|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||
|| श्री हरी ||
श्रीमद्भागवतमहात्म्य
पहला अध्याय
सच्चिदानंदस्वरुप भगवान श्रीकृष्णको हम नमस्कार करते हैं, जो जगतकी उत्पत्ति, स्थिथि और विनाशके हेतु तथा आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक – तीनो प्रकारके तापोंका नाश करनेवाले हैं | (१)
जिस समय श्रीशुकदेवजीका यज्ञोपवीत संस्कार भी नहीं हुआ था तथा लौकिक-वैदिक कर्मोके अनुष्ठानका अवसर भी नहीं आया था, तभी उन्हें अकेले ही सन्यास लेनेके लिए घरसे जाते देखकर उनके पिता व्यासजी विरहसे कातर होकर पुकारने लगे – ‘बेटा! बेटा! तुम कहाँ जा रहे हो?’ उस समय वृक्षों ने तन्मय होनेके कारण श्रीशुकदेवजीकी ओरसे उत्तर दिया था | ऐसे सर्वभूत ह्रदयस्वरुप श्रीशुकदेवमुनिको मैं नमस्कार करता हूँ | (२)
एक बार भगवतकथामृतका रसास्वादन करनेमें कुशल मुनिवर शौनकजीने नैमिषारन्य क्षेत्रमें विराजमान महामति सूतजीको नमस्कार करके उनसे पूछा | (३)
शौनकजी बोले – सूतजी! आपका ज्ञान अज्ञानान्धकारको नष्ट करनेके लिए करोड़ों सूर्योंके समान है | आप हमारे कानो के लिए रसायन – अमृतस्वरुप सारगर्भित कथा कहिये | (४) भक्ति, ज्ञान और वैराग्यसे प्राप्त होनेवाले महान विवेककी वृद्धि किस प्रकार होती है तथा वैष्णवलोग किस तरह इस माया-मोहसे अपना पीछा छुड़ाते हैं ? (५) इस घोर कलिकालमें जीव प्रायः आसुरी स्वाभावके हो गए हैं, विविध क्लेशोंसे आक्रान्त इन जीवोंको शुद्ध (दैवीशक्तिसंपन्न) बनानेका सर्वश्रेष्ठ उपाय क्या है ? (६)
सूतजी! आप हमें कोई ऐसा शाश्वत साधन बताइये, जो सबसे अधिक कल्याणकारी तथा पवित्र करनेवालोंमें भी पवित्र हो तथा जो भगवान श्रीकृष्णकी प्राप्ति करा दे | (७) चिन्तामणि केवल लौकिक सुख दे सकती है और कल्पवृक्ष अधिक से अधिक स्वर्गीय संपत्ति दे सकता है; परन्तु गुरुदेव प्रसन्न होकर भगवानका योगीदुर्लभ नित्य वैकुण्ठ धाम दे देते हैं | (८)
सूतजीने कहा – शौनकजी! तुम्हारे ह्रदयमें भगवान का प्रेम है; इसलिए मैं विचारकर तुम्हे सम्पूर्ण सिद्धांतोंका निष्कर्ष सुनाता हूँ, जो जन्म-मृत्युके भयका नाश कर देता है | (९) जो भक्तिके प्रवाह को बढ़ाता है और भगवान श्रीकृष्णकी प्रसन्नताका प्रधान कारण हैं, मैं तुम्हे वह साधन बतलाता हूँ; उसे सावधान होकर सुनो | (१०) श्रीशुकदेवजीने कलियुगमें जीवोंके कालरूपी सर्पके मुखका ग्रास होनेके त्रासका आत्यंतिक नाश करनेके लिये श्रीमद्भागवतशास्त्रका प्रवचन किया है | (११) मन की शुधिके लिए इससे बढ़कर कोई साधन नहीं है | जब मनुष्यके जन्म-जन्मान्तरका पुण्य उदय होता है, तभी उसे इस भागवतशास्त्रकी प्राप्ति होती है | (१२) जब शुकदेवजी राजा परीक्षितको यह कथा सुनानेके लिए सभा में विराजमान हुए, तब देवतालोग उनके पास अमृतका कलश लेकर आये | (१३) देवता अपना काम बनानेमें बड़े कुशल होते हैं; अतः यहाँ भी सबने शुकदेवमुनिको नमस्कार करके कहा, ‘आप यह अमृत लेकर बदलेमें हमें कथामृत का दान दीजिये | (१४) इस प्रकार परस्पर विनिमय (अदला-बदली) हो जानेपर राजा परीक्षित अमृतका पान करें और हम सब श्रीमद्भागवतरूप अमृत का पान करेंगे |’ (१५) इस संसार में कहाँ काँच और कहा महामुल्य मणि तथा कहाँ सुधा और कहाँ कथा ? श्रीशुकदेवजीने (यह सोंचकर) उस समय देवताओंकी हंसी उड़ा दी | (१६) उन्हें भक्तिशुन्य (कथाका अनधिकारी) जानकार कथामृतका दान नहीं किया | इस प्रकार यह श्रीमद्भागवतकी कथा देवताओंको भी दुर्लभ है | (१७)
पूर्वकालमें श्रीमद्भागवतके श्रवणसे ही राजा परीक्षितकी मुक्ति देखकर ब्रह्माजीको भी बड़ा आश्चर्य हुआ था | उन्होंने सत्यलोकमें तराजू बांधकर सब साधनों को तौला | (१८) अन्य सभी साधन तौलमें हल्के पड़ गए, अपने महत्वके कारण भागवत ही सबसे भारी रहा | यह देखकर सभी ऋषियोंको बड़ा विस्मय हुआ | (१९) उन्होंने कलियुगमें इस भगवद्रूप भागवतशास्त्रको ही पढने-सुननेसे तत्काल मोक्ष देनेवाला निश्च्रय किया | (२०) सप्ताह विधिसे श्रवण करनेपर यह निश्चय भक्ति प्रदान करता है | पूर्वकालमें इसे दयापरायण सनकादीने देवर्षि नारदको सुनाया था | (२१) यद्दपि देवर्षिने पहले ब्रह्माजीके मुखसे इसे श्रवण कर लिया था, तथापि सप्ताहश्रवणकी विधि तो उन्हें सनकादीने ही बतायी थी | (२२)
शौनकजीने पूछा – सांसारिक प्रपंचोसे मुक्त एवं विचरणशील नारदजीका सनकादीके साथ संयोग कहाँ हुआ और विधि-विधानके श्रवणमें उनकी प्रीती कैसे हुई ? (२३)
सूतजीने कहा – अब मैं तुम्हे वह भक्तिपूर्ण कथानक सुनाता हूँ, जो की श्रीशुकदेवजीने मुझे अपना अनन्य शिष्य जानकार एकांतमें सुनाया था | (२४) एक दिन विशालापूरीमें वे चारों निर्मल ऋषि सत्संगके लिए आये | वहां उन्होंने नारदजीको देखा | (२५)
सनकादिने पूछा – ब्रहमन! आपका मुख उदास क्यों हो रहा है ? आप चिंतातुर कैसे हैं ? इतनी जल्दी-जल्दी आप कहाँ जा रहे हैं ? और आपका आगमन कहाँसे हो रहा है ? (२६) इस समय तो आप उस पुरुषके समान व्याकुल जान पड़ते हैं जिसका सारा धन लुट गया हो; आप-जैसे आसक्तिरहित पुरुषोंके लिए यह उचित नहीं है | इसका कारण बताइये | (२७)
नारदजीने कहा – मैं सर्वोत्तम लोक समझकर प्रथ्वीमें आया था | यहाँ पुष्कर, प्रयाग, काशी, गोदावरी (नासिक), हरिद्वार, कुरुक्षेत्र, श्रीरंग और सेतुबांध आदि कई तीर्थोंमें मैं इधर-उधर विचरता रहा; किन्तु मुझे कहीं भी मनको संतोष देनेवाली शान्ति नहीं मिली | इस समय अधर्मके सहायक कलियुगने सारी पृथ्वीको पीड़ित कर रखा है | (२८-३०) अब यहाँ सत्य, तप, शौच (बाहर-भीतरकी पवित्रता), दया, दान आदि कुछ भी नहीं है | बेचारे जीव केवल अपना पेट पालने में लगे हुए हैं; वे असत्यभाशी, आलसी, मन्दबुद्धि, भाग्यहीन, उपद्रवग्रस्त हो गए हैं | जो साधू-संत कहे जाते हैं, वे पुरे पाखंडी हो गए हैं; देखने में तो वे विरक्त हैं; किन्तु स्त्री-धन आदि सभीका परिग्रह करते हैं | घरोंमें स्त्रियोंका राज्य है, साले सलाहकार बने हुए हैं, लोभसे लोग कन्या विक्रय करते हैं और स्त्री-पुरुषों में कलह मचा रहता है | (३१-३३) महात्माओंके आश्रम, तीर्थ और नदियोंपर यवनों (विधर्मियोंका) अधिकार हो गया है; उन दुष्टोंने बहुत से देवालय भी नष्ट कर दिए हैं | (३४) इस समय यहाँ न कोई योगी है न सिद्ध है; न ज्ञानी है और न सत्कर्म करनेवाला ही है | सारे साधन इस समय कलिरूप दावानलसे जलकर भस्म हो गये हैं | (३५) इस कलियुगमें सभी देशवासी बाजारोंमें अन्न बेचने लगे हैं, ब्राह्मणलोग पैसा लेकर वेद पढ़ाते हैं और स्त्रियाँ वैश्यावृत्तिसे निर्वाह करने लगी हैं | (३६)
इस तरह कलियुगके दोष देखता और पृथ्वीपर विचरता हुआ मैं यमुनाजीके तटपर पहुंचा, जहाँ भगवान श्रीकृष्णाकी अनेकों लीलाएँ हो चुकी हैं | (३७) मुनिवरो! सुनिए, वहाँ मैंने एक बड़ा आश्चर्य देखा | वहाँ एक युवती स्त्री खिन्न मनसे बैठी थी | (३८) उसके पास दो वृद्ध पुरुष अचेत अवस्थामें पड़े जोर जोरसे साँस ले रहे थे | वह तरुणी उनकी सेवा करती हुई कभी उन्हें चेत करनेका प्रयत्न करती और कभी उनके आगे रोने लगती थी | (३९) वह अपने शरीरके रक्षक परमात्माको दासों दिशाओंमें देख रही थी | उसके चारों ओर सैकड़ों स्त्रियाँ उसे पंखा झल रही थी और बार बार समझाती जाती थी | (४०) दूरसे यह सब चरित देखकर मैं कुतूहलवश उसके पास चला गया | मुझे देखकर वह युवती खाड़ी हो गयी और बड़ी व्याकुल होकर कहने लगी | (४१)
युवतीने कहा – अजी महात्माजी! क्षणभर ठहर जाइये और मेरी चिंता को भी नष्ट कर दीजिये | आपका दर्शन तो संसार के सभी पापोंको सर्वथा नष्ट कर देनेवाला है | (४२) आपके वचनोंसे मेरे दुःखकी बहुत कुछ शान्ति हो जायगी | मनुष्यका जब बड़ा भाग्य होता है, तभी आपके दर्शन हुआ करते हैं | (४३)
नारदजी कहते हैं – तब मैंने उस स्त्रीसे पूछा – देवी! तुम कौन हो ? ये दोनों पुरुष तुम्हारे क्या होते हैं ? और तुम्हारे पास ये कमलनयनी देवियाँ कौन हैं ? तुम हमें विस्तारसे अपने दुःखका कारण बताओ | (४४)
युवतीने कहा – मेरा नाम भक्ति है, ये ज्ञान और वैराग्य नामक मेरे पुत्र हैं | समयके फेरसे ही ये ऐसे जर्जर हो गए हैं | (४५) ये देवियाँ गंगाजी आदि नदियाँ हैं | ये सब मेरी सेवा करने के लिए ही आई हैं | इस प्रकार साक्षात् देवियोंके द्वारा सेवित होनेपर भी मुझे सुख शान्ति नहीं है | (४६) तपोधन! अब ध्यान देकर मेरा वृतान्त सुनिए | मेरी कथा वैसे तो प्रसिद्ध है, फिर भी उसे सुनकर आप मुझे शान्ति प्रदान करें | (४७)
मैं द्रविड़ देश में उत्पन्न हुई, कर्णाटकमें बढ़ी, कहीं कहीं महाराष्ट्रमें सम्मानित हुई; किन्तु गुजरातमें मुझको बुढ़ापेने आ घेरा | (४८) वहाँ घोर कलियुगके प्रभावसे पाखंडियोंने मुझे अंग-भंग कर दिया | चिरकालतक यह अवस्था रहनेके कारण मैं अपने पुत्रोंके साथ दुर्बल और निस्तेज हो गयी | (४९) अब जबसे मैं वृन्दावन आई, तबसे पुनः परम सुंदरी सुरुप्वती नवयुवती हो गयी हूँ | (५०) किन्तु सामने पड़े हुए ये दोनों मेरे पुत्र थके-मांदे दुखी हो रहे हैं | अब मैं यह स्थान छोड़कर अन्यत्र जाना चाहती हूँ | (५१) ये दोनों बूढ़े हो गये हैं – इसी दुःखसे मैं दुखी हूँ | मैं तरुणी क्यों और ये दोनों मेरे पुत्र बूढ़े क्यों ? (५२) हम तीनो साथ साथ रहनेवाले हैं | फिर यह विपरीतता क्यों? होना तो यह चाहिये की माता बूढी हो और पुत्र तरुण | (५३) इसीसे मैं आश्चर्यचकित चितसे अपनी इस अवस्थापर शोक करती रहती हूँ | आप परम बुद्धिमान एवं योगनिधि है; इसका क्या कारण हो सकता है, बताइये ? (५४)
नारदजीने कहा – साध्वी! मैं अपने ह्रदयमें ज्ञानदृष्टिसे तुम्हारे सम्पूर्ण दुःखका कारण देखता हूँ, तुम्हे विषाद नहीं करना चाहिये | श्रीहरि तुम्हारा कल्याण करेंगे | (५५)
सूतजी कहते हैं – मुनिवर नारदजीने एक क्षणमें ही उसका कारण जानकर कहा | (५६)
नारदजीने कहा – देवी! सावधान होकर सुनो | यह दारुण कलियुग है | इसीसे इस समय सदाचार योगमार्ग और ताप आदि सभी लुप्त हो गए हैं | (५७) लोग शठता और दुष्कर्ममें लगकर अघासुर बन रहे हैं | संसारमें जहाँ देखो, वहीँ सतपुरुष दुःखसे म्लान हैं और दुष्ट सुखी हो रहे हैं | इस समय जिस बुद्धिमान पुरुषका धैर्य बना रहे, वही बड़ा ज्ञानी या पंडित है | (५८) पृथ्वी क्रमशः प्रतिवर्ष शेषजीके लिए भाररूप होती जा रही है | अब यह छूने योग्य तो क्या, देखनेयोग्य भी नहीं रह गयी है और न इसमें कहीं मंगल ही दिखाई देता है | (५९) अब किसीको पुत्रोंके साथ तुम्हारा दर्शन भी नहीं होता | विषयानुरागके कारण अंधे बने हुए जीवोंसे उपेक्षित होकर तुम जर्जर हो रही थी | (६०) वृन्दावनके संयोगसे तुम फिर नवीन तरुणी हो गयी हो | अतः यह वृन्दावनधाम धन्य है, जहाँ भक्ति सर्वत्र नृत्य कर रही है | (६१) परंतु तुम्हारे इन दोनों पुत्रों का यहाँ कोई ग्राहक नहीं है, इसीलिए इनका बुढ़ापा नहीं छूट रहा है | यहाँ इनको कुछ आत्मसुख (भगवतस्पर्शजनित आनन्द) की प्राप्ति होनेके कारण ये सोते-से जान पड़ते हैं | (६२)
भक्तिने कहा – राजा परीक्षितने इस पापी कलियुग को क्यों रहने दिया ? इसके आते ही सब वस्तुओंका सार न जाने कहाँ चला गया ? (६३) करुणामय श्रीहरिसे भी यह अधर्म कैसे देखा जाता है ? मुने! मेरा यह संदेह दूर कीजिये, आपके वचनों से मुझे बड़ी शान्ति मिली है | (६४)
नारदजीने कहा – बाले! यदि तुमने पूछा है, तो प्रेमसे सुनो, कल्याणी! मैं तुम्हे सब बताऊंगा और तुम्हारा दुःख दूर हो जायगा | (६५) जिस दिन भगवान श्रीकृष्ण इस भूलोकको छोड़कर अपने परमधामको पधारे, उसी दिनसे यहाँ सम्पूर्ण साधनोंमें बाधा डालनेवाला कलियुग आ गया | (६६) दिग्विजयके समय रजा परीक्षितकी दृष्टि पड़नेपर कलियुग दीनके समान उनकी शरण में आया | भ्रमर के समान सारग्राही राजाने यह निश्च्रय किया की इसका वध मुझे नही करना चाहिए | (६७) क्योंकि जो फल तपस्या, योग एवं समाधीसे भी नहीं मिलता कलियुगमें वही फल श्रीहरीकीर्तनसे ही भलीभाति मिल जाता है | (६८) इस प्रकार सारहीन होने पर भी उसे इस एक ही दृष्टि से सारयुक्त देखकर उन्होंने कलियुगमें उत्पन्न होनेवाले जीवोंके सुखके लिए ही इसे रहने दिया था | (६९)
इस समय लोगोंके कुकर्ममें प्रवृत होने के कारण सभी वस्तुओंका सार निकल गया है और पृथ्वी के सारे पदार्थ बीजहीन भूसीके समान हो गये हैं | (७०) ब्राह्मण केवल अन्न-धनादिके लोभवश घर घर एवं जन-जनको भागवतकी कथा सुनाने लगे हैं, इसलिए कथाका सार चला गया | (७१) तीर्थोमें नाना प्रकारके अत्यंत घोर कर्म करनेवाले, नास्तिक और नारकी पुरुष भी रहने लगे हैं; इसलिये तीर्थोंका भी प्रभाव जाता रहा | (७२) जिनका चित निरंतर काम, क्रोध, महान लोभ और तृष्णासे तपता रहता है, वे भी तपस्याका ढोंग करने लगे हैं, इसलिये तपका भी सार निकल गया | (७३) मनपर काबू न होनेके कारण एवं शास्त्रका अभ्यास न करनेसे ध्यानयोगका फल मिट गया | (७४) पंडितोंकी यह दशा है की वे अपनी स्त्रियोंके साथ भैंसों की तरह रमण करते हैं; उनमें संतान पैदा करनेकी ही कुशलता पायी जाती है, मुक्तिसाधनमें वे सर्वथा अकुशल हैं | (७५) सम्प्रदायानुसार प्राप्त हुई वैष्णवता भी कहीं देखनेमें नहीं आती | इस प्रकार जगह जगह सभी वस्तुओंका सार लुप्त हो गया है | (७६) यह तो इस युग का स्वभाव ही है इसमें किसीका दोष नहीं है | इसीसे पुण्डरीकाक्ष भगवान बहुत समीप रहते हुए भी यह सब सह रहे हैं | (७७)
सूतजी कहते हैं – शौनकजी! इस प्रकार देवर्षि नारदके वचन सुनकर भक्ति को बड़ा आश्चर्य हुआ; फिर उसने जो कुछ कहा, उसे सुनिये | (७८)
भक्तिने कहा – देवर्षे! आप धन्य हैं! मेरा बड़ा सौभाग्य था, जो आपका समागम हुआ | संसारमें साधुओंका दर्शन ही समस्त सिद्धियोंका परम कारण है | (७१) आपका केवल एक बारका उपदेश धारण कर कयाधुकुमार प्रह्र्लादने मायापर विजय प्राप्त कर ली थी | ध्रुवने भी आपकी कृपासे ही ध्रुवपद प्राप्त किया था | आप सर्वमंगलमय और साक्षात् श्रीब्रह्माजीके पुत्र हैं, मैं आपको नमस्कार करती हूँ | (८०)
*** जय श्रीहरि ***
|| श्री हरी ||
श्रीमद्भागवतमहात्म्य
पहला अध्याय
सच्चिदानंदस्वरुप भगवान श्रीकृष्णको हम नमस्कार करते हैं, जो जगतकी उत्पत्ति, स्थिथि और विनाशके हेतु तथा आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक – तीनो प्रकारके तापोंका नाश करनेवाले हैं | (१)
जिस समय श्रीशुकदेवजीका यज्ञोपवीत संस्कार भी नहीं हुआ था तथा लौकिक-वैदिक कर्मोके अनुष्ठानका अवसर भी नहीं आया था, तभी उन्हें अकेले ही सन्यास लेनेके लिए घरसे जाते देखकर उनके पिता व्यासजी विरहसे कातर होकर पुकारने लगे – ‘बेटा! बेटा! तुम कहाँ जा रहे हो?’ उस समय वृक्षों ने तन्मय होनेके कारण श्रीशुकदेवजीकी ओरसे उत्तर दिया था | ऐसे सर्वभूत ह्रदयस्वरुप श्रीशुकदेवमुनिको मैं नमस्कार करता हूँ | (२)
एक बार भगवतकथामृतका रसास्वादन करनेमें कुशल मुनिवर शौनकजीने नैमिषारन्य क्षेत्रमें विराजमान महामति सूतजीको नमस्कार करके उनसे पूछा | (३)
शौनकजी बोले – सूतजी! आपका ज्ञान अज्ञानान्धकारको नष्ट करनेके लिए करोड़ों सूर्योंके समान है | आप हमारे कानो के लिए रसायन – अमृतस्वरुप सारगर्भित कथा कहिये | (४) भक्ति, ज्ञान और वैराग्यसे प्राप्त होनेवाले महान विवेककी वृद्धि किस प्रकार होती है तथा वैष्णवलोग किस तरह इस माया-मोहसे अपना पीछा छुड़ाते हैं ? (५) इस घोर कलिकालमें जीव प्रायः आसुरी स्वाभावके हो गए हैं, विविध क्लेशोंसे आक्रान्त इन जीवोंको शुद्ध (दैवीशक्तिसंपन्न) बनानेका सर्वश्रेष्ठ उपाय क्या है ? (६)
सूतजी! आप हमें कोई ऐसा शाश्वत साधन बताइये, जो सबसे अधिक कल्याणकारी तथा पवित्र करनेवालोंमें भी पवित्र हो तथा जो भगवान श्रीकृष्णकी प्राप्ति करा दे | (७) चिन्तामणि केवल लौकिक सुख दे सकती है और कल्पवृक्ष अधिक से अधिक स्वर्गीय संपत्ति दे सकता है; परन्तु गुरुदेव प्रसन्न होकर भगवानका योगीदुर्लभ नित्य वैकुण्ठ धाम दे देते हैं | (८)
सूतजीने कहा – शौनकजी! तुम्हारे ह्रदयमें भगवान का प्रेम है; इसलिए मैं विचारकर तुम्हे सम्पूर्ण सिद्धांतोंका निष्कर्ष सुनाता हूँ, जो जन्म-मृत्युके भयका नाश कर देता है | (९) जो भक्तिके प्रवाह को बढ़ाता है और भगवान श्रीकृष्णकी प्रसन्नताका प्रधान कारण हैं, मैं तुम्हे वह साधन बतलाता हूँ; उसे सावधान होकर सुनो | (१०) श्रीशुकदेवजीने कलियुगमें जीवोंके कालरूपी सर्पके मुखका ग्रास होनेके त्रासका आत्यंतिक नाश करनेके लिये श्रीमद्भागवतशास्त्रका प्रवचन किया है | (११) मन की शुधिके लिए इससे बढ़कर कोई साधन नहीं है | जब मनुष्यके जन्म-जन्मान्तरका पुण्य उदय होता है, तभी उसे इस भागवतशास्त्रकी प्राप्ति होती है | (१२) जब शुकदेवजी राजा परीक्षितको यह कथा सुनानेके लिए सभा में विराजमान हुए, तब देवतालोग उनके पास अमृतका कलश लेकर आये | (१३) देवता अपना काम बनानेमें बड़े कुशल होते हैं; अतः यहाँ भी सबने शुकदेवमुनिको नमस्कार करके कहा, ‘आप यह अमृत लेकर बदलेमें हमें कथामृत का दान दीजिये | (१४) इस प्रकार परस्पर विनिमय (अदला-बदली) हो जानेपर राजा परीक्षित अमृतका पान करें और हम सब श्रीमद्भागवतरूप अमृत का पान करेंगे |’ (१५) इस संसार में कहाँ काँच और कहा महामुल्य मणि तथा कहाँ सुधा और कहाँ कथा ? श्रीशुकदेवजीने (यह सोंचकर) उस समय देवताओंकी हंसी उड़ा दी | (१६) उन्हें भक्तिशुन्य (कथाका अनधिकारी) जानकार कथामृतका दान नहीं किया | इस प्रकार यह श्रीमद्भागवतकी कथा देवताओंको भी दुर्लभ है | (१७)
पूर्वकालमें श्रीमद्भागवतके श्रवणसे ही राजा परीक्षितकी मुक्ति देखकर ब्रह्माजीको भी बड़ा आश्चर्य हुआ था | उन्होंने सत्यलोकमें तराजू बांधकर सब साधनों को तौला | (१८) अन्य सभी साधन तौलमें हल्के पड़ गए, अपने महत्वके कारण भागवत ही सबसे भारी रहा | यह देखकर सभी ऋषियोंको बड़ा विस्मय हुआ | (१९) उन्होंने कलियुगमें इस भगवद्रूप भागवतशास्त्रको ही पढने-सुननेसे तत्काल मोक्ष देनेवाला निश्च्रय किया | (२०) सप्ताह विधिसे श्रवण करनेपर यह निश्चय भक्ति प्रदान करता है | पूर्वकालमें इसे दयापरायण सनकादीने देवर्षि नारदको सुनाया था | (२१) यद्दपि देवर्षिने पहले ब्रह्माजीके मुखसे इसे श्रवण कर लिया था, तथापि सप्ताहश्रवणकी विधि तो उन्हें सनकादीने ही बतायी थी | (२२)
शौनकजीने पूछा – सांसारिक प्रपंचोसे मुक्त एवं विचरणशील नारदजीका सनकादीके साथ संयोग कहाँ हुआ और विधि-विधानके श्रवणमें उनकी प्रीती कैसे हुई ? (२३)
सूतजीने कहा – अब मैं तुम्हे वह भक्तिपूर्ण कथानक सुनाता हूँ, जो की श्रीशुकदेवजीने मुझे अपना अनन्य शिष्य जानकार एकांतमें सुनाया था | (२४) एक दिन विशालापूरीमें वे चारों निर्मल ऋषि सत्संगके लिए आये | वहां उन्होंने नारदजीको देखा | (२५)
सनकादिने पूछा – ब्रहमन! आपका मुख उदास क्यों हो रहा है ? आप चिंतातुर कैसे हैं ? इतनी जल्दी-जल्दी आप कहाँ जा रहे हैं ? और आपका आगमन कहाँसे हो रहा है ? (२६) इस समय तो आप उस पुरुषके समान व्याकुल जान पड़ते हैं जिसका सारा धन लुट गया हो; आप-जैसे आसक्तिरहित पुरुषोंके लिए यह उचित नहीं है | इसका कारण बताइये | (२७)
नारदजीने कहा – मैं सर्वोत्तम लोक समझकर प्रथ्वीमें आया था | यहाँ पुष्कर, प्रयाग, काशी, गोदावरी (नासिक), हरिद्वार, कुरुक्षेत्र, श्रीरंग और सेतुबांध आदि कई तीर्थोंमें मैं इधर-उधर विचरता रहा; किन्तु मुझे कहीं भी मनको संतोष देनेवाली शान्ति नहीं मिली | इस समय अधर्मके सहायक कलियुगने सारी पृथ्वीको पीड़ित कर रखा है | (२८-३०) अब यहाँ सत्य, तप, शौच (बाहर-भीतरकी पवित्रता), दया, दान आदि कुछ भी नहीं है | बेचारे जीव केवल अपना पेट पालने में लगे हुए हैं; वे असत्यभाशी, आलसी, मन्दबुद्धि, भाग्यहीन, उपद्रवग्रस्त हो गए हैं | जो साधू-संत कहे जाते हैं, वे पुरे पाखंडी हो गए हैं; देखने में तो वे विरक्त हैं; किन्तु स्त्री-धन आदि सभीका परिग्रह करते हैं | घरोंमें स्त्रियोंका राज्य है, साले सलाहकार बने हुए हैं, लोभसे लोग कन्या विक्रय करते हैं और स्त्री-पुरुषों में कलह मचा रहता है | (३१-३३) महात्माओंके आश्रम, तीर्थ और नदियोंपर यवनों (विधर्मियोंका) अधिकार हो गया है; उन दुष्टोंने बहुत से देवालय भी नष्ट कर दिए हैं | (३४) इस समय यहाँ न कोई योगी है न सिद्ध है; न ज्ञानी है और न सत्कर्म करनेवाला ही है | सारे साधन इस समय कलिरूप दावानलसे जलकर भस्म हो गये हैं | (३५) इस कलियुगमें सभी देशवासी बाजारोंमें अन्न बेचने लगे हैं, ब्राह्मणलोग पैसा लेकर वेद पढ़ाते हैं और स्त्रियाँ वैश्यावृत्तिसे निर्वाह करने लगी हैं | (३६)
इस तरह कलियुगके दोष देखता और पृथ्वीपर विचरता हुआ मैं यमुनाजीके तटपर पहुंचा, जहाँ भगवान श्रीकृष्णाकी अनेकों लीलाएँ हो चुकी हैं | (३७) मुनिवरो! सुनिए, वहाँ मैंने एक बड़ा आश्चर्य देखा | वहाँ एक युवती स्त्री खिन्न मनसे बैठी थी | (३८) उसके पास दो वृद्ध पुरुष अचेत अवस्थामें पड़े जोर जोरसे साँस ले रहे थे | वह तरुणी उनकी सेवा करती हुई कभी उन्हें चेत करनेका प्रयत्न करती और कभी उनके आगे रोने लगती थी | (३९) वह अपने शरीरके रक्षक परमात्माको दासों दिशाओंमें देख रही थी | उसके चारों ओर सैकड़ों स्त्रियाँ उसे पंखा झल रही थी और बार बार समझाती जाती थी | (४०) दूरसे यह सब चरित देखकर मैं कुतूहलवश उसके पास चला गया | मुझे देखकर वह युवती खाड़ी हो गयी और बड़ी व्याकुल होकर कहने लगी | (४१)
युवतीने कहा – अजी महात्माजी! क्षणभर ठहर जाइये और मेरी चिंता को भी नष्ट कर दीजिये | आपका दर्शन तो संसार के सभी पापोंको सर्वथा नष्ट कर देनेवाला है | (४२) आपके वचनोंसे मेरे दुःखकी बहुत कुछ शान्ति हो जायगी | मनुष्यका जब बड़ा भाग्य होता है, तभी आपके दर्शन हुआ करते हैं | (४३)
नारदजी कहते हैं – तब मैंने उस स्त्रीसे पूछा – देवी! तुम कौन हो ? ये दोनों पुरुष तुम्हारे क्या होते हैं ? और तुम्हारे पास ये कमलनयनी देवियाँ कौन हैं ? तुम हमें विस्तारसे अपने दुःखका कारण बताओ | (४४)
युवतीने कहा – मेरा नाम भक्ति है, ये ज्ञान और वैराग्य नामक मेरे पुत्र हैं | समयके फेरसे ही ये ऐसे जर्जर हो गए हैं | (४५) ये देवियाँ गंगाजी आदि नदियाँ हैं | ये सब मेरी सेवा करने के लिए ही आई हैं | इस प्रकार साक्षात् देवियोंके द्वारा सेवित होनेपर भी मुझे सुख शान्ति नहीं है | (४६) तपोधन! अब ध्यान देकर मेरा वृतान्त सुनिए | मेरी कथा वैसे तो प्रसिद्ध है, फिर भी उसे सुनकर आप मुझे शान्ति प्रदान करें | (४७)
मैं द्रविड़ देश में उत्पन्न हुई, कर्णाटकमें बढ़ी, कहीं कहीं महाराष्ट्रमें सम्मानित हुई; किन्तु गुजरातमें मुझको बुढ़ापेने आ घेरा | (४८) वहाँ घोर कलियुगके प्रभावसे पाखंडियोंने मुझे अंग-भंग कर दिया | चिरकालतक यह अवस्था रहनेके कारण मैं अपने पुत्रोंके साथ दुर्बल और निस्तेज हो गयी | (४९) अब जबसे मैं वृन्दावन आई, तबसे पुनः परम सुंदरी सुरुप्वती नवयुवती हो गयी हूँ | (५०) किन्तु सामने पड़े हुए ये दोनों मेरे पुत्र थके-मांदे दुखी हो रहे हैं | अब मैं यह स्थान छोड़कर अन्यत्र जाना चाहती हूँ | (५१) ये दोनों बूढ़े हो गये हैं – इसी दुःखसे मैं दुखी हूँ | मैं तरुणी क्यों और ये दोनों मेरे पुत्र बूढ़े क्यों ? (५२) हम तीनो साथ साथ रहनेवाले हैं | फिर यह विपरीतता क्यों? होना तो यह चाहिये की माता बूढी हो और पुत्र तरुण | (५३) इसीसे मैं आश्चर्यचकित चितसे अपनी इस अवस्थापर शोक करती रहती हूँ | आप परम बुद्धिमान एवं योगनिधि है; इसका क्या कारण हो सकता है, बताइये ? (५४)
नारदजीने कहा – साध्वी! मैं अपने ह्रदयमें ज्ञानदृष्टिसे तुम्हारे सम्पूर्ण दुःखका कारण देखता हूँ, तुम्हे विषाद नहीं करना चाहिये | श्रीहरि तुम्हारा कल्याण करेंगे | (५५)
सूतजी कहते हैं – मुनिवर नारदजीने एक क्षणमें ही उसका कारण जानकर कहा | (५६)
नारदजीने कहा – देवी! सावधान होकर सुनो | यह दारुण कलियुग है | इसीसे इस समय सदाचार योगमार्ग और ताप आदि सभी लुप्त हो गए हैं | (५७) लोग शठता और दुष्कर्ममें लगकर अघासुर बन रहे हैं | संसारमें जहाँ देखो, वहीँ सतपुरुष दुःखसे म्लान हैं और दुष्ट सुखी हो रहे हैं | इस समय जिस बुद्धिमान पुरुषका धैर्य बना रहे, वही बड़ा ज्ञानी या पंडित है | (५८) पृथ्वी क्रमशः प्रतिवर्ष शेषजीके लिए भाररूप होती जा रही है | अब यह छूने योग्य तो क्या, देखनेयोग्य भी नहीं रह गयी है और न इसमें कहीं मंगल ही दिखाई देता है | (५९) अब किसीको पुत्रोंके साथ तुम्हारा दर्शन भी नहीं होता | विषयानुरागके कारण अंधे बने हुए जीवोंसे उपेक्षित होकर तुम जर्जर हो रही थी | (६०) वृन्दावनके संयोगसे तुम फिर नवीन तरुणी हो गयी हो | अतः यह वृन्दावनधाम धन्य है, जहाँ भक्ति सर्वत्र नृत्य कर रही है | (६१) परंतु तुम्हारे इन दोनों पुत्रों का यहाँ कोई ग्राहक नहीं है, इसीलिए इनका बुढ़ापा नहीं छूट रहा है | यहाँ इनको कुछ आत्मसुख (भगवतस्पर्शजनित आनन्द) की प्राप्ति होनेके कारण ये सोते-से जान पड़ते हैं | (६२)
भक्तिने कहा – राजा परीक्षितने इस पापी कलियुग को क्यों रहने दिया ? इसके आते ही सब वस्तुओंका सार न जाने कहाँ चला गया ? (६३) करुणामय श्रीहरिसे भी यह अधर्म कैसे देखा जाता है ? मुने! मेरा यह संदेह दूर कीजिये, आपके वचनों से मुझे बड़ी शान्ति मिली है | (६४)
नारदजीने कहा – बाले! यदि तुमने पूछा है, तो प्रेमसे सुनो, कल्याणी! मैं तुम्हे सब बताऊंगा और तुम्हारा दुःख दूर हो जायगा | (६५) जिस दिन भगवान श्रीकृष्ण इस भूलोकको छोड़कर अपने परमधामको पधारे, उसी दिनसे यहाँ सम्पूर्ण साधनोंमें बाधा डालनेवाला कलियुग आ गया | (६६) दिग्विजयके समय रजा परीक्षितकी दृष्टि पड़नेपर कलियुग दीनके समान उनकी शरण में आया | भ्रमर के समान सारग्राही राजाने यह निश्च्रय किया की इसका वध मुझे नही करना चाहिए | (६७) क्योंकि जो फल तपस्या, योग एवं समाधीसे भी नहीं मिलता कलियुगमें वही फल श्रीहरीकीर्तनसे ही भलीभाति मिल जाता है | (६८) इस प्रकार सारहीन होने पर भी उसे इस एक ही दृष्टि से सारयुक्त देखकर उन्होंने कलियुगमें उत्पन्न होनेवाले जीवोंके सुखके लिए ही इसे रहने दिया था | (६९)
इस समय लोगोंके कुकर्ममें प्रवृत होने के कारण सभी वस्तुओंका सार निकल गया है और पृथ्वी के सारे पदार्थ बीजहीन भूसीके समान हो गये हैं | (७०) ब्राह्मण केवल अन्न-धनादिके लोभवश घर घर एवं जन-जनको भागवतकी कथा सुनाने लगे हैं, इसलिए कथाका सार चला गया | (७१) तीर्थोमें नाना प्रकारके अत्यंत घोर कर्म करनेवाले, नास्तिक और नारकी पुरुष भी रहने लगे हैं; इसलिये तीर्थोंका भी प्रभाव जाता रहा | (७२) जिनका चित निरंतर काम, क्रोध, महान लोभ और तृष्णासे तपता रहता है, वे भी तपस्याका ढोंग करने लगे हैं, इसलिये तपका भी सार निकल गया | (७३) मनपर काबू न होनेके कारण एवं शास्त्रका अभ्यास न करनेसे ध्यानयोगका फल मिट गया | (७४) पंडितोंकी यह दशा है की वे अपनी स्त्रियोंके साथ भैंसों की तरह रमण करते हैं; उनमें संतान पैदा करनेकी ही कुशलता पायी जाती है, मुक्तिसाधनमें वे सर्वथा अकुशल हैं | (७५) सम्प्रदायानुसार प्राप्त हुई वैष्णवता भी कहीं देखनेमें नहीं आती | इस प्रकार जगह जगह सभी वस्तुओंका सार लुप्त हो गया है | (७६) यह तो इस युग का स्वभाव ही है इसमें किसीका दोष नहीं है | इसीसे पुण्डरीकाक्ष भगवान बहुत समीप रहते हुए भी यह सब सह रहे हैं | (७७)
सूतजी कहते हैं – शौनकजी! इस प्रकार देवर्षि नारदके वचन सुनकर भक्ति को बड़ा आश्चर्य हुआ; फिर उसने जो कुछ कहा, उसे सुनिये | (७८)
भक्तिने कहा – देवर्षे! आप धन्य हैं! मेरा बड़ा सौभाग्य था, जो आपका समागम हुआ | संसारमें साधुओंका दर्शन ही समस्त सिद्धियोंका परम कारण है | (७१) आपका केवल एक बारका उपदेश धारण कर कयाधुकुमार प्रह्र्लादने मायापर विजय प्राप्त कर ली थी | ध्रुवने भी आपकी कृपासे ही ध्रुवपद प्राप्त किया था | आप सर्वमंगलमय और साक्षात् श्रीब्रह्माजीके पुत्र हैं, मैं आपको नमस्कार करती हूँ | (८०)
*** जय श्रीहरि ***
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