तक निवास करता है।(13)

अध्याये श्लोकपादं वा नित्यं यः पठते नरः।
स याति नरतां यावन्मन्वन्तरं वसुन्धरे।।14।।

हे पृथ्वी ! जो मनुष्य नित्य एक अध्याय एक श्लोक अथवा श्लोक के एक चरण का पाठ करता है वह मन्वंतर तक मनुष्यता को प्राप्त करता है।(14)

गीताया श्लोकदशकं सप्त पंच चतुष्टयम्।
द्वौ त्रीनेकं तदर्धं वा श्लोकानां यः पठेन्नरः।।15।।
चन्द्रलोकमवाप्नोति वर्षाणामयुतं ध्रुवम्।
गीतापाठसमायुक्तो मृतो मानुषतां व्रजेत्।।16।।

जो मनुष्य गीता के दस, सात, पाँच, चार, तीन, दो, एक या आधे श्लोक का पाठ करता है वह अवश्य दस हजार वर्ष तक चन्द्रलोक को प्राप्त होता है। गीता के पाठ में लगे हुए मनुष्य की अगर मृत्यु होती है तो वह (पशु आदि की अधम योनियों में न जाकर) पुनः मनुष्य जन्म पाता है।(15,16)

गीताभ्यासं पुनः कृत्वा लभते मुक्तिमुत्तमाम्।
गीतेत्युच्चारसंयुक्तो म्रियमाणो गतिं लभेत्।।17।।

(और वहाँ) गीता का पुनः अभ्यास करके उत्तम मुक्ति को पाता है। 'गीता' ऐसे उच्चार के साथ जो मरता है वह सदगति को पाता है।

गीतार्थश्रवणासक्तो महापापयुतोऽपि वा।
वैकुण्ठं समवाप्नोति विष्णुना सह मोदते।।18।।

गीता का अर्थ तत्पर सुनने में तत्पर बना हुआ मनुष्य महापापी हो तो भी वह वैकुण्ठ को प्राप्त होता है और विष्णु के साथ आनन्द करता है।(18)

गीतार्थं ध्यायते नित्यं कृत्वा कर्माणि भूरिशः।
जीवन्मुक्तः स विज्ञेयो देहांते परमं पदम्।।19।।

अनेक कर्म करके नित्य श्री गीता के अर्थ का जो विचार करता है उसे जीवन्मुक्त जानो। मृत्यु के बाद वह परम पद को पाता है।(19)

गीतामाश्रित्य बहवो भूभुजो जनकादयः।
निर्धूतकल्मषा लोके गीता याताः परं पदम्।।20।।

गीता का आश्रय करके जनक आदि कई राजा पाप रहित होकर लोक में यशस्वी बने हैं और परम पद को प्राप्त हुए हैं।(20)

गीतायाः पठनं कृत्वा माहात्म्यं नैव यः पठेत्।
वृथा पाठो भवेत्तस्य श्रम एव ह्युदाहृतः।।21।।

श्रीगीता का पाठ करके जो माहात्म्य का पाठ नहीं करता है उसका पाठ निष्फल होता है और ऐसे पाठ को श्रमरूप कहा है।(21)

एतन्माहात्म्यसंयुक्तं गीताभ्यासं करोति यः।
स तत्फलमवाप्नोति दुर्लभां गतिमाप्नुयात्।।22।।

इस माहात्म्यसहित श्रीगीता का जो अभ्यास करता है वह उसका फल पाता है और दुर्लभ गति को प्राप्त होता है।(22)

सूत उवाच

माहात्म्यमेतद् गीताया मया प्रोक्तं सनातनम्।
गीतान्ते पठेद्यस्तु यदुक्तं तत्फलं लभेत्।।23।।

सूत जी बोलेः

गीता का यह सनातन माहात्म्य मैंने कहा। गीता पाठ के अन्त में जो इसका पाठ करता है वह उपर्युक्त फल प्राप्त करता है।(23)

इति श्रीवाराहपुराणे श्रीमद् गीतामाहात्म्यं संपूर्णम्।
इति श्रीवाराहपुराण में श्रीमद् गीता माहात्म्य संपूर्ण।।

*** जय श्रीहरि ***

|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय || || श्री हरी || श्रीमद्भागवतमहात्म्य पहला अध्याय

|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||
|| श्री हरी ||

श्रीमद्भागवतमहात्म्य

पहला अध्याय

सच्चिदानंदस्वरुप भगवान श्रीकृष्णको हम नमस्कार करते हैं, जो जगतकी उत्पत्ति, स्थिथि और विनाशके हेतु तथा आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक – तीनो प्रकारके तापोंका नाश करनेवाले हैं | (१)
जिस समय श्रीशुकदेवजीका यज्ञोपवीत संस्कार भी नहीं हुआ था तथा लौकिक-वैदिक कर्मोके अनुष्ठानका अवसर भी नहीं आया था, तभी उन्हें अकेले ही सन्यास लेनेके लिए घरसे जाते देखकर उनके पिता व्यासजी विरहसे कातर होकर पुकारने लगे – ‘बेटा! बेटा! तुम कहाँ जा रहे हो?’ उस समय वृक्षों ने तन्मय होनेके कारण श्रीशुकदेवजीकी ओरसे उत्तर दिया था | ऐसे सर्वभूत ह्रदयस्वरुप श्रीशुकदेवमुनिको मैं नमस्कार करता हूँ | (२)
एक बार भगवतकथामृतका रसास्वादन करनेमें कुशल मुनिवर शौनकजीने ‍‌‍नैमिषारन्य क्षेत्रमें विराजमान महामति सूतजीको नमस्कार करके उनसे पूछा | (३)
शौनकजी बोले – सूतजी! आपका ज्ञान अज्ञानान्धकारको नष्ट करनेके लिए करोड़ों सूर्योंके समान है | आप हमारे कानो के लिए रसायन – अमृतस्वरुप सारगर्भित कथा कहिये | (४) भक्ति, ज्ञान और वैराग्यसे प्राप्त होनेवाले महान विवेककी वृद्धि किस प्रकार होती है तथा वैष्णवलोग किस तरह इस माया-मोहसे अपना पीछा छुड़ाते हैं ? (५) इस घोर कलिकालमें जीव प्रायः आसुरी स्वाभावके हो गए हैं, विविध क्लेशोंसे आक्रान्त इन जीवोंको शुद्ध (दैवीशक्तिसंपन्न) बनानेका सर्वश्रेष्ठ उपाय क्या है ? (६)
सूतजी! आप हमें कोई ऐसा शाश्वत साधन बताइये, जो सबसे अधिक कल्याणकारी तथा पवित्र करनेवालोंमें भी पवित्र हो तथा जो भगवान श्रीकृष्णकी प्राप्ति करा दे | (७) चिन्तामणि केवल लौकिक सुख दे सकती है और कल्पवृक्ष अधिक से अधिक स्वर्गीय संपत्ति दे सकता है; परन्तु गुरुदेव प्रसन्न होकर भगवानका योगीदुर्लभ नित्य वैकुण्ठ धाम दे देते हैं | (८)
सूतजीने कहा – शौनकजी! तुम्हारे ह्रदयमें भगवान का प्रेम है; इसलिए मैं विचारकर तुम्हे सम्पूर्ण सिद्धांतोंका निष्कर्ष सुनाता हूँ, जो जन्म-मृत्युके भयका नाश कर देता है | (९) जो भक्तिके प्रवाह को बढ़ाता है और भगवान श्रीकृष्णकी प्रसन्नताका प्रधान कारण हैं, मैं तुम्हे वह साधन बतलाता हूँ; उसे सावधान होकर सुनो | (१०) श्रीशुकदेवजीने कलियुगमें जीवोंके कालरूपी सर्पके मुखका ग्रास होनेके त्रासका आत्यंतिक नाश करनेके लिये श्रीमद्भागवतशास्त्रका प्रवचन किया है | (११) मन की शुधिके लिए इससे बढ़कर कोई साधन नहीं है | जब मनुष्यके जन्म-जन्मान्तरका पुण्य उदय होता है, तभी उसे इस भागवतशास्त्रकी प्राप्ति होती है | (१२) जब शुकदेवजी राजा परीक्षितको यह कथा सुनानेके लिए सभा में विराजमान हुए, तब देवतालोग उनके पास अमृतका कलश लेकर आये | (१३) देवता अपना काम बनानेमें बड़े कुशल होते हैं; अतः यहाँ भी सबने शुकदेवमुनिको नमस्कार करके कहा, ‘आप यह अमृत लेकर बदलेमें हमें कथामृत का दान दीजिये | (१४) इस प्रकार परस्पर विनिमय (अदला-बदली) हो जानेपर राजा परीक्षित अमृतका पान करें और हम सब श्रीमद्भागवतरूप अमृत का पान करेंगे |’ (१५) इस संसार में कहाँ काँच और कहा महामुल्य मणि तथा कहाँ सुधा और कहाँ कथा ? श्रीशुकदेवजीने (यह सोंचकर) उस समय देवताओंकी हंसी उड़ा दी | (१६) उन्हें भक्तिशुन्य (कथाका अनधिकारी) जानकार कथामृतका दान नहीं किया | इस प्रकार यह श्रीमद्भागवतकी कथा देवताओंको भी दुर्लभ है | (१७)
पूर्वकालमें श्रीमद्भागवतके श्रवणसे ही राजा परीक्षितकी मुक्ति देखकर ब्रह्माजीको भी बड़ा आश्चर्य हुआ था | उन्होंने सत्यलोकमें तराजू बांधकर सब साधनों को तौला | (१८) अन्य सभी साधन तौलमें हल्के पड़ गए, अपने महत्वके कारण भागवत ही सबसे भारी रहा | यह देखकर सभी ऋषियोंको बड़ा विस्मय हुआ | (१९) उन्होंने कलियुगमें इस भगवद्रूप भागवतशास्त्रको ही पढने-सुननेसे तत्काल मोक्ष देनेवाला निश्च्रय किया | (२०) सप्ताह विधिसे श्रवण करनेपर यह निश्चय भक्ति प्रदान करता है | पूर्वकालमें इसे दयापरायण सनकादीने देवर्षि नारदको सुनाया था | (२१) यद्दपि देवर्षिने पहले ब्रह्माजीके मुखसे इसे श्रवण कर लिया था, तथापि सप्ताहश्रवणकी विधि तो उन्हें सनकादीने ही बतायी थी | (२२)
शौनकजीने पूछा – सांसारिक प्रपंचोसे मुक्त एवं विचरणशील नारदजीका सनकादीके साथ संयोग कहाँ हुआ और विधि-विधानके श्रवणमें उनकी प्रीती कैसे हुई ? (२३)
सूतजीने कहा – अब मैं तुम्हे वह भक्तिपूर्ण कथानक सुनाता हूँ, जो की श्रीशुकदेवजीने मुझे अपना अनन्य शिष्य जानकार एकांतमें सुनाया था | (२४) एक दिन विशालापूरीमें वे चारों निर्मल ऋषि सत्संगके लिए आये | वहां उन्होंने नारदजीको देखा | (२५)
सनकादिने पूछा – ब्रहमन! आपका मुख उदास क्यों हो रहा है ? आप चिंतातुर कैसे हैं ? इतनी जल्दी-जल्दी आप कहाँ जा रहे हैं ? और आपका आगमन कहाँसे हो रहा है ? (२६) इस समय तो आप उस पुरुषके समान व्याकुल जान पड़ते हैं जिसका सारा धन लुट गया हो; आप-जैसे आसक्तिरहित पुरुषोंके लिए यह उचित नहीं है | इसका कारण बताइये | (२७)
नारदजीने कहा – मैं सर्वोत्तम लोक समझकर प्रथ्वीमें आया था | यहाँ पुष्कर, प्रयाग, काशी, गोदावरी (नासिक), हरिद्वार, कुरुक्षेत्र, श्रीरंग और सेतुबांध आदि कई तीर्थोंमें मैं इधर-उधर विचरता रहा; किन्तु मुझे कहीं भी मनको संतोष देनेवाली शान्ति नहीं मिली | इस समय अधर्मके सहायक कलियुगने सारी पृथ्वीको पीड़ित कर रखा है | (२८-३०) अब यहाँ सत्य, तप, शौच (बाहर-भीतरकी पवित्रता), दया, दान आदि कुछ भी नहीं है | बेचारे जीव केवल अपना पेट पालने में लगे हुए हैं; वे असत्यभाशी, आलसी, मन्दबुद्धि, भाग्यहीन, उपद्रवग्रस्त हो गए हैं | जो साधू-संत कहे जाते हैं, वे पुरे पाखंडी हो गए हैं; देखने में तो वे विरक्त हैं; किन्तु स्त्री-धन आदि सभीका परिग्रह करते हैं | घरोंमें स्त्रियोंका राज्य है, साले सलाहकार बने हुए हैं, लोभसे लोग कन्या विक्रय करते हैं और स्त्री-पुरुषों में कलह मचा रहता है | (३१-३३) महात्माओंके आश्रम, तीर्थ और नदियोंपर यवनों (विधर्मियोंका) अधिकार हो गया है; उन दुष्टोंने बहुत से देवालय भी नष्ट कर दिए हैं | (३४) इस समय यहाँ न कोई योगी है न सिद्ध है; न ज्ञानी है और न सत्कर्म करनेवाला ही है | सारे साधन इस समय कलिरूप दावानलसे जलकर भस्म हो गये हैं | (३५) इस कलियुगमें सभी देशवासी बाजारोंमें अन्न बेचने लगे हैं, ब्राह्मणलोग पैसा लेकर वेद पढ़ाते हैं और स्त्रियाँ वैश्यावृत्तिसे निर्वाह करने लगी हैं | (३६)
इस तरह कलियुगके दोष देखता और पृथ्वीपर विचरता हुआ मैं यमुनाजीके तटपर पहुंचा, जहाँ भगवान श्रीकृष्णाकी अनेकों लीलाएँ हो चुकी हैं | (३७) मुनिवरो! सुनिए, वहाँ मैंने एक बड़ा आश्चर्य देखा | वहाँ एक युवती स्त्री खिन्न मनसे बैठी थी | (३८) उसके पास दो वृद्ध पुरुष अचेत अवस्थामें पड़े जोर जोरसे साँस ले रहे थे | वह तरुणी उनकी सेवा करती हुई कभी उन्हें चेत करनेका प्रयत्न करती और कभी उनके आगे रोने लगती थी | (३९) वह अपने शरीरके रक्षक परमात्माको दासों दिशाओंमें देख रही थी | उसके चारों ओर सैकड़ों स्त्रियाँ उसे पंखा झल रही थी और बार बार समझाती जाती थी | (४०) दूरसे यह सब चरित देखकर मैं कुतूहलवश उसके पास चला गया | मुझे देखकर वह युवती खाड़ी हो गयी और बड़ी व्याकुल होकर कहने लगी | (४१)
युवतीने कहा – अजी महात्माजी! क्षणभर ठहर जाइये और मेरी चिंता को भी नष्ट कर दीजिये | आपका दर्शन तो संसार के सभी पापोंको सर्वथा नष्ट कर देनेवाला है | (४२) आपके वचनोंसे मेरे दुःखकी बहुत कुछ शान्ति हो जायगी | मनुष्यका जब बड़ा भाग्य होता है, तभी आपके दर्शन हुआ करते हैं | (४३)
नारदजी कहते हैं – तब मैंने उस स्त्रीसे पूछा – देवी! तुम कौन हो ? ये दोनों पुरुष तुम्हारे क्या होते हैं ? और तुम्हारे पास ये कमलनयनी देवियाँ कौन हैं ? तुम हमें विस्तारसे अपने दुःखका कारण बताओ | (४४)
युवतीने कहा – मेरा नाम भक्ति है, ये ज्ञान और वैराग्य नामक मेरे पुत्र हैं | समयके फेरसे ही ये ऐसे जर्जर हो गए हैं | (४५) ये देवियाँ गंगाजी आदि नदियाँ हैं | ये सब मेरी सेवा करने के लिए ही आई हैं | इस प्रकार साक्षात् देवियोंके द्वारा सेवित होनेपर भी मुझे सुख शान्ति नहीं है | (४६) तपोधन! अब ध्यान देकर मेरा वृतान्त सुनिए | मेरी कथा वैसे तो प्रसिद्ध है, फिर भी उसे सुनकर आप मुझे शान्ति प्रदान करें | (४७)
मैं द्रविड़ देश में उत्पन्न हुई, कर्णाटकमें बढ़ी, कहीं कहीं महाराष्ट्रमें सम्मानित हुई; किन्तु गुजरातमें मुझको बुढ़ापेने आ घेरा | (४८) वहाँ घोर कलियुगके प्रभावसे पाखंडियोंने मुझे अंग-भंग कर दिया | चिरकालतक यह अवस्था रहनेके कारण मैं अपने पुत्रोंके साथ दुर्बल और निस्तेज हो गयी | (४९) अब जबसे मैं वृन्दावन आई, तबसे पुनः परम सुंदरी सुरुप्वती नवयुवती हो गयी हूँ | (५०) किन्तु सामने पड़े हुए ये दोनों मेरे पुत्र थके-मांदे दुखी हो रहे हैं | अब मैं यह स्थान छोड़कर अन्यत्र जाना चाहती हूँ | (५१) ये दोनों बूढ़े हो गये हैं – इसी दुःखसे मैं दुखी हूँ | मैं तरुणी क्यों और ये दोनों मेरे पुत्र बूढ़े क्यों ? (५२) हम तीनो साथ साथ रहनेवाले हैं | फिर यह विपरीतता क्यों? होना तो यह चाहिये की माता बूढी हो और पुत्र तरुण | (५३) इसीसे मैं आश्चर्यचकित चितसे अपनी इस अवस्थापर शोक करती रहती हूँ | आप परम बुद्धिमान एवं योगनिधि है; इसका क्या कारण हो सकता है, बताइये ? (५४)
नारदजीने कहा – साध्वी! मैं अपने ह्रदयमें ज्ञानदृष्टिसे तुम्हारे सम्पूर्ण दुःखका कारण देखता हूँ, तुम्हे विषाद नहीं करना चाहिये | श्रीहरि तुम्हारा कल्याण करेंगे | (५५)
सूतजी कहते हैं – मुनिवर नारदजीने एक क्षणमें ही उसका कारण जानकर कहा | (५६)
नारदजीने कहा – देवी! सावधान होकर सुनो | यह दारुण कलियुग है | इसीसे इस समय सदाचार योगमार्ग और ताप आदि सभी लुप्त हो गए हैं | (५७) लोग शठता और दुष्कर्ममें लगकर अघासुर बन रहे हैं | संसारमें जहाँ देखो, वहीँ सतपुरुष दुःखसे म्लान हैं और दुष्ट सुखी हो रहे हैं | इस समय जिस बुद्धिमान पुरुषका धैर्य बना रहे, वही बड़ा ज्ञानी या पंडित है | (५८) पृथ्वी क्रमशः प्रतिवर्ष शेषजीके लिए भाररूप होती जा रही है | अब यह छूने योग्य तो क्या, देखनेयोग्य भी नहीं रह गयी है और न इसमें कहीं मंगल ही दिखाई देता है | (५९) अब किसीको पुत्रोंके साथ तुम्हारा दर्शन भी नहीं होता | विषयानुरागके कारण अंधे बने हुए जीवोंसे उपेक्षित होकर तुम जर्जर हो रही थी | (६०) वृन्दावनके संयोगसे तुम फिर नवीन तरुणी हो गयी हो | अतः यह वृन्दावनधाम धन्य है, जहाँ भक्ति सर्वत्र नृत्य कर रही है | (६१) परंतु तुम्हारे इन दोनों पुत्रों का यहाँ कोई ग्राहक नहीं है, इसीलिए इनका बुढ़ापा नहीं छूट रहा है | यहाँ इनको कुछ आत्मसुख (भगवतस्पर्शजनित आनन्द) की प्राप्ति होनेके कारण ये सोते-से जान पड़ते हैं | (६२)
भक्तिने कहा – राजा परीक्षितने इस पापी कलियुग को क्यों रहने दिया ? इसके आते ही सब वस्तुओंका सार न जाने कहाँ चला गया ? (६३) करुणामय श्रीहरिसे भी यह अधर्म कैसे देखा जाता है ? मुने! मेरा यह संदेह दूर कीजिये, आपके वचनों से मुझे बड़ी शान्ति मिली है | (६४)
नारदजीने कहा – बाले! यदि तुमने पूछा है, तो प्रेमसे सुनो, कल्याणी! मैं तुम्हे सब बताऊंगा और तुम्हारा दुःख दूर हो जायगा | (६५) जिस दिन भगवान श्रीकृष्ण इस भूलोकको छोड़कर अपने परमधामको पधारे, उसी दिनसे यहाँ सम्पूर्ण साधनोंमें बाधा डालनेवाला कलियुग आ गया | (६६) दिग्विजयके समय रजा परीक्षितकी दृष्टि पड़नेपर कलियुग दीनके समान उनकी शरण में आया | भ्रमर के समान सारग्राही राजाने यह निश्च्रय किया की इसका वध मुझे नही करना चाहिए | (६७) क्योंकि जो फल तपस्या, योग एवं समाधीसे भी नहीं मिलता कलियुगमें वही फल श्रीहरीकीर्तनसे ही भलीभाति मिल जाता है | (६८) इस प्रकार सारहीन होने पर भी उसे इस एक ही दृष्टि से सारयुक्त देखकर उन्होंने कलियुगमें उत्पन्न होनेवाले जीवोंके सुखके लिए ही इसे रहने दिया था | (६९)
इस समय लोगोंके कुकर्ममें प्रवृत होने के कारण सभी वस्तुओंका सार निकल गया है और पृथ्वी के सारे पदार्थ बीजहीन भूसीके समान हो गये हैं | (७०) ब्राह्मण केवल अन्न-धनादिके लोभवश घर घर एवं जन-जनको भागवतकी कथा सुनाने लगे हैं, इसलिए कथाका सार चला गया | (७१) तीर्थोमें नाना प्रकारके अत्यंत घोर कर्म करनेवाले, नास्तिक और नारकी पुरुष भी रहने लगे हैं; इसलिये तीर्थोंका भी प्रभाव जाता रहा | (७२) जिनका चित निरंतर काम, क्रोध, महान लोभ और तृष्णासे तपता रहता है, वे भी तपस्याका ढोंग करने लगे हैं, इसलिये तपका भी सार निकल गया | (७३) मनपर काबू न होनेके कारण एवं शास्त्रका अभ्यास न करनेसे ध्यानयोगका फल मिट गया | (७४) पंडितोंकी यह दशा है की वे अपनी स्त्रियोंके साथ भैंसों की तरह रमण करते हैं; उनमें संतान पैदा करनेकी ही कुशलता पायी जाती है, मुक्तिसाधनमें वे सर्वथा अकुशल हैं | (७५) सम्प्रदायानुसार प्राप्त हुई वैष्णवता भी कहीं देखनेमें नहीं आती | इस प्रकार जगह जगह सभी वस्तुओंका सार लुप्त हो गया है | (७६) यह तो इस युग का स्वभाव ही है इसमें किसीका दोष नहीं है | इसीसे पुण्डरीकाक्ष भगवान बहुत समीप रहते हुए भी यह सब सह रहे हैं | (७७)
सूतजी कहते हैं – शौनकजी! इस प्रकार देवर्षि नारदके वचन सुनकर भक्ति को बड़ा आश्चर्य हुआ; फिर उसने जो कुछ कहा, उसे सुनिये | (७८)
भक्तिने कहा – देवर्षे! आप धन्य हैं! मेरा बड़ा सौभाग्य था, जो आपका समागम हुआ | संसारमें साधुओंका दर्शन ही समस्त सिद्धियोंका परम कारण है | (७१) आपका केवल एक बारका उपदेश धारण कर कयाधुकुमार प्रह्र्लादने मायापर विजय प्राप्त कर ली थी | ध्रुवने भी आपकी कृपासे ही ध्रुवपद प्राप्त किया था | आप सर्वमंगलमय और साक्षात् श्रीब्रह्माजीके पुत्र हैं, मैं आपको नमस्कार करती हूँ | (८०)

*** जय श्रीहरि ***

श्रीमद्भागवतमहात्म्य दूसरा अध्याय भक्तिका दुःख दूर करनेके लिए नारदजी का उघोग

|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||
|| श्री हरी ||
श्रीमद्भागवतमहात्म्य
दूसरा अध्याय
भक्तिका दुःख दूर करनेके लिए नारदजी का उघोग

नारदजीने कहा – बाले! तुम व्यर्थ ही अपनेको क्यों खेदमें डाल रही हो ? अरे! तुम इतनी चिन्तातुर क्यों हो ? भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंका चिंतन करो, उनकी कृपा से तुम्हारा सारा दुःख दूर हो जाएगा | (१) जिन्होंने कौरवोंके अत्याचारसे द्रौपदीकी रक्षा की थी और गोपसुन्दरियोंको सनाथ किया था, वे श्रीकृष्णा कहीं चले थोड़े ही गये हैं | (२) फिर तुम तो भक्ति हो और सदा उन्हें प्राणों से भी प्यारी हो; तुम्हारे बुलानेपर तो भगवान नीचेके घरोंमें भी चले जाते हैं | (३) सत्य, त्रेता और द्वापर – इन तीनो युगोंमें ज्ञान और वैराग्य मुक्तिके साधन थे; किन्तु कलियुगमें तो केवल भक्ति ही ब्रह्मसायुज्य (मोक्ष) की प्राप्ति करानेवाली है | (४) यह सोचकर ही परमानन्दचिन्मुर्ती ज्ञानस्वरुप श्रीहरिने अपने सत्स्वरूपसे तुम्हे रचा है; तुम साक्षात् श्रीकृष्णचंद्रकी प्रिया और परम सुन्दरी हो | (५) एक बार जब तुमने हाँथ जोडकर पूछा था की ‘मैं क्या करूँ ?’ तब भगवानने तुम्हे यही आज्ञा दी थी की ‘मेरे भक्तोंका पोषण करो |’ (६) तुमने भगवानकी वह आज्ञा स्वीकार कर ली; इससे तुमपर श्रीहरि बहुत प्रसन्न हुए और तुम्हारी सेवा करनेके लिए मुक्तिको तुम्हे दासी रूपमें दे दिया और इन ज्ञान-वैराग्यको पुत्रोंके रूपमें | (७) तुम अपने साक्षात् स्वरुपसे वैकुण्ठधाममें ही भक्तों का पोषण करती हो, भूलोकमें तो तुमने उनकी पुष्टिके लिए केवल छायारूप धारण कर रखा है | (८)
तब तुम मुक्ति, ज्ञान और वैराग्यको साथ लिए पृथ्वीतलपर आयीं और सतयुगसे द्वापरपर्यन्त बड़े आनन्दसे रही | (९) कलियुगमें तुम्हारी दासी मुक्ति पाखण्डरूप रोगसे पीड़ित होकर क्षीण होने लगी थी, इसलिए वह तो तुरंत ही तुम्हारी आज्ञासे वैकुण्ठलोकको चली गयी | (१०) इस लोकमें भी तुम्हारे स्मरण करनेसे ही वह आती है और फिर चली जाती है, किन्तु इन ज्ञान-वैराग्यको तुमने पुत्र मानकर अपने पास ही रख छोड़ा है | (११) फिर भी कलियुगमें इनकी उपेक्षा होनेके कारण तुम्हारे ये पुत्र उत्साहहीन और वृद्ध हो गये हैं, फिर भी तुम चिंता न करो, मैं इनके नवजीवनका उपाय सोचता हूँ | (१२) सुमुखी! कलिके समान कोई भी युग नहीं है, इस युगमें मैं तुम्हे घर-घरमें प्रत्येक पुरुषके ह्रदयमें स्थापित कर दूंगा | (१३) देखो, अन्य सब धर्मोको दबाकर और भक्तिविषयक महोत्सवोंको आगे रखकर यदि मैंने लोकमें तुम्हारा प्रचार न किया तो मैं श्रीहरिका दास नहीं | (१४) इस कलियुगमें जो जीव तुमसे युक्त होंगे, वे पापी होनेपर भी बेखटके भगवान् श्रीकृष्णके अभय धामको प्राप्त होंगे | (१५) जिनके ह्रदयमें निरंतर प्रेमरूपिणी भक्ति निवास करती है, वे शुद्धान्तःकरण पुरुष स्वप्नमें भी यमराजको नही देखते | (१६) जिनके ह्रदयमें भक्ति महारानीका निवास है, उन्हें प्रेत, पिशाच, राक्षस य दैत्य आदि स्पर्श करनेमें भी समर्थ नहीं हो सकते | (१७) भगवान् तप, वेदाध्ययन, ज्ञान और कर्म आदि किसी भी साधनसे वशमें नहीं किये जा सकते; वे केवल भक्तिसे ही वाशीभूत होते हैं | इसमें श्रीगोपीजन प्रमाण हैं | (१८) मनुष्योंका सहस्रों जनमके पुण्य-प्रताप से भक्तिमें अनुराग होता है | कलियुगमें केवल भक्ति, केवल भक्ति ही सार है | भक्तिसे तो साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्र सामने उपस्थित हो जाते हैं | (११) जो लोग भक्तिसे द्रोह करते हैं, वे तीनों लोकोंमें दुःख-ही-दुःख पाते हैं | पूर्वकालमें भक्तका तिरस्कार करनेवाले दुर्वासा ऋषिको बड़ा कष्ट उठाना पड़ा था | (२०) बस, बस - व्रत, तीर्थ योग, यज्ञ और ज्ञान चर्चा आदि बहुत-से साधनोंकी कोई आवश्यकता नहीं है; एकमात्र भक्ति ही मुक्ति देनेवाली है | (२१)
सूतजी कहते हैं – इस प्रकार नारदजीके निर्णय किये हुए अपने महात्म्यको सुनकर भक्तिके सारे अंग पुष्ट हो गये और वे उनसे कहने लगीं | (२२)
भक्तिने कहा – नारदजी! आप धन्य हैं! आपकी मुझमें निश्चल प्रीती हो | मैं सदा आपके ह्रदयमें रहूंगी, कभी आपको छोड़कर नहीं जाऊँगी | साधो! आप बड़े कृपालु हैं | आपने क्षणभरमें ही मेरा सारा दुःख दूर कर दिया | किन्तु अभी मेरे पुत्रोंमें चेतना नहीं आई है; आप इन्हें शीघ्र ही सचेत कर दीजिये, जगा दीजिये | (२४)
सूतजी कहते हैं – भक्तिके ये वचन सुनकर नारदजीको बड़ी करुणा आई और वे उन्हें हाथसे हिलाडुलाकर जगाने लगे | (२५) फिर उनके कानके पास मुह लगाकर जोरसे कहा, ‘ओ ज्ञान! जल्दी जग पड़ो; ओ वैराग्य! जल्दी जग पड़ो |’ (२६) फिर उन्होंने वेदध्वनी, वेदान्तघोष और बार-बार गीतापाठ करके उन्हें जगाया; इससे वे जैसे-तैसे बहुत जोर लगाकर उठे | (२७) किन्तु आलस्यके कारण वे दोनों जँभाई लेते रहे, नेत्र उघाड़कर देख भी नहीं सके | उनके बाल बगुलोंकी तरह सफ़ेद हो गये थे, उनके अंग प्रायः सूखे काठके समान निस्तेज और कठोर हो गये थे | (२८) इस प्रकार भूख-प्यासके मारे अत्यंत दुर्बल होनेके कारण उन्हें फिर सोते देख नारदजीको बड़ी चिंता हुई और वे सोचने लगे, ‘अब मुझे क्या करना चाहिये ? (२९) इनकी यह नींद और इससे भी बढकर इनकी वृद्धावस्था कैसे दूर हो ?’ शौनकजी! इस प्रकार चिन्ता करते-करते वे भगवान् का स्मरण करने लगे | (३०) उसी समय यह आकाशवाणी हुई की ‘मुने! खेद मत करो, तुम्हारा यह उघोग निःसंदेह सफल होगा | (३१) देवर्षे! इसके लिए तुम एक सत्कर्म करो, वह कर्म तुम्हे संतशिरोमणि महानुभाव बतायेंगे | (३२) उस सत्कर्मका अनुष्ठान करते ही क्षणभरमें उनकी नींद और वृद्धावस्था चली जायेगी तथा सर्वत्र भक्तिका प्रसार होगा’ (३३) यह आकाशवाणी वहाँ सभीको साफ-साफ सुनाई दी | इससे नारदजीको बड़ा विस्मय हुआ और वे कहने लगे, ‘मुझे तो इसका कुछ आशय समझमें नहीं आया |’ (३४)
नारदजी बोले – इस आकाशवाणीने भी गुप्तरूपमें ही बात कही है | यह नहीं बताया की वह कौन-सा साधन किया जाय, जिससे इनका कार्य सिद्ध हो | (३५) वे संत न जाने कहाँ मिलेंगे और किस प्रकार उस साधनको बतायेंगे ? अब आकाशवाणीने जो कुछ कहा है, उसके अनुसार मुझे क्या करना चाहिये ? (३६)
सूतजी कहते हैं – शौनकजी! तब ज्ञान-वैराग्य दोनोंको वहीं छोड़कर नारदमुनि वहाँसे चल पड़े और प्रत्येक तीर्थमें जा-जाकर मार्गमें मिलनेवाले मुनीश्वरोंसे वह साधन पूछने लगे | (३७) उनकी उस बातको सुनते तो सब थे, किन्तु उसके विषयमें कोई कुछ भी निश्च्रित उत्तर न देता | किन्हीने उसे असाध्य बताया; कोई बोले – ‘इसका ठीक-ठीक पता लगना ही कठिन है |’ कोई सुनकर चुप रह गये और कोई-कोई तो अपनी अवज्ञा होनेके भयसे बातको टाल-टूलकर खिसक गये | (३८) त्रिलोकीमें महान् आश्चर्यजनक हाहाकार मच गया | लोग आपसमें कानाफूसी करने लगे – ‘भाई! जब वेदध्वनी, वेदान्तघोष और बार-बार गीतापाठ सुनानेपर भी भक्ति, ज्ञान और वैराग्य - ये तीनो नहीं जगाये जा सके, तब और कोई उपाय नहीं है | (३९-४०) स्वयं योगिराज नारदको भी जिसका ज्ञान नहीं है, उसे दूसरे संसारी लोग कैसे बता सकते हैं ?’ (४१) इस प्रकार जिन-जिन ऋषियोंसे इसके विषयमें पूछा गया, उन्होंने निर्णय करके यही कहा की यह बात दु:साध्य ही है | (४२)
तब नारदजी बहुत चिन्तातुर हुए और बदरीवनमें आये | ज्ञान-वैराग्यको जगानेके लिए वहाँ उन्होंने यह निश्च्रय किया की ‘मैं ताप करूँगा’ | (४३) इसी समय उन्हें अपने सामने करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी सनकादि मुनीश्वर दिखायी दिए | उन्हें देखकर वे मुनिश्रेष्ठ कहने लगे | (४४)
नारदजीने कहा – महात्माओं! इस समय बड़े भाग्यसे मेरा आपलोगोंके साथ समागम हुआ है, आप मुझपर कृपा करके शीघ्र ही वह साधन बताइये | (४५) आप सभी लोग बड़े योगी, बुद्धिमान् और विद्वान् हैं | आप देखनेमें पांच-पांच वर्षके बालक-से जान पड़ते हैं, किंतु हैं पूर्वजोंके भी पूर्वज | (४६) आपलोग सदा वैकुण्ठधाममें निवास करते हैं, निरंतर हरिकीर्तनमें तत्पर रहते हैं, भगवल्लीलामृतका रसास्वादन कर सदा उसीमें उन्मत्त रहते हैं और एकमात्र भगवत्कथा ही आपके जीवनका आधार है | (४७) ‘हरिःशरणम्’ (भगवान ही हमारे रक्षक हैं) यह वाक्य (मन्त्र) सर्वदा आपके मुखमें रहता है; इसीसे कालप्रेरित वृद्धावस्था भी आपको बाधा नहीं पहुँचाती | (४८) पूर्वकाल में आपके भ्रूभंग्मात्रसे भगवान् विष्णुके द्वारपाल जय और विजय तुरंत पृथ्वीपर गिर गये थे और फिर आपकी ही कृपा से वे पुनः वैकुण्ठलोक पहुँच गये | (४९) धन्य है, इस समय आपका दर्शन बड़े सौभाग्यसे ही हुआ है | मैं बहुत दीन हूँ और आपलोग स्वाभावसे ही दयालु हैं; इसलिये मुझपर आपको अवश्य कृपा करनी चाहिए | (५०) बताइये – आकाशवाणीने जिसके विषयमें कहा है, वह कौन-सा साधन है और मुझे किस प्रकार उसका अनुष्ठान करना चाहिए | आप इसका विस्तारसे वर्णन कीजिये | (५१) भक्ति, ज्ञान और वैराग्यको किस प्रकार सुख मिल सकता है ? और किस तरह इनकी प्रेमपूर्वक सब वर्णोंमें प्रतिष्ठा की जा सकती है ? (५२)
सनकादिने कहा – देवर्षे! आप चिन्ता न करें, मनमें प्रसन्न हों; उनके उद्धारका एक सरल उपाए पहलेसे ही विघमान है | (५३) नारदजी! आप धन्य हैं | आप विरक्तों के शिरोमणि हैं | श्रीकृष्णादासोंके शाश्वत पथ-प्रदर्शक एवं भक्तियोगके भास्कर हैं | (५४) आप भक्ति के लिए जो उघोग कर रहे हैं, यह आपके लिए कोई आश्चर्यकी बात नहीं समझनी चाहिए | भगवानके भक्तके लिए तो भक्तिकी सम्यक स्थापना करना सदा उचित ही है | (५५) ऋषियोंने संसारमें अनेकों मार्ग प्रकट किये हैं; किन्तु वे सभी कष्टसाध्य हैं और परिणाममें प्रायः स्वर्गकी ही प्राप्ति करानेवाले हैं | (५६) अभीतक भगवानकी प्राप्ति करानेवाला मार्ग तो गुप्त ही रहा है | उसका उपदेश करनेवाला पुरुष प्रायः भाग्यसे ही मिलता है | (५७) आपको आकाशवाणीने जिस सत्कर्मका संकेत किया है, उसे हम बतलाते हैं; आप प्रसन्न और समाहितचित होकर सुनिए | (५८)
नारदजी! द्रव्ययज्ञ, तपोयज्ञ, योगयज्ञ और स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ – ये सब तो स्वर्गादीकी प्राप्ति करानेवाले कर्मकी ही ओर संकेत करते हैं | (५९) पण्डितोंने ज्ञानयज्ञको ही सत्कर्म (मुक्तिदायक कर्म) का सूचक माना है | वह श्रीमद्भागवतका परायण है, जिसका गान शुकादी महानुभावोंने किया है | (६०) उसके शब्द सुननेसे ही भक्ति, ज्ञान और वैराग्यको बड़ा बल मिलेगा | इससे ज्ञान-वैराग्यका कष्ट मिट जायगा और भक्तिको आनन्द मिलेगा | (६१) सिंह की गर्जना सुनकर जैसे भेड़िये भाग जाते हैं, उसी प्रकार श्रीमद्भागवतकी ध्वनिसे कलियुगके सारे दोष नष्ट हो जायेंगे | (६२) तब प्रेमरस प्रवाहित करनेवाली भक्ति, ज्ञान और वैराग्यको साथ लेकर प्रत्येक घर और व्यक्तिके ह्रदय में क्रीडा करेगी | (६३)
नारदजीने कहा – मैंने वेद-वेदान्तकी ध्वनि और गीतापाठ करके उन्हें बहुत जगाया, किन्तु फिर भी भक्ति, ज्ञान और वैराग्य – ये तीनो नहीं जगे | (६४) एसी स्थितिमें श्रीमद्भागवत सुनानेसे वे कैसे जागेंगे ? क्योंकि उस कथाके प्रत्येक श्लोक और प्रत्येक पदमें भी वेदोंका ही तो सारांश है | (६५) आपलोग शरणागतवत्सल हैं तथा आपका दर्शन कभी व्यर्थ नही होता; इसीलिए मेरा यह संदेह दूर कर दीजिये, इस कार्यमें विलम्ब न कीजिये | (६६)
सनकादिने कहा – श्रीमद्भागवतकी कथा वेद और उपनिषदों के सारसे बनी है | इसलिए उनसे अलग उनकी फलरूपा होने के कारण वह बड़ी उत्तम जान पडती है | जिस प्रकार रस वृक्षकी जड़से लेकर शाखाग्रपर्यंत रहता है, किन्तु इस स्थितिमें उसका आस्वादन नहीं किया जा सकता; वही जब अलग होकर फलके रूपमें आ जाता है, तब संसारमें सभी को प्रिय लगने लगता है | (६८) दूधमें घी रहता ही है, किन्तु उस समय उसका अलग स्वाद नही मिलता; वही जब उससे अलग हो जाता है, तब देवताओंके लिए भी स्वादवर्धक हो जाता है | (६९) खाँड ईखके ओर-छोर और बीचमें भी व्याप्त रहती है, तथापि अलग होनेपर उसकी कुछ और ही मिठास होती है | एसी ही यह भागवतकी कथा है | (७०) यह भागवतपुराण वेदोंके समान है | श्रीव्यासदेवने इसे भक्ति, ज्ञान और वैराग्यकी स्थापनाके लिए प्रकाशित किया है | (७१) पूर्वकालमें जिस समय वेद-वेदान्तके पारगामी और गीताकी भी रचना करनेवाले भगवान् व्यासदेव खिन्न होकर अज्ञानसमुद्रमें गोते खा रहे थे, उस समय आपने ही उन्हें चार श्लोकोंमें इसका उपदेश किया था | उसे सुनते ही उनकी सारी चिन्ता दूर हो गयी थी | (७२-७३) फिर इसमें आपको आश्चर्य क्यों हो रहा है, जो आप हमसे प्रश्न कर रहे हैं ? आपको उन्हें शोक और दुःखका विनाश करनेवाला श्रीमद्भागवतपुराण ही सुनाना चाहिए | (७४)
नारदजीने कहा – महानुभावो! आपका दर्शन जीवके सम्पूर्ण पापोंको तत्काल नष्ट कर देता है और जो संसार-दुःखरूप दावानलसे तपे हुए हैं, उनपर शीघ्र ही शान्तिकी वर्षा करता है | आप निरन्तर शेषजीके सहस्त्र मुखोंसे गाये हुए भगवत्कथामृतका ही पान करते रहते हैं | मैं प्रेमलक्षणा भक्तिका प्रकाश करनेके उद्देश्यसे आपकी शरण लेता हूँ | (७५) जब अनेकों जन्मोंके संचित पुण्यपुंजका उदय होनेसे मनुष्यको सत्संग मिलता है, तब वह उसके अज्ञानजनित मोह और मदरूप अन्धकारका नाश करके विवेक उदय होता है | (७६)

*** जय श्रीहरि ***

श्रीमद्भागवतमहात्म्य तीसरा अध्याय भक्तिके कष्टकी निवृत्ति

|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||
|| श्री हरी ||
श्रीमद्भागवतमहात्म्य
तीसरा अध्याय
भक्तिके कष्टकी निवृत्ति 

नारदजी कहते हैं – अब मैं भक्ति, ज्ञान और वैराग्यको स्थापित करनेके लिए प्रयत्नपूर्वक श्रीशुकदेवजीके कहे हुए भागवतशास्त्रकी कथाद्वारा उज्जवल ज्ञानयज्ञ करूँगा | (१) यह यज्ञ मुझे कहाँ करना चाहिये, आप इसके लिए कोई स्थान बता दीजिये | आपलोग वेदके पारगामी हैं, इसलिए मुझे इस शुकशास्त्रकी महिमा सुनाइये | (२) यह भी बताइये कि श्रीमद्भागवतकी कथा कितने दिनोंमें सुनानी चाहिए और उसके सुननेकी विधि क्या है | (३)
सनकादि बोले – नारदजी! आप बड़े विनीत और विवेकी हैं | सुनिये, हम आपको ये सब बातें बताते हैं | हरिद्वारके पास आनंद नामका एक घाट है | (४) वहाँ अनेकों ऋषि रहते हैं तथा देवता और सिद्धलोग भी उसका सेवन करते रहते हैं | भाँती-भाँतीके वृक्ष और लताओंके कारण वह बड़ा सघन है और वहाँ बड़ी कोमल नवीन बालू बिछी हुई है | (५) वह घाट बड़ा ही सुरम्य और एकान्त प्रदेशमें है, वहाँ हर समय सुनहले कमलोंकी सुगन्ध आया करती है | उसके आस-पास रहनेवाले सिंह, हाथी आदि परस्पर-विरोधी जीवोंके चितमें भी वैरभाव नहीं है | (६) वहाँ आप बिना किसी विशेष प्रयत्नके ही ज्ञानयज्ञ आरम्भ कर दीजिये, उस स्थानपर कथामें अपूर्व रसका उदय होगा | (७) भक्ति भी अपनी आखोंके ही सामने निर्बल और जराजीर्ण अवस्थामें पड़े हुए ज्ञान और वैराग्यको साथ लेकर वहाँ आ जायगी | (८) क्योंकि जहाँ भी श्रीमद्भागवतकी कथा होती है, वहाँ ये भक्ति आदि अपने-आप पहुँच जाते हैं | वहाँ कानोंमें कथाके शब्द पड़नेसे ये तीनों तरुण हो जायेंगे | (९)
सूतजी कहते हैं – इस प्रकार कहकर नारदजी के साथ सनकादि भी श्रीमद्भागवतकथामृतका पान करनेके लिए वहाँसे तुरंत गंगातटपर चले आये | (१०) जिस समय वे तटपर पहुंचे, भूलोक, देवलोक और ब्रह्मलोक – सभी जगह इस कथाका हल्ला हो गया | (११) जो-जो भगवतकथाके रसिक विष्णुभक्त थे, वे सभी श्रीमद्भागवतकथामृतका पान करनेके लिये सबसे आगे दौड़-दौड़कर आने लगे | (१२) भृगु, वसिष्ठ, च्यवन, गौतम, मेधातिथि, देवल, देवरात, परशुराम, विश्वामित्र, शाकल, मार्कण्डेय, दत्तात्रेय, पिप्पलाद, योगेश्वर व्यास और पराशर, छायाशुक, जाजलि और जहू आदि सभी प्रधान-प्रधान मुनिगण अपने-अपने पुत्र, शिष्य और स्त्रियोंसमेत बड़े प्रेमसे वहाँ आये | (१३-१४) इनके सिवा वेद, वेदान्त (उपनिषद), मन्त्र, तन्त्र, सत्रह पुराण और छहों शास्त्र भी मूर्तिमान् होकर वहाँ उपस्थित हुए | (१५)
गंगा आदि नदियाँ, पुष्कर आदि सरोवर, कुरुक्षेत्र आदि समस्त क्षेत्र, सारी दिशाएँ, दण्डक आदि वन हिमालय आदि पर्वत तथा देव, गन्धर्व और दानव आदि सभी कथा सुनने चले आये | जो लोग अपने गौरवके कारण नहीं आये, महर्षि भृगु उन्हें समझाबुझाकर ले आये | (१६-१७)
तब कथा सुनानेके लिए दीक्षित होकर श्रीकृष्ण-परायण सनकादि नांरदजीके दिए हुए श्रेष्ठ आसनपर विराजमान हुए | उस समय सभी श्रोताओंने उनकी वन्दना की | (१८) श्रोताओंमें वैष्णव, विरक्त, संन्यासी और ब्रह्मचारी लोग आगे बैठे और उन सबके आगे नारदजी विराजमान हुए | (१९) एक ओर ऋषिगण, एक ओर देवता, एक ओर वेद और उपनिषदादि तथा एक ओर तीर्थ बैठे और दूसरी ओर स्त्रियाँ बैठीं | (२०) उस समय सब ओर जय-जयकार, नमस्कार और शङ्खोंका शब्द होने लगा और अबीर-गुलाल, खील एवं फूलोंकी खूब वर्षा होने लगी | (२१) कोई-कोई देवश्रेष्ठ तो विमानोंपर चढ़कर, वहाँ बैठे हुए सब लोगोंपर कल्पवृक्षके पुष्पोंकी वर्षा करने लगे | (२२)
सूतजी कहते हैं – इस प्रकार पूजा समाप्त होनेपर जब सब लोग एकाग्रचित हो गये, तब सनकादि ऋषि महात्मा नारदको श्रीमद्भागवतका महात्म्य स्पष्ट करके सुनाने लगे | (२३)
सनकादिने कहा – अब हम आपको इस भागवतशास्त्रकी महिमा सुनाते हैं | इसके श्रवणमात्रसे मुक्ति हाथ लग जाती है | (२४) श्रीमद्भागवतकी कथाका सदा-सर्वदा सेवन, आस्वादन करना चाहिए | इसके श्रवणमात्रसे श्रीहरि ह्रदयमें आ विराजते हैं | (२५) इस ग्रन्थमें अठारह हजार श्लोक और बारह स्कन्द हैं तथा श्रीशुकदेव और राजा परीक्षित् का संवाद है | आप यह भागवतशास्त्र ध्यान देकर सुनिये | (२६) यह जीव तभीतक अज्ञानवश इस संसारचक्रमें भटकता है, जबतक क्षणभरके लिए भी कानो में इस शुकशास्त्रकी कथा नही पड़ती | (२७) बहुत-से शास्त्र और पुराण सुननेसे क्या लाभ है, इससे तो व्यर्थका भ्रम बढ़ता है | मुक्ति देनेके लिए तो एकमात्र भागवतशास्त्र ही गरज रहा है | (२८) जिस घरमें नित्यप्रति श्रीमद्भागवतकी कथा होती है, वह तीर्थरूप हो जाता है और जो लोग उसमें रहते हैं, उनके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं | (२९) हजारों अश्वमेघ और सैकड़ों वाजपेय यज्ञ इस शुकशास्त्रकी कथाका सोलहवाँ अंश भी नहीं हो सकते | (३०) तपोधनो! जबतक लोग अच्छी तरह श्रीमद्भागवतका श्रवण नहीं करते, तभीतक उनके शरीरमें पाप निवास करते हैं | (३१) फलकी दृष्टिसे इस शुकशास्त्रकथाकी समता गंगा, गया, काशी, पुष्कर या प्रयाग – कोई तीर्थ भी नहीं कर सकता | (३२)
यदि आपको परम गतिकी इच्छा है तो अपने मुखसे ही श्रीमद्भागवतके आधे अथवा चौथाई श्लोकका भी नित्य नियमपूर्वक पाठ कीजिये | (३३) ॐकार, गायत्री, पुरुषसूक्त, तीनों वेद, श्रीमद्भागवत, ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ – यह द्वादशाक्षर मन्त्र, बारह मूर्तियोंवाले सूर्यभगवान, प्रयाग, संवत्सररूप काल, ब्राह्मण, अग्निहोत्र, गौ, द्वादशी तिथि, तुलसी, वसन्त ऋतु और भगवान पुरुषोत्तम – इन सबमें बुद्धिमान् लोग वस्तुतः कोई अन्तर नहीं मानते | (३४-३६) जो पुरुष अहर्निश अर्थसहित श्रीमद्भागवत-शास्त्रका पाठ करता है, उसके करोड़ों जन्मोंका पाप नष्ट हो जाता है – इसमें तनिक भी संदेह नहीं है | (३७) जो पुरुष नित्यप्रति भागवतका आधा य चौथाई श्लोक भी पढ़ता है, उसे राजसूय और अश्वमेघयज्ञोंका फल मिलता है | (३८) नित्य भागवतका पाठ करना, भगवान् का चिंतन करना, तुलसीको सींचना और गौकी सेवा करना – ये चारों समान हैं | (३९) जो पुरुष अन्तसमयमें श्रीमद्भागवतका वाक्य सुन लेता है, उसपर प्रसन्न होकर भगवान् उसे वैकुण्ठधाम देते हैं | (४०) जो पुरुष इसे सोनेके सिंहासनपर रखकर विष्णुभक्तों को दान करता है, वाह अवश्य ही भगवान् का सायुज्य प्राप्त करता है | (४१)
जिस दुष्टने अपनी सारी आयुमें चितको एकाग्र करके श्रीमद्भागवतकथामृतका थोडा-सा भी रसास्वादन नहीं किया, उसने तो अपना सारा जन्म चाण्डाल और गधेके समान व्यर्थ ही गँवा दिया; वह तो अपनी माताको प्रसव-पीड़ा पहुचानेके लिये ही उत्पन्न हुआ | (४२) जिसने इस शुकशास्त्रके थोड़े-से भी वचन नहीं सुने, वह पापात्मा तो जीता हुआ ही मुर्देके समान है | ‘पृथ्वीके भारस्वरुप उस पशुतुल्य मनुष्यको धिक्कार है’ – यों स्वर्गलोकमें देवताओंमें प्रधान इन्द्रादि कहा करते हैं | (४३)
संसारमें श्रीमद्भागवतकी कथाका मिलना अवश्य ही कठिन है; जब करोड़ों जन्मों का पुण्य होता है, तभी इसकी प्राप्ति होती है | (४४) नारदजी! आप बड़े ही बुद्धिमान और योगनिधि हैं | आप प्रयत्नपूर्वक कथाका श्रवण कीजिये | इसे सुननेके लिए दिनोंका कोई नियम नहीं है, इसे तो सर्वदा ही सुनना अच्छा है | (४५) इसे सत्यभाषण और ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक सर्वदा ही सुनना श्रेष्ठ माना गया है | किन्तु कलियुगमें एसा होना कठिन है; इसलिए इसकी शुकदेवजीने जो विशेष विधि वतायी है, वह जान लेनी चाहिये | (४६) कलियुग में बहुत दिनोंतक चित्तकी वृत्तियोंको वशमें रखना, नियमोंमें बँधे रहना और किसी पुण्यकार्यके लिए दीक्षित रहना कठिन है; इसीलिए सप्ताह-श्रवणकी विधि है | (४७) श्रद्धापूर्वक कभी भी श्रवण करनेसे अथवा माघमासमें श्रवण करनेसे जो फल होता है, वही फल श्रीशुकदेवजीने सप्ताहश्रवनमें निर्धारित किया है | (४८) मनके असंयम, रोगोंकी बहुलता और आयुकी अल्पताके कारण तथा कलियुगमें अनेकों दोषोंकी सम्भावनासे ही सप्ताहश्रवणका विधान किया गया है | (४९) जो फल तप, योग और समाधिसे भी प्राप्त नहीं हो सकता, वह सर्वांगरूपमें सप्ताहश्रवणसे सहजमें ही मिल जाता है | (५०) सप्ताहश्रवण यज्ञसे बढ़कर है, व्रतसे बढ़कर है, तप से बढ़कर है | तीर्थसेवनसे तो सदा ही बड़ा है, योगसे बढ़कर है – यहाँतक कि ध्यान और ज्ञानसे भी बढ़कर है, अजी! इसकी विशेषता कहाँतक वर्णन करें, यह तो सभी से बढ़-चढ़कर है | (५१-५२)
शौनकजीने पूछा – सूतजी! यह तो आपने बड़े आश्चर्यकी बात कही | अवश्य ही यह भागवतपुराण योगवेता ब्रह्माजीके भी आदिकारण श्रीनारायणका निरूपण करता है; परन्तु यह मोक्षकी प्राप्तिमें ज्ञानादि सभी साधनोंका तिरस्कार करके इस युगमें उनसे भी कैसे बढ़ गया ? (५३)
सूतजीने कहा – शौनकजी! जब भगवान् श्रीकृष्णा इस धराधामको छोड़कर अपने नित्यधामको जाने लगे, तब उनके मुखारविन्दसे एकादश स्कन्धका ज्ञानोपदेश सुनकर भी उद्धवजीने पूछा | (५४)
उद्धवजी बोले – गोविन्द! अब आप तो अपने भक्तोंका कार्य करके परमधामको पधारना चाहते हैं; किन्तु मेरे मनमें एक बड़ी चिंता है | उसे सुनकर आप मुझे शांत कीजिये | (५५) अब घोर कलिकाल आया ही समझिये, इसलिए संसारमें फिर अनेकों दुष्ट प्रकट हो जायँगे; उनके संसर्गसे जब अनेकों सत्पुरुष भी उग्र प्रकृति के हो जायँगे, तब उनके भारसे दबकर यह गोरूपिणी पृथ्वी किसकी शरणमें जायगी ? कमलनयन! मुझे तो आपको छोड़कर इसकी रक्षा करनेवाला कोई दूसरा नहीं दिखायी देता | (५६-५७) इसलिये भक्तवत्सल! आप साधुओंपर कृपा करके यहाँसे मत जाइये | भगवन्! आपने निराकार और चिन्मात्र होकर भी भक्तोंके लिए ही तो यह सगुण रूप धारण किया है | (५८) फिर भला, आपका वियोग होनेपर वे भक्तजन पृथ्वीपर कैसे रह सकेंगे ? निर्गुणोपासनामें तो बड़ा कष्ट है | इसलिये कुछ और विचार कीजिये | (५९)
प्रभासक्षेत्रमें उद्धवजीके ये वचन सुनकर भगवान् सोचने लगे कि भक्तोंके अवलम्बके लिये मुझे क्या व्यवस्था करनी चाहिये | (६०) शौनकजी! तब भगवान् ने अपनी सारी शक्ति भागवतमें रख दी; वे अन्तरर्धान होकर इस भागवतसमुद्रमें प्रवेश कर गये | (६१) इसलिए यह भगवानकी साक्षात् शब्दमयी मूर्ति है | इसके सेवन, श्रवण, पाठ अथवा दर्शनसे ही मनुष्यके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं | (६२) इसीसे इसका सप्ताहश्रवण सबसे बढ़कर माना गया है और कलियुगमें तो अन्य सब साधनोंको छोड़कर यही प्रधान धर्म बताया गया है | (६३) कलिकालमें यही ऐसा धर्म है, जो दुःख, दरिद्रता, दुर्भाग्य और पापोंकी सफाई कर देता है तथा काम-क्रोधादि शत्रुओंपर विजय दिलाता है | (६४) अन्यथा, भगवानकी इस माया से पीछा छुड़ाना देवताओंके लिए भी कठिन है, मुनष्य तो इसे छोड़ ही कैसे सकते हैं | अतः इससे छुटनेके लिए भी सप्ताहश्रवणका विधान किया गया है | (६५)
सूतजी कहते हैं – शौनकजी! जिस समय सनकादि मुनीश्वर इस प्रकार सप्ताहश्रवण की महिमा का बखान कर रहे थे, उस सभामें एक बड़ा आश्चर्य हुआ; उसे मैं तुम्हे बतलाता हूँ, सुनो | (६६) वहाँ तरुणावस्थाको प्राप्त हुए अपने दोनों पुत्रोंको साथ लिये विशुद्ध प्रेमरूपा भक्ति बार-बार ‘श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे! मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव!’ आदि भगवन्नामोंका उच्चारण करती हुई अकस्मात् प्रकट हो गयीं | (६७) सभी सदस्योंने देखा कि परम सुन्दरी भक्तिरानी भागवतके अर्थोंका आभूषण पहने वहाँ पधारीं | मुनियोंकी उस सभामें सभी यह तर्क-वितर्क करने लगे कि ये कैसे आयीं, कैसे प्रविष्ट हुईं | (६८) तब सनकादिने कहा – ‘ये भक्तिदेवी अभी-अभी कथा के अर्थसे निकली हैं |’ उनके ये वचन सुनकर भक्तिने अपने पुत्रोंसमेत अत्यंत विनम्र होकर सनत्कुमारजी से कहा | (६९)
भक्ति बोलीं – मैं कलियुगमें नष्टप्राय हो गयी थी, आपने कथामृतसे सींचकर मुझे फिर पुष्ट कर दिया | अब आप यह बताइये की मैं कहाँ रहूँ ? यह सुनकर सनकादि ने उससे कहा – (७०) ‘तुम भक्तोंको भगवानका स्वरुप प्रदान करनेवाली, अनन्यप्रेमका सम्पादन करनेवाली और संसार-रोग को निर्मूल करनेवाली हो; अतः तुम धैर्य धारण करके नित्य-निरंतर विष्णुभक्तोंके ह्रदयोंमें ही निवास करो | (७१) ये कलियुगके दोष भले ही सारे संसारपर अपना प्रभाव डालें, किन्तु वहाँ तुमपर इनकी दृष्टि भी नहीं पड़ सकेगी |’ इस प्रकार उनकी आज्ञा पाते ही भक्ति तुरन्त भगवद् भक्तोंके ह्रदय में जा विराजी | (७२)
जिनके ह्रदयमें एकमात्र श्रीहरिकी भक्ति निवास करती है; वे त्रिलोकीमें अत्यन्त निर्धन होनेपर भी परम धन्य हैं; क्योंकि इस भक्तिकी डोरीसे बँधकर तो साक्षात् भगवान् भी अपना परमधाम छोड़कर उनके ह्रदयमें आकर बस जाते हैं | (७३) भूलोकमें यह भागवत साक्षात् परब्रह्मका विग्रह है, हम इसकी महिमा कहाँतक वर्णन करें | इसका आश्रय लेकर इसे सुनानेसे तो सुनने और सुनानेवाले दोनोंको ही भगवान् श्रीकृष्णकी समता प्राप्त हो जाती है | अतः इसे छोड़कर अन्य धर्मोंसे क्या प्रयोजन है | (७४)

*** जय श्रीहरि ***

श्रीमद्भागवतमहात्म्य चौथा अध्याय गोकर्नोपाख्यान प्रारम्भ

|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||
|| श्री हरी ||
श्रीमद्भागवतमहात्म्य
चौथा अध्याय
गोकर्नोपाख्यान प्रारम्भ

सूतजी कहते हैं – मुनिवर! उस समय अपने भक्तोंके चित्तमें अलौकिक भक्तिका प्रादुर्भाव हुआ देख भक्तवत्सल श्रीभगवान् अपना धाम छोड़कर वहाँ पधारे | (१) उनके गलेमें वनमाला शोभा पा रही थी, श्रीअंग सजल जलधरके समान श्यामवर्ण था, उसपर मनोहर पीताम्बरी सुशोभित थी, कटिप्रदेश करधनीकी लड़ियोंसे सुसज्जित था, सिरपर मुकुटकी लटक और कानोंमें कुण्डलोंकी झलक देखते ही बनती थी | (२) वे त्रिभंगललित भावसे खड़े हुए चित्तको चुराये लेते थे | वक्षःस्थलपर कौस्तुभमणि दमक रही थी, सारा श्रीअंग हरिचंदनसे चर्चित था | उस रूपकी शोभा क्या कहें, उसने तो मानों करोड़ों कामदेवोंकी रूपमाधुरी छीन ली थी | (३) वे परमानन्द्चिन्मूर्ती मधुरातिमधुर मुरलीधर ऐसी अनुपम छविसे अपने भक्तोंके निर्मल चित्तोंमें आविर्भूत हुए | (४) भगवानके नित्य लोकनिवासी लीलापरिकर उद्धवादी वहाँ गुप्तरूपसे उस कथा को सुननेके लिए आये हुए थे | (५) प्रभुके प्रकट होते ही चारों ओर ‘जय हो! जय हो!!’ की ध्वनि होने लगी | उस समय भक्तिरसका अद्भुत प्रवाह चला, बार-बार अबीर-गुलाल और पुष्पोंकी वर्षा तथा शङ्खध्वनि होने लगी | (६) उस सभामें जो लोग बैठे थे, उन्हें अपने देह, गेह और आत्माकी भी कोई सुधि न रही | उनकी ऐसी तन्मयता देखकर नारदजी कहने लगे - | (७)
मुनीश्वरगण! आज सप्ताहश्रवणकी मैंने यह बड़ी ही अलौकिक महिमा देखि | यहाँ तो जो बड़े मूर्ख, दुष्ट और पशु-पक्षी भी हैं, वे सभी अत्यंत निष्पाप हो गये हैं | (८) अतः इसमें संदेह नहीं की कलिकालमें चित्तकी शुद्धिके लिए इस भागवतकथाके सामान मृत्युलोकमें पापपुंजका नाश करनेवाला कोई दूसरा पवित्र साधन नहीं है | (९) मुनिवर! आपलोग बड़े कृपालु हैं, आपने संसारके कल्याणका विचार करके यह बिलकुल निराला ही मार्ग निकला है | आप कृपया यह तो बताइये कि इस कथारूप सप्ताहयज्ञके द्वारा संसारमें कौन-कौन लोग पवित्र हो जाते हैं | (१०)
सनकादिने कहा – जो लोग सदा तरह-तरहके पाप किया करते हैं, निरन्तर दुराचारमें ही तत्पर रहते हैं और उलटे मार्गोंसे चलते हैं तथा जो क्रोधाग्निसे जलते रहनेवाले, कुटिल और कामपरायण हैं, वे सभी इस कलियुगमें सप्ताहयज्ञसे पवित्र हो जाते हैं | (११) जो सत्यसे च्युत, माता-पिताकी निन्दा करनेवाले, तृष्णाके मारे व्याकुल, आश्रमधर्मसे रहित, दम्भी, दूसरोंकी उन्नति देखकर कुढ़नेवाले और दूसरोंको दुःख देनेवाले हैं, वे भी कलियुगमें सप्ताहयज्ञसे पवित्र हो जाते हैं | (१२) जो मदिरापान, ब्रह्महत्या, सुवर्णकी चोरी, गुरुस्त्रीगमन और विश्वासघात – ये पांच महापाप करनेवाले, छल-छंगपरायण, क्रूर, पिशाचोंके समान निर्दयी, ब्राह्मणोंके धनसे पुष्ट होनेवाले और व्यभिचारी हैं, वे भी कलियुगमें सप्ताहयज्ञसे पवित्र हो जाते हैं | (१३) जो दुष्ट आग्रहपूर्वक सर्वदा मन, वाणी वा शरीरसे पाप करते रहते हैं, दुसरेके धनसे ही पुष्ट होते हैं तथा मलिन मन और दुष्ट ह्रदयवाले हैं, वे भी कलियुगमें सप्ताहयज्ञसे पवित्र हो जाते हैं | (१४)
नारदजी! अब हम तुम्हे इस विषयमें एक प्राचीन इसिहास सुनाते हैं, उसके सुननेसे ही सब पाप नष्ट हो जाते हैं | (१५) पूर्वकालमें तुंगभद्रा नदीके तटपर एक अनुपम नगर बसा हुआ था | वहाँ सभी वर्णोंके लोग अपने-अपने धर्मोंका आचरण करते हुए सत्य और सत्कर्मोंमें तत्पर रहते थे | (१६) उस नगरमें समस्त वेदोंका विशेषज्ञ और श्रौत-स्मार्त कर्मोंमें निपुण एक आत्मदेव नामक ब्राह्मण रहता था, वह साक्षात् दूसरे सूर्यके समान तेजस्वी था | (१७) वह धनि होनेपर भी भिक्षाजीवी था | उसकी प्यारी पत्नी धुन्धुली कुलीन एवं सुन्दरी होनेपर भी सदा अपनी बातपर अड़ जानेवाली थी | (१८) उसे लोगोंकी बात करनेमें सुख मिलता था | स्वाभाव था क्रूर | प्रायः कुछ-न-कुछ बकवाद करती रहती थी | गृहकार्यमें निपुण थी, कृपण थी, और थी झगड़ालू भी | (१९) इस प्रकार ब्राह्मण-दम्पति प्रेमसे अपने घरमें रहते और विहार करते थे | उनके पास अर्थ और भोग-विलासकी सामग्री बहुत थी | घर-द्वार भी सुंदर थे, परन्तु उससे उन्हें सुख नही था | (२०) जब अवस्था बहुत ढल गयी, तब उन्होंने सन्तानके लिये तरह-तरहके पुण्यकर्म आरम्भ किये और वे दीन-दुखियोंको गौ, पृथ्वी, सुवर्ण, और वस्त्रादि दान करने लगे | (२१) इस प्रकार धर्ममार्गमें उन्होंने अपना आधा धन समाप्त कर दिया, तो भी उन्हें पुत्र या पुत्री किसीका भी मुख देखनेको न मिला | इसलिये अब वह ब्राह्मण बहुत ही चिन्तातुर रहने लगा | (२२)
एक दिन वह ब्राह्मणदेवता बहुत दुखी होकर घरसे निकलकर वनको चल दिया | दोपहरके समय उसे प्यास लगी, इसलिए वह एक तालाबपर आया | (२३) सन्तान के अभावके दुःखने उसके शरीरको बहुत सुखा दिया था, इसलिये थक जानेके कारण जल पीकर वह वहीं बैठ गया | दो घड़ी बीतनेपर वहाँ एक संन्यासी महात्मा आये | (२४) जब ब्राह्मणदेवताने देखा की वे जल पी चुके हैं, तब वह उनके पास गया और चरणोंमें नमस्कार करनेके बाद सामने खड़े होकर लंबी-लंबी सांसें लेने लगा | (२५)
संन्यासीने पूछा – कहो, ब्राह्मणदेवता! रोते क्यों हो ? ऐसी तुम्हे क्या भारी चिंता है ? तुम जल्दी ही मुझे अपने दुःखका कारण बताओ | (२६)
ब्राह्मणने कहा – महाराज! मैं अपने पूर्वजन्मके पापोंसे संचित दुःखका क्या वर्णन करूँ ? अब मेरे पितर मेरे द्वारा दी हुई जलांजलिके जलको अपनी चिन्ताजनित साँससे कुछ गरम करके पीते हैं | (२७) देवता और ब्राह्मण मेरा दिया हुआ प्रसन्न मनसे स्वीकार नहीं करते | सन्तानके लिए मैं इतना दुखी हो गया हूँ की मुझे सब सुना-ही-सुना दिखाई देता है | मैं प्राण त्यागनेके लिए यहाँ आया हूँ | (२८) सन्तानहीन जीवनको धिक्कार है, सन्तानहीन गृहको धिक्कार है! सन्तानहीन धनको धिक्कार है और सन्तानहीन कुलको धिक्कार है!! (२९) मैं जिस गायको पालता हूँ, वह भी सर्वथा बाँझ हो जाती है; जो पेड़ लगाता हूँ, उसपर भी फल-फूल नहीं लगते | (३०) मेरे घरमें जो फल आता है, वह भी बहुत जल्दी सड़ जाता है | जब मैं ऐसा अभागा और पुत्रहीन हूँ, तब फिर इस जीवनको ही रखकर मुझे क्या करना है | (३१) यों कहकर वह ब्राह्मण दुःखसे व्याकुल हो उन संन्यासी महात्माके पास फूट-फूटकर रोने लगा | तब उन यतिवरके ह्रदयमें बड़ी करुना उत्पन्न हुई | (३२) वे योगनिष्ठ थे; उन्होंने उसके ललाटकी रेखाएँ देखकर सारा वृतान्त जान लिया और फिर उसे विस्तारपूर्वक कहने लगे | (३३)
संन्यासीने कहा – ब्राह्मणदेवता! इस प्रजाप्राप्तिका मोह त्याग दो | कर्मकी गति प्रबल है, विवेकका आश्रय लेकर संसारकी वासना छोड़ दो | विप्रवर! सुनो; मैंने इस समय तुम्हारा प्रारब्ध देखकर निश्च्रय किया है कि सात जन्मतक तुम्हारे कोई सन्तान किसी प्रकार नहीं हो सकती | (३५) पूर्वकालमें राजा सगर एवं अंगको संतानके कारण दुःख भोगना पड़ा था | ब्राह्मण! अब तुम कुटुम्बकी आशा छोड़ दो | संन्यासमें ही सब प्रकारका सुख है | (३६)
ब्राह्मणने कहा – महात्माजी! विवेकसे मेरा क्या होगा | मुझे तो बलपूर्वक पुत्र दीजिये; नहीं तो मैं आपके सामने ही शोकमूर्च्छित होकर अपने प्राण त्यागता हूँ | (३७) जिसमें पुत्र-स्त्री आदिका सुख नहीं है, एसा संन्यास तो सर्वथा नीरस ही है | लोकमें सरस तो पुत्र-पौत्रादिसे भरा-पूरा गृहस्थाश्रम ही है | (३८)
ब्राह्मणका ऐसा आग्रह देखकर उन तपोधनने कहा, ‘विधाताके लेखको मिटानेका हठ करनेसे राजा चित्रकेतुको बड़ा कष्ट उठाना पड़ा था | (३९) इसलिए दैव जिसके उघोगको कुचल देता है, उस पुरुषके समान तुम्हे भी पुत्रसे सुख नही मिल सकेगा | तुमने तो बड़ा हठ पकड़ रखा है और अर्थीके रूपमें तुम मेरे सामने उपस्थित हो; ऐसी दशामें मैं तुमसे क्या कहूँ’ | (४०)
जब महात्माजीने देखा कि यह किसी प्रकार अपना आग्रह नहीं छोड़ता, तब उन्होंने उसे एक फल देकर कहा – ‘इसे तुम अपनी पत्नीको खिला देना, इससे उसके एक पुत्र होगा | (४१) तुम्हारी स्त्रीको एक सालतक सत्य, शौच, दया, दान और एक समय एक ही अन्न खानेका नियम रखना चाहिये | यदि वह ऐसा करेगी तो बालक बहुत शुद्ध स्वभाववाला होगा |’ (४२)
यों कहकर वे योगिराज चले गये और ब्राह्मण अपने घर लौट आया | वहाँ आकर उसने वह फल अपनी स्त्रीके हाथमें दे दिया और स्वयं कहीं चला गया | (४३) उसकी स्त्री तो कुटिल स्वाभावकी थी ही, वह रो-रोकर अपनी एक सखीसे कहने लगी – ‘सखी! मुझे तो बड़ी चिन्ता हो गयी, मैं तो यह फल नहीं खाऊँगी | (४४) फल खानेसे गर्भ रहेगा और गर्भ से पेट बढ़ जायगा | फिर कुछ खाया-पीया जायेगा नहीं, इससे मेरी शक्ति क्षीण हो जायगी; तब बता, घरका धंधा कैसे होगा ? (४५) और – दैववश – यदि कहीं गाँवमें डाकुओंका आक्रमण हो गया तो गर्भिणी स्त्री कैसे भागेगी | यदि शुकदेवजीकी तरह यह गर्भ भी पेटमें ही रह गया तो इसे बाहर कैसे निकला जायगा | (४६) और कहीं प्रसवकालके समय वह टेढ़ा हो गया तो फिर प्राणोंसे ही हाँथ धोना पड़ेगा | यों भी प्रसवके समय बड़ी भयंकर पीड़ा होती है; मैं सुकुमारी भला, यह सब कैसे सह सकूँगी ? (४७) मैं जब दुर्बल पड़ जाऊँगी, तब ननदरानी आकर घरका सब माल-मता समेट ले जायँगी | और मुझसे तो सत्य-शौचादि नियमोंका पालन होना भी कठिन ही जान पड़ता है | (४८) जो स्त्री बच्चा जनती है, उसे उस बच्चेके लालन-पालनमें बड़ा कष्ट होता है | मेरे विचारसे तो वन्ध्या या विधवा स्त्रियाँ ही सुखी हैं |’ (४९)
मनमें ऐसे ही तरह-तरहके कुतर्क उठनेसे उसने वह फल नहीं खाया और जब उसके पतिने पूछा – ‘फल खा लिया ?’ तब उसने कह दिया – ‘हाँ, खा लिया’ | (५०) एक दिन उसकी बहिन अपने-आप ही उसके घर आयी; तब उसने अपनी बहिनको सारा वृतान्त सुनाकर कहा कि ‘मेरे मनमें इसकी बड़ी चिन्ता है | (५१) मैं इस दुःखके कारण दिनोदिन दुबली हो रही हूँ | बहिन! मैं क्या करूँ ?’ बहिनने कहा, ‘मेरे पेटमें बच्चा है, प्रसव होनेपर वह बालक मैं तुझे दे दूँगी | (५२) तबतक तू गर्भवतीके समान घरमें गुप्तरूपसे सुखसे रह | तू मेरे पतिको कुछ धन दे देगी तो वे तुझे अपना बालक दे देंगे | (५३) (हम ऐसी युक्ति करेंगी) कि जिसमें सब लोग यही कहें कि ‘इसका बालक छः महीनेका होकर मर गया’ और मैं नित्यप्रति तेरे घर आकर उस बालकका पालन-पोषण करती रहूँगी | (५४) तू इस समय इसकी जाँच करनेके लिए यह फल गौको खिला दे |’ ब्राह्मणीने स्त्रीस्वभाववश जो-जो उसकी बहिनने कहा था, वैसे ही सब किया | (५५)
इसके पश्चात् समयानुसार जब उस स्त्रीके पुत्र हुआ, तब उसके पिताने चुपचाप लाकर उसे धुन्धलीको दे दिया | (५६) और उसने आत्मदेवको सूचना दे दी कि मेरे सुखपूर्वक बालक हो गया है | इस प्रकार आत्मदेवके पुत्र हुआ सुनकर सब लोगोंको बड़ा आनन्द हुआ | (५७) ब्राह्मणने उसका जातकर्म-संस्कार करके ब्राह्मणोंको दान दिया और उसके द्वारपर गाना-बजाना तथा अनेक प्रकारके मांगलिक कृत्य होने लगे | (५८) धुन्धुलीने अपने पतिसे कहा, ‘मेरे स्तनोंमें तो दूध ही नहीं है; फिर गौ आदि किसी अन्य जीवके दूधसे मैं इस बालकका किस प्रकार पालन करुँगी ? (५९) मेरी बहिनके अभी बालक हुआ था, वह मर गया है; उसे बुलाकर अपने यहाँ रख लें तो वह आपके इस बच्चे का पालन-पोषण कर लेगी |’ (६०) तब पुत्रकी रक्षाके लिए आत्मदेवने वैसा ही किया तथा माता-धुन्धुलीने उस बालकका नाम धुन्धुकारी रखा | (६१)
इसके बाद तीन महीने बीतनेपर उस गौके भी एक मनुष्याकार बच्चा हुआ | वह सर्वांगसुन्दर, दिव्य, निर्मल तथा सुवर्णकी-सी कान्तिवाला था | (६२) उसे देखकर ब्राह्मणदेवताको बड़ा आनन्द हुआ और उसने स्वयं ही उसके सब संस्कार किये | इस समाचारसे और सब लोगोंको भी बड़ा आश्चर्य हुआ और वे बालकको देखनेके लिये आये | (६३) तथा आपसमें कहने लगे, ‘देखो, भाई! अब आत्मदेव का कैसा भाग्य उदय हुआ है ! कैसे आश्चर्यकी बात है कि गौके भी एसा दिव्यरूप बालक उत्पन्न हुआ है |’ (६४) दैवयोगसे इस गुप्त रहस्यका किसीको भी पता न लगा | आत्मदेवने उस बालकके गौके-से कान देखकर उसका नाम ‘गोकर्ण’ रखा | (६५)
कुछ काल बीतनेपर वे दोनों बालक जवान हो गये | उनमें गोकर्ण तो बड़ा पंडित और ज्ञानी हुआ, किन्तु धुन्धुकारी बड़ा ही दुष्ट निकला | (६६) स्नान-शौचादि ब्राह्मणोचित आचारोंका उसमें नाम भी न था और न खान-पानका ही कोई परहेज था | क्रोध उसमें बहुत बढ़ा-चढ़ा था | वह बुरी-बुरी वस्तुओंका संग्रह किया करता था | मुर्देके हाथसे छुआया हुआ अन्न भी खा लेता था | (६७) दूसरोंकी चोरी करना और सब लोगोंसे द्वेष बढ़ाना उसका स्वाभाव बन गया था | छिपे-छिपे वह दूसरोंके घरोंमें आग लगा देता था | दूसरोंके बालकोंको खेलनेके लिए गोदमें लेता और उन्हें चट कुएँमें डाल देता | (६८) हिंसाका उसे व्यसन-सा हो गया था | हर समय वह अस्त्र-शस्त्र धारण किये रहता और बेचारे अंधे और दीन-दुखियोंको व्यर्थ तंग करता | चाण्डालोंसे उसका विशेष प्रेम था; बस, हाथमें फंदा लिए कुत्तोंकी टोलीके साथ शिकारकी टोहमें घूमता रहता | (६९) वेश्याओंके जालमें फँसकर उसने अपने पिताकी सारी संपत्ति नष्ट कर दी | एक दिन माता-पिताको मार-पीटकर घरके सब बर्तन-भाँड़े उठा ले गया | (७०)
इस प्रकार जब सारी सम्पत्ति स्वाहा हो गयी, तब उसका कृपण पिता फूट-फूटकर रोने लगा और बोला – ‘इससे तो इसकी माँका बाँझ रहना ही अच्छा था; कुपुत्र तो बड़ा ही दुःखदायी होता है | (७१) अब मैं कहाँ रहूँ ? कहाँ जाऊँ ? मेरे इस संकटको कौन काटेगा ? हाय! मेरे ऊपर तो बड़ी विपत्ति आ पड़ी है, इस दुःखके कारण अवश्य मुझे एक दिन प्राण छोड़ने पड़ेंगे |’ (७२) उसी समय परम ज्ञानी गोकर्णजी वहाँ आये और उन्होंने पिताको वैराग्यका उपदेश करते हुए बहुत समझाया | (७३) वे बोले, ‘पिताजी! यह संसार असार है | यह अत्यंत दुःखरूप और मोहमें डालनेवाला है | पुत्र किसका ? धन किसका ? स्नेहवान पुरुष रात-दिन दीपकके समान जलता रहता है | (७४) सुख न तो इन्द्रको है और न चक्रवर्ती राजाको ही; सुख है तो केवल विरक्त, एकान्तजीवी मुनि को | (७५) ‘यह मेरा पुत्र है’ इस अज्ञानको छोड़ दीजिये | मोहसे नरककी प्राप्ति होती है | यह शरीर तो नष्ट होगा ही | इसलिए सब कुछ छोड़कर वनमें चले जाइये | (७६)’
गोकर्णके वचन सुनकर आत्मदेव वनमें जानेके लिये तैयार हो गया और उनसे कहने लगा, ‘बेटा! वनमें रहकर मुझे क्या करना चाहिये, यह मुझसे विस्तारपूर्वक कहो | (७७) मैं बड़ा मुर्ख हूँ, अबतक कर्मवश स्नेह-पाशमें बँधा हुआ अपंगकी भाति इस घररूप अँधेरे कुएँमें ही पड़ा रहा हूँ | तुम बड़े दयालु हो, इससे मेरा उद्धार करो |’ (७८)
गोकर्णने कहा – पिताजी! यह शरीर हड्डी, मांस और रुधिरका पिण्ड है; इसे आप ‘मै’ मानना छोड़ दें और स्त्री-पुत्रादिको ‘अपना’ कभी न माने | इस संसारको रात-दिन क्षणभंगुर देखें, इसकी किसी भी वस्तुको स्थाई समझकर उसमें राग न करें | बस, एकमात्र वैराग्य-रसके रसिक होकर भगवानकी भक्तिमें लगे रहें | (७९) भगवद्भजन ही सबसे बड़ा धर्म है, निरंतर उसीका आश्रय लिये रहें | अन्य सब प्रकारके लौकिक धर्मोंसे मुख मोड़ लें | सदा साधुजनों की सेवा करें | भोगोंकी लालसाको पास न फटकने दें तथा जल्दी-से-जल्दी दूसरोंके गुण-दोषोंका विचार करना छोड़कर एकमात्र भगवत्सेवा और भगवान् की कथाओंके रसका ही पान करें | (८०)
इस प्रकार पुत्रकी वाणीसे प्रभावित होकर आत्मदेवने घर छोड़ दिया और वनकी यात्रा की | यद्दपि उसकी आयु उस समय साठ वर्ष की हो चुकी थी, फिर भी बुद्धिमें पूरी दृढ़ता थी | वहाँ रात-दिन भगवान् की सेवा-पूजा करनेसे और नियमपूर्वक भागवतके दशमस्कंधका पाठ करनेसे उसने भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रको प्राप्त कर लिया | (७१)

*** जय श्रीहरि ***

श्रीमद्भागवतमहात्म्य पाँचवाँ अध्याय धुन्धुकारीको प्रेतयोनिकी प्राप्ति और उससे उद्धार

|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||
|| श्री हरी ||
श्रीमद्भागवतमहात्म्य
पाँचवाँ अध्याय
धुन्धुकारीको प्रेतयोनिकी प्राप्ति और उससे उद्धार

सूतजी कहते हैं - शौनकजी! पिताके वन चले जानेपर एक दिन धुन्धुकारीने अपनी माताको बहुत पीटा और कहा – ‘बता, धन कहाँ रखा है ? नहीं तो अभी तेरी लुआठी (जलती लकड़ी) से खबर लूँगा |’ (१) उसकी इस धमकीसे डरकर और पुत्रके उपद्रवोंसे दुखी होकर वह रात्रीके समय कुएँमें जा गिरी और इसीसे उसकी मृत्यु हो गयी | (२) योगनिष्ठ गोकर्णजी तीर्थयात्राके लिये निकल गये | उन्हें इन घटनाओंसे कोई सुख या दुःख नहीं होता था; क्योंकि उनका न कोई मित्र था न शत्रु | (३)
धुन्धुकारी पाँच वेश्याओंके साथ घरमें रहने लगा | उनके लिए भोग-सामग्री जुटानेकी चिन्ताने उसकी बुद्धि नष्ट कर दी और वह नाना प्रकारके अत्यंत क्रूर कर्म करने लगा | (४) एक दिन उन कुलटाओंने उससे बहुत-से गहने माँगे | वह तो कामसे अँधा हो रहा था, मौतकी उसे कभी याद नहीं आती थी | बस, उन्हें जुटानेके लिए वह घरसे निकल पड़ा | (५) वह जहाँ-तहाँसे बहुत-सा धन चुराकर घर लौट आया तथा उन्हें कुछ सुंदर वस्त्र और आभूषण लाकर दिये | (६) चोरीका बहुत माल देखकर रात्रिके समय स्त्रियोंने विचार किया कि ‘ये नित्य ही चोरी करता है, इसलिये इसे किसी दिन अवश्य राजा पकड़ लेगा | (७) राजा यह सारा धन छीनकर इसे निश्च्रय ही प्राणदण्ड देगा | जब एक दिन इसे मरना ही है, तब हम ही धनकी रक्षाके लिए गुप्तरूपसे इसको क्यों न मार डालें | (८) इसे मारकर हम इसका माल-मता लेकर जहाँ-कहीं चली जायँगी |’ एसा निश्च्रय कर उन्होंने सोये हुए धुन्धुकारीको रस्सियोंसे कस दिया और उसके गलेमें फाँसी लगाकर उसे मारनेका प्रयत्न किया | इससे जब वह जल्दी न मरा, तो उन्हें बड़ी चिन्ता हुई | (९-१०) तब उन्होंने उसके मुखपर बहुत-से दहकते अँगारे डाले; इससे वह अग्निकी लपटोंसे बहुत छटपटाकर मर गया | (११) उन्होंने उसके शरीरको एक गड्डेमें डालकर गाड़ दिया | सच है, स्त्रियाँ प्रायः बड़ी दु:साहसी होती हैं | उनके इस कृत्यका किसीको भी पता न चला | (१२) लोगोंके पूछनेपर वह कह देती थीं कि ‘हमारे प्रियतम पैसे के लोभसे अबकी बार कहीं दूर चले गये हैं, इसी वर्षके अंदर लौट आयेंगे |’ (१३) बुद्धिमान् पुरुषको दुष्टा स्त्रियोंका कभी विश्वास न करना चाहिये | जो मुर्ख इनका विश्वास करता है, उसे दुखी होना पड़ता है | (१४) इनकी वाणी तो अमृतके समान कामियोंके ह्रदयमें रसका संचार करती है; किन्तु ह्रदय छूरेकी धारके समान तीक्ष्ण होता है | भला, इन स्त्रियोंका कौन प्यारा है ? (१५)
वे कुलटाएँ धुन्धुकारीकी सारी सम्पत्ति समेटकर वहाँसे चंपत हो गयीं; उनके ऐसे न जाने कितने पति थे | और धुन्धुकारी अपने कुकर्मोंके कारण भयंकर प्रेत हुआ | (१६) वह बवंडरके रूपमें सर्वदा दासों दिशाओंमें भटकता रहता था तथा शीत-धामसे सन्तप्त और भूख-प्याससे व्याकुल होनेके कारण ‘हा दैव! हा दैव!’ चिल्लाता रहता था | परन्तु उसे कहीं भी कोई आश्रय न मिला | कुछ काल बीतनेपर गोकर्णने भी लोगोंके मुखसे धुन्धुकारीकी मृत्युका समाचार सुना | (१७-१८) तब उसे अनाथ समझकर उन्होंने उसका गयाजीमें श्राद्ध किया; और भी जहाँ-जहाँ वे जाते थे, उसका श्राद्ध अवश्य करते थे | (१९)
इस प्रकार घूमते-घूमते गोकर्णजी अपने नगरमें आये और रात्रिके समय दूसरोंकी दृष्टिसे बचकर सीधे अपने घरके आँगनमें सोनेके लिए पहुँचे | (२०) वहाँ अपने भाईको सोया देख आधी रातके समय धुन्धुकारीने अपना बड़ा विकट रूप दिखाया | (२१) वह कभी भेड़ा, कभी हाथी, कभी भैंसा, कभी इन्द्र और कभी अग्निका रूप धारण करता | अन्तमें वह मनुष्यके आकारमें प्रकट हुआ | (२२) ये विपरीत अवस्थाएँ देखकर गोकर्णने निश्च्रय किया कि यह कोई दुर्गतिको प्राप्त हुआ जीव है | तब उन्होंने उससे धैर्यपूर्वक पूछा | (२३)
गोकर्णने कहा – तू कौन है ? रात्रिके समय ऐसे भयानक रूप क्यों दिखा रहा है ? तेरी यह दशा कैसे हुई ? हमें बता तो सही – तू प्रेत है, पिशाच है अथवा कोई राक्षस है ? (२४)
सूतजी कहते हैं – गोकर्णके इस प्रकार पूछनेपर वह बार-बार जोर-जोरसे रोने लगा | उसमें बोलनेकी शक्ति नहीं थी, इसलिए उसने केवल संकेतमात्र किया | (२५) तब गोकर्णने अंजलिमें जल लेकर उसे अभिमन्त्रित करके उसपर छिड़का | इससे उसके पापोंका कुछ शमन हुआ और वह इस प्रकार कहने लगा | (२६)
प्रेत बोला – ‘मैं तुम्हारा भाई हूँ | मेरा नाम है धुन्धुकारी | मैंने अपने ही दोषसे अपना ब्राह्मणत्व नष्ट कर दिया | (२७) मेरे कुकर्मोंकी गिनती नहीं की जा सकती | मैं तो महान् अज्ञानमें चक्कर काट रहा था | इसीसे मैंने लोगोंकी बड़ी हिंसा की | अन्तमें कुलटा स्त्रियोंने मुझे तड़पा-तड़पाकर मार डाला | (२८) इसीसे अब प्रेत-योनिमें पड़कर यह दुर्दशा भोग रहा हूँ | अब दैववश कर्मफलका उदय होनेसे मैं केवल वायुभक्षण करके जी रहा हूँ | (२९) भाई! तुम दयाके समुद्र हो; अब किसी प्रकार जल्दी ही मुझे इस योनीसे छुड़ाओ |’ गोकर्णने धुन्धुकारीकी सारी बातें सुनीं और तब उससे बोले | (३०)
गोकर्णने कहा – भाई! मुझे इस बातका बड़ा आश्चर्य है – मैंने तुम्हारे लिए विधिपूर्वक गयाजीमें पिण्डदान किया, फिर भी तुम प्रेतयोनिसे मुक्त कैसे नहीं हुए ? (३१) यदि गया-श्राद्धसे भी तुम्हारी मुक्ति नहीं हुई, तब इसका और कोई उपाय ही नहीं है | अच्छा, तुम सब बात खोलकर कहो – मुझे अब क्या करना चाहिये ? (३२)
प्रेतने कहा – मेरी मुक्ति सैकड़ों गया-श्राद्ध करनेसे भी नहीं हो सकती | अब तो तुम इसका कोई और उपाय सोचो | (३३)
प्रेतकी यह बात सुनकर गोकर्णको बड़ा आश्चर्य हुआ | वे कहने लगे – ‘यदि सैकड़ों गया-श्राद्धोंसे भी तुम्हारी मुक्ति नहीं हो सकती, तब तो तुम्हारी मुक्ति असम्भव ही है | (३४) अच्छा, अभी तो तुम निर्भय होकर अपने स्थान पर रहो; मैं विचार करके तुम्हारी मुक्तिके लिये कोई दूसरा उपाय करूँगा |’ (३५)
गोकर्णकी आज्ञा पाकर धुन्धुकारी वहाँसे अपने स्थानपर चला आया | इधर गोकर्णने रातभर विचार किया, तब भी उन्हें कोई उपाय नहीं सूझा | (३६) प्रातःकाल उनको आया देख लोग प्रेमसे उनसे मिलने आये | तब गोकर्णने रातमें जो कुछ जिस प्रकार हुआ था, वह सब उन्हें सुना दिया | (३७) उनमें जो लोग विद्वान्, योगनिष्ठ, ज्ञानी और वेदज्ञ थे, उन्होंने भी अनेकों शास्त्रोंको उलट-पलटकर देखा; तो भी उसकी मुक्तिका कोई उपाय न मिला | (३८) तब सबने यही निश्च्रय किया कि इस विषयमें सूर्यनारायण जो आज्ञा करें, वही करना चाहिये | अतः गोकर्णने अपने तपोबलसे सूर्यकी गतिको रोक दिया | (३९) उन्होंने स्तुति की – ‘भगवन्! आप सारे संसारके साक्षी हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ | आप मुझे कृपा करके धुन्धुकारीकी मुक्तिका साधन बताइये |’ गोकर्णकी यह प्रार्थना सुनकर सूर्यदेवने दूरसे ही स्पष्ट शब्दोंमें कहा – ‘श्रीमद्भागवतसे मुक्ति हो सकती है, इसलिए तुम उसका सप्ताह-परायण करो |’ सूर्यका यह धर्ममय वचन वहाँ सभीने सुना | (४०-४१) तब सबने यही कहा कि ‘प्रयत्नपूर्वक यही करो, है भी यह साधन बहुत सारल |’ अतः गोकर्णजी भी तदनुसार निश्च्रय करके कथा सुनानेके लिए तैयार हो गये | (४२)
देश और गाँवोंसे अनेकों लोग कथा सुननेके लिये आये | बहुत-से लँगड़े-लूले, अंधे, बूढ़े और मन्दबुद्धि पुरुष भी अपने पापोंकी निवृत्तिके उद्देश्यसे वहाँ आ पहुँचे | (४३) इस प्रकार वहाँ इतनी भीड़ हो गयी कि उसे देखकर देवताओंको भी आश्चर्य होता था | जब गोकर्णजी व्यासगद्दीपर बैठकर कथा कहने लगे, तब वह प्रेत भी वहाँ आ पहुँचा और इधर-उधर बैठनेके लिये स्थान ढूँढने लगा | इतनेमें ही उसकी दृष्टि एक सीधे रखे हुए सात गाँठके बाँसपर पड़ी | (४४-४५) उसीके नीचेके छिद्रमें घुसकर वह कथा सुननेके लिये बैठ गया | वायुरूप होनेके कारण वह बाहर कहीं बैठ नहीं सकता था, इसलिये बाँसमें घुस गया | (४६)
गोकर्णजीने एक वैष्णव ब्राह्मणको मुख्य श्रोता बनाया और प्रथमस्कन्धसे ही स्पष्ट स्वरमें कथा सुनानी आरम्भ कर दी | (४७) सायंकालमें जब कथाको विश्राम दिया, तब एक बड़ी विचित्र बात हुई | वहाँ सभासदोंके देखते-देखते उस बाँसकी एक गाँठ तड़-तड़ शब्द करती फट गयी | (४८) इसी प्रकार दूसरे दिन सायंकालमें दूसरी गाँठ फटी और तीसरे दिन उसी समय तीसरी | (४९) इस प्रकार सात दिनोंमें सातों गाठोंको फोड़कर धुन्धुकारी बारहों स्कन्धोंके सुनने से पवित्र होकर प्रेतयोनिसे मुक्त हो गया और दिव्यरूप धारण करके सबके सामने प्रकट हुआ | उसका मेघके समान श्याम शरीर पीताम्बर और तुलसीकी मालाओंसे सुशोभित था तथा सरपर मनोहर मुकुट और कानोंमें कमनीय कुंडल झिलमिला रहे थे | (५०-५१) उसने तुरंत अपने भाई गोकर्ण को प्रणाम करके कहा – ‘भाई! तुमने कृपा करके मुझे प्रेतयोनिकी यातनाओंसे मुक्त कर दिया | (५२) यह प्रेतपीड़ाका नाश करनेवाली श्रीमद्भागवतकी कथा धन्य है तथा श्रीकृष्णचन्द्रके धामकी प्राप्ति करानेवाला इसका सप्ताह-परायण भी धन्य है! | (५३) जब सप्ताह-श्रवणका योग लगता है, तब सब पाप थर्रा उठते हैं कि अब यह भागवतकी कथा जल्दी ही हमारा अन्त कर देगी | (५४) जिस प्रकार आग गीली-सूखी, छोटी-बड़ी – सब तरह की लकड़ियोंको जला डालती है, उसी प्रकार यह सप्ताह-श्रवण मन, वचन और कर्मद्वारा किये हुए नये-पुराने, छोटे-बड़े – सभी प्रकारके पापोंको भस्म कर देता है | (५५)
विद्वानोंने देवताओंकी सभामें कहा है कि जो लोग इस भारतवर्षमें श्रीमद्भागवतकी कथा नहीं सुनते, उनका जन्म वृथा ही है | (५६) भला, मोहपूर्वक लालन-पालन करके यदि इस अनित्य शरीरको हष्ट-पुष्ट और बलवान् भी बना लिया तो भी श्रीमद्भागवतकी कथा सुने बिना इससे क्या लाभ हुआ ? (५७) अस्थियाँ ही इस शरीरके आधारस्तम्भ हैं, नस-नाडीरूप रस्सियोंसे यह बँधा हुआ है, ऊपरसे इसपर मांस और रक्त थोपकर इसे चर्मसे मँढ़ दिया गया है | इसके प्रत्येक अंगमें दुर्गन्ध आती है; क्योंकि है तो यह मल-मूत्रका भाण्ड ही | (५८) वृद्धावस्था और शोकके कारण यह परिणाममें दुःखमय ही है, रोगोंका तो घर ही ठहरा | यह निरन्तर किसी-न-किसी कामनासे पीड़ित रहता है, कभी इसकी तृप्ति नहीं होती | इसे धारण किये रहना भी एक भार ही है; इसके रोम-रोममें दोष भरे हुए हैं और नष्ट होनेमें इसे एक क्षण भी नहीं लगता | (५९) अन्तमें यदि इसे गाड़ दिया जाता है तो इसके कीड़े बन जाते हैं; कोई पशु खा जाता है तो यह विष्ठा हो जाता है और अग्निमें जला दिया जाता है तो भस्मकी ढेरी हो जाता है | ये तीन ही इसकी गतियाँ बतायी गयी हैं | ऐसे अस्थिर शरीरसे मनुष्य अविनाशी फल देनेवाला काम क्यों नहीं बना लेता ? (६०) जो अन्न प्रातःकाल पकाया जाता है, वह सायंकालतक बिगड़ जाता है; फिर उसीके रससे पुष्ट हुए शरीरकी नित्यता कैसी | (६१)
इस लोकमें सप्ताहश्रवण करनेसे भगवान् की शीघ्र ही प्राप्ति हो सकती है | अतः सब प्रकारके दोषोंकी निवृत्तिके लिये एकमात्र यही साधन है | (६२) जो लोग भागवतकी कथासे वंचित हैं, वे तो जलमें बुद्बुदे और जीवोंमें मच्छरोंके समान केवल मरनेके लिए ही पैदा होते हैं | (६३) भला, जिसके प्रभावसे जड़ और सूखे हुए बाँसकी गाँठे फट सकती हैं, उस भागवतकथाका श्रवण करनेसे चितकी गाँठोंका खुल जाना कौन बड़ी बात है | (६४) सप्ताह-श्रवण करनेसे मनुष्यके ह्रदयकी गाँठ खुल जाती है, उसके समस्त संशय छिन्न-भिन्न हो जाते हैं और सारे कर्म क्षीण हो जाते हैं | (६५) यह भागवतकथारूप तीर्थ संसारके कीचड़को धोनेमें बड़ा ही पटु है | विद्वानोंका कथन है कि जब यह ह्रदयमें स्थित हो जाता है, तब मनुष्य की मुक्ति निश्च्रित ही समझनी चाहिये |’ (६६)
जिस समय धुन्धुकारी ये सब बातें कह रहा था, जिसके लिये वैकुण्ठवासी पार्षदोंके सहित एक विमान उतरा; उससे सब ओर मण्डलाकार प्रकाश फैल रहा था | (६७) सब लोगोंके सामने ही धुन्धुकारी उस विमानपर चढ़ गया | तब उस विमानपर आये हुए पार्षदोंको देखकर उनसे गोकर्णने यह बात कही | (६८)
गोकर्णने पूछा – भगवान् के प्रिय पार्षदो! यहाँ तो हमारे अनेकों शुद्धह्रदय श्रोतागण हैं, उन सबके लिये आपलोग एक साथ बहुत-से विमान क्यों नहीं लाये ? हम देखते हैं की यहाँ सभीने समानरूपसे कथा सुनी है, फिर फलमें इस प्रकारका भेद क्यों हुआ, यह बताइये | (६९-७०)
भगवान् के सेवकोंने कहा – हे मानद! इस फलभेदका कारण इनके श्रवणका भेद ही है | यह ठीक है की श्रवण तो सबने सामानरूपसे ही किया है, किन्तु इसके-जैसा मनन नहीं किया | इसीके साथ भजन करनेपर भी उसके फलमें भेद रहा | (७१) इस प्रेतने सात दिनोंतक निराहार रहकर श्रवण किया था, तथा सुने हुए विषयका स्थिरचितसे यह खूब मनन-निदिध्यासन भी करता रहता था | (७२) जो ज्ञान दृढ़ नहीं होता, वह व्यर्थ हो जाता है | इसी प्रकार ध्यान न देनेसे श्रवणका, संदेहसे मन्त्रका और चित्त के इधर-उधर भटकते रहनेसे जपका भी कोई फल नहीं होता | (७३) वैष्णवहीन देश, अपात्रको कराया हुआ श्राद्धका भोजन, अश्रोत्रियको दिया हुआ दान एवं आचारहीन कुल – इन सबका नाश हो जाता है | (७४) गुरुवचनोंमें विश्वास, दीनताका भाव, मनके दोषोंपर विजय और कथामें चित्तकी एकाग्रता इत्यादि नियमोंका यदि पालन किया जाय तो श्रवणका यथार्थ फल मिलता है | यदि ये श्रोता फिरसे श्रीमद्भागवतकी कथा सुनें तो निश्चय ही सबको वैकुण्ठकी प्राप्ति होगी | (७५-७६) और गोकर्णजी! आपको तो भगवान् स्वयं आकर गोलोकधाममें ले जायँगे | यों कहकर वे सब पार्षद हरिकिर्तन करते वैकुण्ठलोकको चले गये | (७७)
श्रावण मासमें गोकर्णजीने फिर उसी प्रकार सप्ताहक्रमसे कथा कही और उन श्रोताओंने उसे फिर सुना | (७८) नारदजी! इस कथा की समाप्तिपर जो कुछ हुआ, वह सुनिये | (७९) वहाँ भक्तोंसे भरे हुए विमानोंके साथ भगवान् प्रकट हुए | सब ओरसे खूब जय-जयकार और नमस्कारकी ध्वनियाँ होने लगीं | (८०) भगवान् स्वयं हर्षित होकर अपने पाञ्चजन्य शङ्खकी ध्वनि करने लगे और उन्होंने गोकर्णको ह्रदयसे लगाकर अपने ही समान बना लिया | (८१) उन्होंने क्षणभरमें ही अन्य सब श्रोताओंको भी मेघके समान श्यामवर्ण, रेशमी पीताम्बरधारी तथा किरीट और कुण्डलादि से विभूषित कर दिया | (८२) उस गाँवमें कुत्ते और चाण्डालपर्यन्त जितने भी जीव थे, वे सभी गोकर्णजीकी कृपासे विमानोंपर चढ़ा लिये गये | (८३) तथा जहाँ योगीजन जाते हैं, उस भगवद्धाममें वे भेज दिए गये | इस प्रकार भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण कथाश्रवणसे प्रसन्न होकर गोकर्णजीको साथ ले अपने ग्वालबालोंके प्रिय गोलोकधाममें चले गये | (८४) पूर्वकालमें जैसे अयोध्यावासी भगवान् श्रीरामके साथ साकेतधाम सिधारे थे, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण उन सबको योगिदुर्लभ गोलोकधामको ले गये | (८५) जिस लोकमें सूर्य, चन्द्रमा और सिद्धोंकी भी कभी गति नहीं हो सकती, उसमें वे श्रीमद्भागवत श्रवण करनेसे चले गये | (८६)
नारदजी! सप्ताहयज्ञके द्वारा कथा-श्रवण करनेसे जैसा उज्जवल फल संचित होता है, उसके विषयमें हम आपसे क्या कहें ? अजी! जिन्होंने अपने कर्णपुटसे गोकर्णजीकी कथाके एक अक्षरका भी पान किया था, वे फिर माताके गर्भमें नहीं आये | (८७) जिस गतिको लोग वायु, जल या पत्ते खाकर शरीर सुखानेसे, बहुत कालतक घोर तपस्या करनेसे और योगाभ्याससे भी नहीं पा सकते, उसे वे सप्ताहश्रवणसे सहजमें ही प्राप्त कर लेते हैं | (८८) इस परम पवित्र इतिहासका पाठ चित्रकूटपर विराजमान मुनीश्वर शाण्डिल्य भी ब्रह्मानन्दमें मग्न होकर करते रहते हैं | (८९) यह कथा बड़ी ही पवित्र है | एक बारके श्रवणसे ही समस्त पाप-राशिको भस्म कर देती है | यदि इसका श्राद्धके समय पाठ किया जाय, तो इससे पितृगणको बड़ी तृप्ति होती है और नित्य पाठ करनेसे मोक्षकी प्राप्ति होती है | (९०)

*** जय श्रीहरि ***

श्रीमद्भागवतमहात्म्य छठा अध्याय सप्ताहयज्ञकी विधि

|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||
|| श्री हरी ||
श्रीमद्भागवतमहात्म्य
छठा अध्याय
सप्ताहयज्ञकी विधि

श्रीसनकादि कहते हैं – नारदजी! अब हम आपको सप्ताहश्रवणकी विधि बताते हैं | यह विधि प्रायः लोगोंकी सहायता और धनसे साध्य कही गयी है | (१) पहले तो यत्नपूर्वक ज्योतिषीको बुलाकर मुहूर्त पूछना चाहिये तथा विवाहके लिये जिस प्रकार धनका प्रबन्ध किया जाता है उस प्रकार ही धनकी व्यवस्था इसके लिये करनी चाहिए | (२) कथा आरम्भ करनेमें भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, आषाढ़ और श्रावण – ये छः महीने श्रोताओंके लिये मोक्षकी प्राप्तिके कारण हैं | (३) देवर्षे! इन महीनोंमें भी भद्रा-व्यतीपात आदि कुयोंगोंको सर्वथा त्याग देना चाहिये | तथा दुसरे लोग जो उत्साही हों, उन्हें अपना सहायक बना लेना चाहिये | (४) फिर प्रयत्न करके देश-देशान्तरोंमें यह संवाद भेजना चाहिये कि यहाँ कथा होगी, सब लोगोंको सपरिवार पधारना चाहिये | (५) स्त्री और शूद्रादी भगवत्कथा एवं संकीर्तनसे दूर पड़ गये हैं | उनको भी सूचना हो जाय, ऐसा प्रबन्ध करना चाहिए | (६) देश-देशमें जो विरक्त वैष्णव और हरिकीर्तनके प्रेमी हों, उनके पास निमन्त्रण अवश्य भेजे | उसे लिखनेकी विधि इस प्रकार बतायी गयी है | (७) ‘महानुभावो! यहाँ सात दिनतक सत्पुरुषों का बड़ा दुर्लभ समागम रहेगा और अपूर्व रसमयी श्रीमद्भागवतकी कथा होगी | (८) आपलोग भगवद्रसके रसिक हैं, अतः श्रीमद्भागवतामृतका पान करनेके लिए प्रेमपूर्वक शीघ्र ही पधारनेकी कृपा करें | (९) यदि आपको विशेष अवकाश न हो, तो भी एक दिनके लिए तो अवश्य ही कृपा करनी चाहिये; क्योंकि यहाँका तो एक क्षण भी अत्यन्त दुर्लभ है |’ (१०) इस प्रकार विनयपूर्वक उन्हें निमन्त्रित करे और जो लोग आयें, उनके लिए यथोचित निवासस्थानका प्रबन्ध करे | (११)
कथा का श्रवण किसी तीर्थमें, वनमें अथवा अपने घरपर भी अच्छा माना गया है | जहाँ लंबा-चौड़ा मैदान हो, वहीं कथास्थल रखना चाहिये | (१२) भूमिका शोधन, मार्जन और लेपन करके रंग-बिरंगी धातुओंसे चौक पूरे | घरकी सारी सामग्री उठाकर एक कोनेमें रख दे | (१३) पाँच दिन पहलेसे ही यत्नपूर्वक बहुत-से बिछानेके वस्त्र एकत्र कर ले तथा केलेके खंभोंसे सुशोभित एक ऊँचा मण्डप तैयार कराये | (१४) उसे सब ओर फल, पुष्प, पत्र और चॅंदोवेसे अलंकृत करे तथा चारों ओर झंडियाँ लगाकर तरह-तरहके सामानोंसे सजा दे | (१५) उस मण्डपमें कुछ ऊँचाईपर सात विशाल लोकोंकी कल्पना करे और उनमें विरक्त ब्राह्मणोंको बुला-बुलाकर बैठाये | (१६) आगेकी ओर उनके लिये वहाँ यथोचित आसन तैयार रखे | इनके पीछे वक्ताके लिए भी एक दिव्य सिंहासनका प्रबन्ध करे | (१७) यदि वक्ताका मुख उत्तरकी ओर रहे, तो श्रोता पूर्वाभिमुख होकर बैठे और यदि वक्ता पूर्वाभिमुख रहे तो श्रोताको उत्तरकी ओर मुख करके बैठना चाहिये | (१८) अथवा वक्ता और श्रोताको पूर्वमुख होकर बैठना चाहिये | देश-काल आदिको जाननेवाले महानुभावोंने श्रोताके लिये ऐसा ही नियम बताया है | (१९) जो वेद-शास्त्रकी स्पष्ट व्याख्या करनेमें समर्थ हो, तरह-तरहके दृष्टान्त दे सकता हो तथा विवेकी और अत्यंत निःस्पृह हो, ऐसे विरक्त और विष्णुभक्त ब्राह्मणको वक्ता बनाना चाहिये | (२०) श्रीमद्भागवतके प्रवचनमें ऐसे लोगोंको नियुक्त नहीं करना चाहिये जो पण्डित होनेपर भी अनेक धर्मोंके चक्करमें पड़े हुए, स्त्री-लम्पट एवं पाखण्डके प्रचारक हों | (२१) वक्ताके पास ही उसकी सहायताके लिये एक वैसा ही विद्वान और स्थापित करना चाहिये | वह भी सब प्रकारके संशयोंकी निवृत्ति करनेमें समर्थ और लोगोंको समझानेमें कुशल हो | (२२)
कथा-प्रारम्भके दिनसे एक दिन पूर्व व्रत ग्रहण करनेके लिये वक्ताको क्षौर करा लेना चाहिये | तथा अरुणोदयके समय शौचसे निवृत्त होकर अच्छी तरह स्नान करे | (२३) और संध्यादि अपने नित्यकर्मों को संक्षेपसे समाप्त करके कथाके विघ्नोंकी निवृत्तिके लिए गणेशजी का पूजन करे | (२४) तदनंतर पितृगणका तर्पण कर पूर्व पापोंकी शुद्धिके लिए प्रायश्च्रित करे और एक मण्डल बनाकर श्रीहरि को स्थापित करे | (२५) फिर भगवान् श्रीकृष्णको लक्ष्य करके मंत्रोच्चारणपूर्वक क्रमशः षोडशोपचारविधिसे पूजन करे और उसके पश्चात् प्रदक्षिणा तथा नमस्कारादि कर इस प्रकार स्तुति करे | (२६) ‘करुणानिधान! मैं संसार-सागरमें डूबा हुआ और बड़ा दीन हूँ | कर्मोंके मोहरूपी ग्राहने मुझे पकड़ रक्खा है | आप इस संसार-सागरसे मेरा उद्धार कीजिये |’ (२७) इसके पश्चात् धुप-दीप आदि सामग्रियोंसे श्रीमद्भागवतकी भी बड़े उत्साह और प्रीतीपूर्वक विधि-विधानसे पूजा करे | (२८) फिर पुस्तकके आगे नारियल रखकर नमस्कार करे और प्रसन्नचितसे इस प्रकार स्तुति करे - (२९) ‘श्रीमद्भागवतके रूपमें आप साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्र ही विराजमान हैं | नाथ! मैंने भवसागरसे छुटकारा पानेके लिए आपकी शरण ली है | (३०) मेरा यह मनोरथ आप बिना किसी विघ्न-बाधाके सांगोपांग पूरा करें | केशव! मैं आपका दास हूँ |’ (३१)
इस प्रकार दीन वचन कहकर फिर वक्ताका पूजन करे | उसे सुन्दर वस्त्राभूषणसे विभूषित करे और फिर पूजाके पश्चात् उसकी इस प्रकार स्तुति करे – (३२) ‘शुकस्वरुप भगवन्! आप समझानेकी कलामें कुशल और सब शास्त्रोंमें पारंगत हैं; कृपया इस कथाको प्रकाशित करके मेरा अज्ञान दूर करें |’ (३३) फिर अपने कल्याणके लिए प्रसन्नतापूर्वक उसके सामने नियम ग्रहण करे और सात दिनोंतक यथाशक्ति उसका पालन करे | (३४) कथामें विघ्न न हो, इसके लिए पाँच ब्राह्मणोंको और वरण करे; वे द्वादशाक्षर मन्त्रद्वारा भगवानके नामोंका जप करें | (३५) फिर ब्राह्मण, अन्य विष्णुभक्त एवं कीर्तन करनेवालोको नमस्कार करके उनकी पूजा करे और उनकी आज्ञा पाकर स्वयं भी आसनपर बैठ जाय | (३६) जो पुरुष लोक, सम्पत्ति, धन, घर और पुत्रादिकी चिंता छोड़कर शुद्धचितसे केवल कथामें ही ध्यान रखता है, उसे इसके श्रवणका उत्तम फल मिलता है | (३७)
बुद्धिमान् वक्ताको चाहिये कि सूर्योदयसे कथा आरम्भ करके साढ़े तीन पहरतक माध्यम स्वरसे अच्छी तरह कथा बाँचे | (३८) दोपहरके समय दो घड़ीतक कथा बंद रखे | उस समय कथाके प्रसंगके अनुसार वैष्णवोंको भगवान् के गुणोंका कीर्तन करना चाहिये – व्यर्थ बातें नहीं करनी चाहिये | (३९) कथा के समय मल-मूत्रके वेगको काबूमें रखनेके लिए अल्पाहार सुखकारी होता है; इसलिये श्रोता केवल एक ही समय हविष्यान्न भोजन करे | (४०) यदि शक्ति हो तो सातों दिन निराहार रहकर कथा सुने अथवा केवल घी य दूध पीकर सुखपूर्वक श्रवण करे | (४१) अथवा फलाहार या एक समय ही भोजन करे | जिससे जैसा नियम सुभीतेसे सध सके, उसीको कथाश्रवणके लिए ग्रहण करे | (४२) मैं तो उपवासकी अपेक्षा भोजन करना अच्छा समझता हूँ, यदि वह कथाश्रवणमें सहायक हो | यदि उपवाससे श्रवणमें बाधा पहुँचती हो तो वह किसी कामका नहीं | (४३)
नारदजी! नियमसे सप्ताह सुननेवाले पुरुषोंके नियम सुनिये | विष्णुभक्तकी दीक्षासे रहित पुरुष कथाश्रवणका अधिकारी नहीं है | (४४) जो पुरुष नियमसे कथा सुने, उसे ब्रह्मचर्यसे रहना, भूमिपर सोना और नित्यप्रति कथा समाप्त होनेपर पत्तलमें भोजन करना चाहिए | (४५) दाल, मधु, तेल, गरिष्ठ अन्न, भावदूषित पदार्थ और बासी अन्न – इनका उसे सर्वदा ही त्याग करना चाहिये | (४६) काम, क्रोध, मद, मान, मत्सर, लोभ, दंभ, मोह और द्वेषको तो अपने पास भी नहीं फटकने देना चाहिये | (४७) वह वेद, वैष्णव, ब्राह्मण, गुरु, गोसेवक तथा स्त्री, राजा और महापुरुषोंकी निन्दासे भी बचे | (४८) नियमसे कथा सुननेवाले पुरुषको रजस्वला स्त्री, अन्त्यज, म्लेच्छ, पतित, गायत्रीहीन द्विज, ब्राह्मणोंसे द्वेष करनेवाले तथा वेदको न माननेवाले पुरुषोंसे बात नहीं करनी चाहिये | (४९) सर्वदा सत्य, शौच, दया, मौन, सरलता, विनय और उदारताका बर्ताव करना चाहिये | (५०) धनहीन, क्षयरोगी, किसी अन्य रोगसे पीड़ित, भाग्यहीन, पापी, पुत्रहीन और मुमुक्षु भी यह कथा श्रवण करे | (५१) जिस स्त्रीका रजोदर्शन रुक गया हो, जिसके एक ही संतान होकर रह गयी हो, जो बाँझ हो, जिसकी संतान होकर मर जाती हो अथवा जिसका गर्भ गिर जाता हो, वह यत्नपूर्वक इस कथा को सुने | (५२) ये सब यदि विधिवत् कथा सुनें तो इन्हें अक्षय फलकी प्राप्ति हो सकती है | यह अत्युत्तम दिव्य कथा करोड़ो यज्ञोंका फल देनेवाली है | (५३)
इस प्रकार इस व्रतकी विधियोंका पालन करके फिर उद्दापन करे | जिन्हें इसके विशेष फल की इच्छा हो, वे जन्माष्टमी-व्रतके समान ही इस कथाव्रतका उद्दापन करें | (५४) किन्तु जो भगवानके अकिञ्चन भक्त हैं, उनके लिए उद्दापनका कोई आग्रह नहीं है | वे श्रवणसे ही पवित्र हैं; क्योकि वे तो निष्काम भगवद्भक्त हैं | (५५)
इस प्रकार जब सप्ताहयज्ञ समाप्त हो जाय, तब श्रोताओंको अत्यंत भक्तिपूर्वक पुस्तक और वक्ताकी पूजा करनी चाहिये | (५६) फिर वक्ता श्रोताओंको प्रसाद, तुलसी और प्रसादी मालाएँ दे तथा सब लोग मृदंग और झाँझकी मनोहर ध्वनिसे सुंदर कीर्तन करें | (५७) जय-जयकार, नमस्कार और शङ्खध्वनिका घोष कराये तथा ब्राह्मण और याचकोंको धन और अन्न दे | (५८) श्रोता विरक्त हो तो कर्मकी शान्तिके लिए दुसरे दिन गीतापाठ करे; गृहस्थ हो तो हवन करे | (५९) उस हवनमें दशमस्कन्धका एक-एक श्लोक पढ़कर विधिपूर्वक खीर, मधु, घृत, तिल और अन्नादि सामग्रियोंसे आहुति दे | (६०)
अथवा एकाग्र चित्तसे गायत्री-मन्त्रद्वारा हवन करे; क्योंकि तत्वतः यह महापुराण गायत्रीस्वरुप ही है | (६१) होम करनेकी शक्ति न हो तो उसका फल प्राप्त करनेके लिये ब्राह्मणोंको हवनसामग्री दान करे तथा नाना प्रकारकी त्रुटियोंको दूर करनेके लिए और विधिमें फिर जो न्युनाधिकता रह गयी हो, उसके दोषोंकी शान्ति के लिये विष्णुसहस्रनामका पाठ करे | उससे सभी कर्म सफल हो जाते हैं; क्योकि कोई भी कर्म इससे बढ़कर नहीं है | (६२-६३)
फिर बारह ब्राह्मणोंको खीर और मधु आदि उत्तम-उत्तम पदार्थ खिलाये तथा व्रतकी पूर्तीके लिए गौ और सुवर्णका दान करे | (६४) सामर्थ्य हो तो तीन तोले सोनेका एक सिंहासन बनवाये, उसपर सुन्दर अक्षरोंमें लिखी हुई श्रीमद्भागवतकी पोथी रखकर उसकी आवाहनादि विविध उपचारोंसे पूजा करे और फिर जितेन्द्रिय आचार्यको – उसका वस्त्र, आभूषण एवं गन्धादिसे पूजनकर – दक्षिणाके सहित समर्पण कर दे | (६४-६६) यों करनेसे वह बुद्धिमान् दाता जन्म-मरणके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है | यह सप्ताहपारायण विधि सब पापोंकी निवृत्ति करनेवाली है | इसका इस प्रकार ठीक-ठीक पालन करनेसे यह मंगलमय भागवतपुराण अभीष्ट फल प्रदान करता है तथा अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष – चारोंकी प्राप्ति का साधन हो जाता है – इसमें संदेह नहीं | (६७-६८)
सनकादि कहते हैं – नारदजी! इस प्रकार तुम्हे यह सप्ताहश्रवण की विधि हमने पूरी-पूरी सुना दी, अब और क्या सुनना चाहते हो ? इस श्रीमद्भागवतसे भोग और मोक्ष दोनों ही हाथ लग जाते हैं | (६९)
सूतजी कहते हैं – शौनकजी! यों कहकर महामुनि सनकादिने एक सप्ताहतक विधिपूर्वक इस सर्व-पापनाशिनी, परम पवित्र तथा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली भागवतकथाका प्रवचन किया | सब प्राणियोंने नियमपूर्वक इसे श्रवण किया | इसके पश्चात् उन्होंने विधिपूर्वक भगवान् पुरुषोत्तमकी स्तुति की | (७०-७१) कथाके अन्तमें ज्ञान-वैराग्य और भक्तिको बड़ी पुष्टि मिली और वे तीनों एकदम तरुण होकर सब जीवोंका चित अपनी ओर आकर्षित करने लगे | (७२) अपना मनोरथ पूरा होनेसे नारदजीको भी बड़ी प्रसन्नता हुई, उनके सारे शरीरमें रोमाञ्च हो आया और वे परमानन्दसे पूर्ण हो गये | (७३) इस प्रकार कथा श्रवणकर भगवान् के प्यारे नारदजी हाथ जोड़कर प्रेमगद्गद् वाणीमें सनकादिसे कहने लगे | (७४)
नारदजीने कहा – मैं धन्य हूँ, आपलोगोंने करुणा करके मुझे बड़ा ही अनुग्रहित किया है, आज मुझे सर्वपापहारी भगवान् श्रीहरिकी प्राप्ति हो गयी | (७५) तपोधानो! मैं श्रीमद्भागवतश्रवणको ही सब धर्मोंसे श्रेष्ठ मानता हूँ; क्योंकि इसके श्रवणसे वैकुण्ठ (गोलोक) – विहारी श्रीकृष्णकी प्राप्ति होती है | (७६)
सूतजी कहते हैं – शौनकजी! वैष्णवश्रेष्ठ नारदजी यों कह ही रहे थे कि वहाँ घूमते-फिरते योगेश्वर शुकदेवजी आ गये | (७७) कथा समाप्त होते ही व्यासनन्दन श्रीशुकदेवजी वहाँ पधारे | सोलह वर्षकी-सी आयु, आत्मलाभसे पूर्ण, ज्ञानरूपी महासागरका संवर्धन करनेके लिये चन्द्रमाके सामान वे प्रेमसे धीरे-धीरे श्रीमद्भागवतका पाठ कर रहे थे | (७८) परम तेजस्वी शुकदेवजीको देखकर सारे सभासद् झटपट खड़े हो गये और उन्हें एक ऊँचे आसनपर बैठाया | फिर देवर्षि नारदजीने उनका प्रेमपूर्वक पूजन किया | उन्होंने सुखपूर्वक बैठकर कहा – ‘आपलोग मेरी निर्मल वाणी सुनिये |’ (७९)
श्रीशुकदेवजी बोले – रसिक एवं भावुक जन! यह श्रीमद्भागवत वेदरूप कल्पवृक्षका परिपक्त फल है | श्रीशुकदेवरूप शुकके मुखका संयोग होनेसे अमृतरससे परिपूर्ण है | यह रस-ही-रस है – इसमें न छिलका है न गुठली | यह इसी लोकमें सुलभ है | जबतक शरीरमें चेतना रहे, तबतक आपलोग बार-बार इसका पान करें | (८०) महामुनि व्यासदेवने श्रीमद्भागवत महापुराणकी रचना की है | इसमें निष्कपट – निष्काम परमधर्मका निरूपण है | इसमें शुद्धान्तःकरण सत्पुरुषोंके जानने योग्य कल्याणकारी वास्तविक वास्तुका वर्णन है, जिससे तीनों तापोंकी शान्ति होती है | इसका आश्रय लेनेपर दुसरे शास्त्र अथवा साधनकी आवश्यकता नहीं रहती | जब कभी पुण्यात्मा पुरुष इसके श्रवणकी इच्छा करते हैं, तभी ईश्वर अविलम्ब उनके ह्रदयमें अवरुद्ध हो जाता है | (८१) यह भागवत पुराणोंका तिलक और वैष्णवोंका धन है | इसमें परमहंसोंके प्राप्य विशुद्ध ज्ञान का ही वर्णन किया गया है तथा ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के सहित निवृत्तिमार्गको प्रकाशित किया गया है | जो पुरुष भक्तिपूर्वक इसके श्रवण, पठन और मननमें तत्पर रहता है, वह मुक्त हो जाता है | (८२) यह रस स्वर्गलोक, सत्यलोक, कैलास और वैकुण्ठमें भी नहीं है | इसलिए भाग्यवान् श्रोताओं! तुम इसका खूब पान करो; उसे कभी मत छोड़ो, मत छोड़ो | (८३)
सूतजी कहते हैं – श्रीशुकदेवजी इस प्रकार कह ही रहे थे कि उस सभाके बीचोबीच प्रह्र्लाद, बलि, उद्धव और अर्जुन आदि पार्षदोंके सहित साक्षात् श्रीहरि प्रकट हो गये | तब देवर्षि नारदने भगवान् और उनके भक्तोंकी यथोचित पूजा की | (८४) भगवानको प्रसन्न देखकर देवर्षिने उन्हें एक विशाल सिंहासनपर बैठा दिया और सब लोग उनके सामने संकीर्तन करने लगे | उस कीर्तनको देखनेके लिये श्रीपार्वतीजीके सहित महादेवजी और ब्रह्माजी भी आये | (८५) कीर्तन आरम्भ हुआ | प्रह्र्लादजी तो चञ्चलगति (फुर्तीले) होनेके कारण करताल बजाने लगे, उद्धवजीने झाँझें उठा लीं, देवर्षि नारद वीणाकी ध्वनि करने लगे, स्वर-विज्ञान (गान-विद्या) में कुशल होनेके कारण अर्जुन राग अलापने लगे, इन्द्रने मृदंग बजाना आरम्भ किया, सनकादि बीच-बीचमें जयघोष करने लगे और इन सबके आगे शुकदेवजी तरह-तरहकी सरस अंगभंगी करके भाव बताने लगे | (८६) इन सबके बीचमें परम तेजस्वी भक्ति, ज्ञान और वैराग्य नटोंके समान नाचने लगे | एसा अलौकिक कीर्तन देखकर भगवान् प्रसन्न हो गये और इस प्रकार कहने लगे - | (८७) ‘मैं तुम्हारी इस कथा और कीर्तनसे बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हारे भक्तिभावने इस समय मुझे अपने वशमें कर लिया है | अतः तुमलोग मुझसे वर माँगो |’ भगवानके ये वचन सुनकर सब लोग बड़े प्रसन्न हुए और प्रेमार्द्र चित्तसे भगवान् से कहने लगे | (८८) ‘भगवन्! हमारी यही अभिलाषा है कि भविष्यमें भी जहाँ-कहीं सप्ताह-कथा हो, वहाँ आप इन पार्षदोंके सहित अवश्य पधारें | हमारा यह मनोरथ पूर्ण कर दीजिये |’ भगवान् ‘तथास्तु’ कहकर अन्तर्धान हो गये | (८९)
इसके पश्चात् नारदजीने भगवान् तथा उनके पार्षदोंके चरणोंको लक्ष्य करके प्रणाम किया और फिर शुकदेवजी आदि तपस्वियोंको भी नमस्कार किया | कथामृतका पान करनेसे सब लोगोंको बड़ा ही आनन्द हुआ, उनका सारा मोह नष्ट हो गया | फिर वे सब लोग अपने-अपने स्थानोंको चले गये | (९०) उस समय शुकदेवजीने भक्तिको उसके पुत्रोंसहित अपने शास्त्रमें स्थापित कर दिया | इसीसे भागवतका सेवन करने से श्रीहरि वैष्णवोंके ह्रदयमें आ विराजते हैं | (१२) जो लोग दरिद्रताके दुःखज्वरकी ज्वालासे दग्ध हो रहे हैं, जिन्हें माया-पिशाचोने रौंद डाला है तथा जो संसार-समुद्रमें डूब रहे हैं, उनका कल्याण करनेके लिए श्रीमद्भागवत सिंहनाद कर रहा है | (९२)
शौनकजीने पूछा - सूतजी! शुकदेवजीने राजा परीक्षित् को, गोकर्णने धुन्धुकारीको और सनकादिने नारदजीको किस-किस समय यह ग्रन्थ सुनाया था – मेरा यह संशय दूर कीजिये! (९३)
सूतजीने कहा – भगवान् श्रीकृष्णके स्वधामगमनके बाद कलियुगके तीस वर्षसे कुछ अधिक बीत जानेपर भाद्रपद मासकी शुक्ला नवमीको शुकदेवजीने कथा आरम्भ की थी | (९४) राजा परीक्षित् के कथा सुननेके बाद कलियुगके दो सौ वर्ष बीत जाने पर आषाढ़ मासकी शुक्ला नवमीको गोकर्णजीने यह कथा सुनाई थी | (९५) इसके पीछे कलियुगके तीस वर्ष और निकल जानेपर कार्तिक शुक्ला नवमीसे सनकादिने कथा आरम्भ की थी | (१६) निष्पाप शौनकजी! आपने जो कुछ पूछा था, उसका उत्तर मैंने आपको दे दिया | इस कलियुगमें भागवतकी कथा भवरोगकी रामबाण औषध है | (९७)
संतजन! आपलोग आदरपूर्वक उस कथामृतका पान कीजिये | यह श्रीकृष्णको अत्यंत प्रिय, सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला, मुक्तिका एकमात्र कारण और भक्तिको बढ़ानेवाला है | लोकमें अन्य कल्याणकारी साधनोंका विचार करने और तीर्थों का सेवन करनेसे क्या होगा | (९८) अपने दूतको हाथमें पाश लिए देखकर यमराज उसके कानमें कहते हैं – ‘देखो, जो भगवानकी कथावार्तामें मत्त हो रहे हों, उनसे दूर रहना; मैं औरोंको ही दण्ड देनेकी शक्ति रखता हूँ, वैष्णवोंको नही |’ (९९) इस असार संसारमें विषयरूप विषकी आसक्तिके कारण व्याकुल बुद्धिवाले पुरुषो! अपने कल्याणके उद्देश्यसे आधे क्षणके लिये भी इस शुककथारूप अनुपम सुधाका पान करो | प्यारे भाइयो! निन्दित कथाओंसे युक्त कुपथमें व्यर्थ ही क्यों भटक रहे हो ? इस कथाके कान में प्रवेश करते ही मुक्ति हो जाती है, इस बातके साक्षी राजा परीक्षित् हैं | (१००) श्रीशुकदेवजीने प्रेमरसके प्रवाहमें स्थिर होकर इस कथाको कहा था | इसका जिसके कण्ठसे सम्बन्ध हो जाता है, वह वैकुण्ठका स्वामी बन जाता है | (१०१) शौनकजी! मैंने अनेक शास्त्रोंको देखकर आपको यह परम गोप्य रहस्य अभी-अभी सुनाया है | सब शास्त्रोंके सिद्धान्तोंका यही निचोड़ है | संसारमें इस शुक्शास्त्रसे अधिक पवित्र और कोई वास्तु नहीं है; अतः आपलोग परमानन्दकी प्राप्तिके लिये इस द्वादशस्कन्धरूप रसका पान करें | (१०२) जो पुरुष नियमपूर्वक इस कथाका भक्ति-भावसे श्रवण करता है, और जो शुद्धान्तःकरण भगवद्भक्तोंके सामने इसे सुनाता है, वे दोनों ही विधिका पूरा-पूरा पालन करनेके कारण इसका यथार्थ फल पाते हैं – उनके लिये त्रिलोकीमें कुछ भी असाध्य नहीं रह जाता | (१०३)

|| श्रीमद्भागवतमहात्म्य समाप्त ||
|| हरिः ॐ तत्सत् ||
*** जय श्रीहरि ***