Thursday, August 15, 2013

श्रीमद्भागवतमहात्म्य दूसरा अध्याय भक्तिका दुःख दूर करनेके लिए नारदजी का उघोग

|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||
|| श्री हरी ||
श्रीमद्भागवतमहात्म्य
दूसरा अध्याय
भक्तिका दुःख दूर करनेके लिए नारदजी का उघोग

नारदजीने कहा – बाले! तुम व्यर्थ ही अपनेको क्यों खेदमें डाल रही हो ? अरे! तुम इतनी चिन्तातुर क्यों हो ? भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंका चिंतन करो, उनकी कृपा से तुम्हारा सारा दुःख दूर हो जाएगा | (१) जिन्होंने कौरवोंके अत्याचारसे द्रौपदीकी रक्षा की थी और गोपसुन्दरियोंको सनाथ किया था, वे श्रीकृष्णा कहीं चले थोड़े ही गये हैं | (२) फिर तुम तो भक्ति हो और सदा उन्हें प्राणों से भी प्यारी हो; तुम्हारे बुलानेपर तो भगवान नीचेके घरोंमें भी चले जाते हैं | (३) सत्य, त्रेता और द्वापर – इन तीनो युगोंमें ज्ञान और वैराग्य मुक्तिके साधन थे; किन्तु कलियुगमें तो केवल भक्ति ही ब्रह्मसायुज्य (मोक्ष) की प्राप्ति करानेवाली है | (४) यह सोचकर ही परमानन्दचिन्मुर्ती ज्ञानस्वरुप श्रीहरिने अपने सत्स्वरूपसे तुम्हे रचा है; तुम साक्षात् श्रीकृष्णचंद्रकी प्रिया और परम सुन्दरी हो | (५) एक बार जब तुमने हाँथ जोडकर पूछा था की ‘मैं क्या करूँ ?’ तब भगवानने तुम्हे यही आज्ञा दी थी की ‘मेरे भक्तोंका पोषण करो |’ (६) तुमने भगवानकी वह आज्ञा स्वीकार कर ली; इससे तुमपर श्रीहरि बहुत प्रसन्न हुए और तुम्हारी सेवा करनेके लिए मुक्तिको तुम्हे दासी रूपमें दे दिया और इन ज्ञान-वैराग्यको पुत्रोंके रूपमें | (७) तुम अपने साक्षात् स्वरुपसे वैकुण्ठधाममें ही भक्तों का पोषण करती हो, भूलोकमें तो तुमने उनकी पुष्टिके लिए केवल छायारूप धारण कर रखा है | (८)
तब तुम मुक्ति, ज्ञान और वैराग्यको साथ लिए पृथ्वीतलपर आयीं और सतयुगसे द्वापरपर्यन्त बड़े आनन्दसे रही | (९) कलियुगमें तुम्हारी दासी मुक्ति पाखण्डरूप रोगसे पीड़ित होकर क्षीण होने लगी थी, इसलिए वह तो तुरंत ही तुम्हारी आज्ञासे वैकुण्ठलोकको चली गयी | (१०) इस लोकमें भी तुम्हारे स्मरण करनेसे ही वह आती है और फिर चली जाती है, किन्तु इन ज्ञान-वैराग्यको तुमने पुत्र मानकर अपने पास ही रख छोड़ा है | (११) फिर भी कलियुगमें इनकी उपेक्षा होनेके कारण तुम्हारे ये पुत्र उत्साहहीन और वृद्ध हो गये हैं, फिर भी तुम चिंता न करो, मैं इनके नवजीवनका उपाय सोचता हूँ | (१२) सुमुखी! कलिके समान कोई भी युग नहीं है, इस युगमें मैं तुम्हे घर-घरमें प्रत्येक पुरुषके ह्रदयमें स्थापित कर दूंगा | (१३) देखो, अन्य सब धर्मोको दबाकर और भक्तिविषयक महोत्सवोंको आगे रखकर यदि मैंने लोकमें तुम्हारा प्रचार न किया तो मैं श्रीहरिका दास नहीं | (१४) इस कलियुगमें जो जीव तुमसे युक्त होंगे, वे पापी होनेपर भी बेखटके भगवान् श्रीकृष्णके अभय धामको प्राप्त होंगे | (१५) जिनके ह्रदयमें निरंतर प्रेमरूपिणी भक्ति निवास करती है, वे शुद्धान्तःकरण पुरुष स्वप्नमें भी यमराजको नही देखते | (१६) जिनके ह्रदयमें भक्ति महारानीका निवास है, उन्हें प्रेत, पिशाच, राक्षस य दैत्य आदि स्पर्श करनेमें भी समर्थ नहीं हो सकते | (१७) भगवान् तप, वेदाध्ययन, ज्ञान और कर्म आदि किसी भी साधनसे वशमें नहीं किये जा सकते; वे केवल भक्तिसे ही वाशीभूत होते हैं | इसमें श्रीगोपीजन प्रमाण हैं | (१८) मनुष्योंका सहस्रों जनमके पुण्य-प्रताप से भक्तिमें अनुराग होता है | कलियुगमें केवल भक्ति, केवल भक्ति ही सार है | भक्तिसे तो साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्र सामने उपस्थित हो जाते हैं | (११) जो लोग भक्तिसे द्रोह करते हैं, वे तीनों लोकोंमें दुःख-ही-दुःख पाते हैं | पूर्वकालमें भक्तका तिरस्कार करनेवाले दुर्वासा ऋषिको बड़ा कष्ट उठाना पड़ा था | (२०) बस, बस - व्रत, तीर्थ योग, यज्ञ और ज्ञान चर्चा आदि बहुत-से साधनोंकी कोई आवश्यकता नहीं है; एकमात्र भक्ति ही मुक्ति देनेवाली है | (२१)
सूतजी कहते हैं – इस प्रकार नारदजीके निर्णय किये हुए अपने महात्म्यको सुनकर भक्तिके सारे अंग पुष्ट हो गये और वे उनसे कहने लगीं | (२२)
भक्तिने कहा – नारदजी! आप धन्य हैं! आपकी मुझमें निश्चल प्रीती हो | मैं सदा आपके ह्रदयमें रहूंगी, कभी आपको छोड़कर नहीं जाऊँगी | साधो! आप बड़े कृपालु हैं | आपने क्षणभरमें ही मेरा सारा दुःख दूर कर दिया | किन्तु अभी मेरे पुत्रोंमें चेतना नहीं आई है; आप इन्हें शीघ्र ही सचेत कर दीजिये, जगा दीजिये | (२४)
सूतजी कहते हैं – भक्तिके ये वचन सुनकर नारदजीको बड़ी करुणा आई और वे उन्हें हाथसे हिलाडुलाकर जगाने लगे | (२५) फिर उनके कानके पास मुह लगाकर जोरसे कहा, ‘ओ ज्ञान! जल्दी जग पड़ो; ओ वैराग्य! जल्दी जग पड़ो |’ (२६) फिर उन्होंने वेदध्वनी, वेदान्तघोष और बार-बार गीतापाठ करके उन्हें जगाया; इससे वे जैसे-तैसे बहुत जोर लगाकर उठे | (२७) किन्तु आलस्यके कारण वे दोनों जँभाई लेते रहे, नेत्र उघाड़कर देख भी नहीं सके | उनके बाल बगुलोंकी तरह सफ़ेद हो गये थे, उनके अंग प्रायः सूखे काठके समान निस्तेज और कठोर हो गये थे | (२८) इस प्रकार भूख-प्यासके मारे अत्यंत दुर्बल होनेके कारण उन्हें फिर सोते देख नारदजीको बड़ी चिंता हुई और वे सोचने लगे, ‘अब मुझे क्या करना चाहिये ? (२९) इनकी यह नींद और इससे भी बढकर इनकी वृद्धावस्था कैसे दूर हो ?’ शौनकजी! इस प्रकार चिन्ता करते-करते वे भगवान् का स्मरण करने लगे | (३०) उसी समय यह आकाशवाणी हुई की ‘मुने! खेद मत करो, तुम्हारा यह उघोग निःसंदेह सफल होगा | (३१) देवर्षे! इसके लिए तुम एक सत्कर्म करो, वह कर्म तुम्हे संतशिरोमणि महानुभाव बतायेंगे | (३२) उस सत्कर्मका अनुष्ठान करते ही क्षणभरमें उनकी नींद और वृद्धावस्था चली जायेगी तथा सर्वत्र भक्तिका प्रसार होगा’ (३३) यह आकाशवाणी वहाँ सभीको साफ-साफ सुनाई दी | इससे नारदजीको बड़ा विस्मय हुआ और वे कहने लगे, ‘मुझे तो इसका कुछ आशय समझमें नहीं आया |’ (३४)
नारदजी बोले – इस आकाशवाणीने भी गुप्तरूपमें ही बात कही है | यह नहीं बताया की वह कौन-सा साधन किया जाय, जिससे इनका कार्य सिद्ध हो | (३५) वे संत न जाने कहाँ मिलेंगे और किस प्रकार उस साधनको बतायेंगे ? अब आकाशवाणीने जो कुछ कहा है, उसके अनुसार मुझे क्या करना चाहिये ? (३६)
सूतजी कहते हैं – शौनकजी! तब ज्ञान-वैराग्य दोनोंको वहीं छोड़कर नारदमुनि वहाँसे चल पड़े और प्रत्येक तीर्थमें जा-जाकर मार्गमें मिलनेवाले मुनीश्वरोंसे वह साधन पूछने लगे | (३७) उनकी उस बातको सुनते तो सब थे, किन्तु उसके विषयमें कोई कुछ भी निश्च्रित उत्तर न देता | किन्हीने उसे असाध्य बताया; कोई बोले – ‘इसका ठीक-ठीक पता लगना ही कठिन है |’ कोई सुनकर चुप रह गये और कोई-कोई तो अपनी अवज्ञा होनेके भयसे बातको टाल-टूलकर खिसक गये | (३८) त्रिलोकीमें महान् आश्चर्यजनक हाहाकार मच गया | लोग आपसमें कानाफूसी करने लगे – ‘भाई! जब वेदध्वनी, वेदान्तघोष और बार-बार गीतापाठ सुनानेपर भी भक्ति, ज्ञान और वैराग्य - ये तीनो नहीं जगाये जा सके, तब और कोई उपाय नहीं है | (३९-४०) स्वयं योगिराज नारदको भी जिसका ज्ञान नहीं है, उसे दूसरे संसारी लोग कैसे बता सकते हैं ?’ (४१) इस प्रकार जिन-जिन ऋषियोंसे इसके विषयमें पूछा गया, उन्होंने निर्णय करके यही कहा की यह बात दु:साध्य ही है | (४२)
तब नारदजी बहुत चिन्तातुर हुए और बदरीवनमें आये | ज्ञान-वैराग्यको जगानेके लिए वहाँ उन्होंने यह निश्च्रय किया की ‘मैं ताप करूँगा’ | (४३) इसी समय उन्हें अपने सामने करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी सनकादि मुनीश्वर दिखायी दिए | उन्हें देखकर वे मुनिश्रेष्ठ कहने लगे | (४४)
नारदजीने कहा – महात्माओं! इस समय बड़े भाग्यसे मेरा आपलोगोंके साथ समागम हुआ है, आप मुझपर कृपा करके शीघ्र ही वह साधन बताइये | (४५) आप सभी लोग बड़े योगी, बुद्धिमान् और विद्वान् हैं | आप देखनेमें पांच-पांच वर्षके बालक-से जान पड़ते हैं, किंतु हैं पूर्वजोंके भी पूर्वज | (४६) आपलोग सदा वैकुण्ठधाममें निवास करते हैं, निरंतर हरिकीर्तनमें तत्पर रहते हैं, भगवल्लीलामृतका रसास्वादन कर सदा उसीमें उन्मत्त रहते हैं और एकमात्र भगवत्कथा ही आपके जीवनका आधार है | (४७) ‘हरिःशरणम्’ (भगवान ही हमारे रक्षक हैं) यह वाक्य (मन्त्र) सर्वदा आपके मुखमें रहता है; इसीसे कालप्रेरित वृद्धावस्था भी आपको बाधा नहीं पहुँचाती | (४८) पूर्वकाल में आपके भ्रूभंग्मात्रसे भगवान् विष्णुके द्वारपाल जय और विजय तुरंत पृथ्वीपर गिर गये थे और फिर आपकी ही कृपा से वे पुनः वैकुण्ठलोक पहुँच गये | (४९) धन्य है, इस समय आपका दर्शन बड़े सौभाग्यसे ही हुआ है | मैं बहुत दीन हूँ और आपलोग स्वाभावसे ही दयालु हैं; इसलिये मुझपर आपको अवश्य कृपा करनी चाहिए | (५०) बताइये – आकाशवाणीने जिसके विषयमें कहा है, वह कौन-सा साधन है और मुझे किस प्रकार उसका अनुष्ठान करना चाहिए | आप इसका विस्तारसे वर्णन कीजिये | (५१) भक्ति, ज्ञान और वैराग्यको किस प्रकार सुख मिल सकता है ? और किस तरह इनकी प्रेमपूर्वक सब वर्णोंमें प्रतिष्ठा की जा सकती है ? (५२)
सनकादिने कहा – देवर्षे! आप चिन्ता न करें, मनमें प्रसन्न हों; उनके उद्धारका एक सरल उपाए पहलेसे ही विघमान है | (५३) नारदजी! आप धन्य हैं | आप विरक्तों के शिरोमणि हैं | श्रीकृष्णादासोंके शाश्वत पथ-प्रदर्शक एवं भक्तियोगके भास्कर हैं | (५४) आप भक्ति के लिए जो उघोग कर रहे हैं, यह आपके लिए कोई आश्चर्यकी बात नहीं समझनी चाहिए | भगवानके भक्तके लिए तो भक्तिकी सम्यक स्थापना करना सदा उचित ही है | (५५) ऋषियोंने संसारमें अनेकों मार्ग प्रकट किये हैं; किन्तु वे सभी कष्टसाध्य हैं और परिणाममें प्रायः स्वर्गकी ही प्राप्ति करानेवाले हैं | (५६) अभीतक भगवानकी प्राप्ति करानेवाला मार्ग तो गुप्त ही रहा है | उसका उपदेश करनेवाला पुरुष प्रायः भाग्यसे ही मिलता है | (५७) आपको आकाशवाणीने जिस सत्कर्मका संकेत किया है, उसे हम बतलाते हैं; आप प्रसन्न और समाहितचित होकर सुनिए | (५८)
नारदजी! द्रव्ययज्ञ, तपोयज्ञ, योगयज्ञ और स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ – ये सब तो स्वर्गादीकी प्राप्ति करानेवाले कर्मकी ही ओर संकेत करते हैं | (५९) पण्डितोंने ज्ञानयज्ञको ही सत्कर्म (मुक्तिदायक कर्म) का सूचक माना है | वह श्रीमद्भागवतका परायण है, जिसका गान शुकादी महानुभावोंने किया है | (६०) उसके शब्द सुननेसे ही भक्ति, ज्ञान और वैराग्यको बड़ा बल मिलेगा | इससे ज्ञान-वैराग्यका कष्ट मिट जायगा और भक्तिको आनन्द मिलेगा | (६१) सिंह की गर्जना सुनकर जैसे भेड़िये भाग जाते हैं, उसी प्रकार श्रीमद्भागवतकी ध्वनिसे कलियुगके सारे दोष नष्ट हो जायेंगे | (६२) तब प्रेमरस प्रवाहित करनेवाली भक्ति, ज्ञान और वैराग्यको साथ लेकर प्रत्येक घर और व्यक्तिके ह्रदय में क्रीडा करेगी | (६३)
नारदजीने कहा – मैंने वेद-वेदान्तकी ध्वनि और गीतापाठ करके उन्हें बहुत जगाया, किन्तु फिर भी भक्ति, ज्ञान और वैराग्य – ये तीनो नहीं जगे | (६४) एसी स्थितिमें श्रीमद्भागवत सुनानेसे वे कैसे जागेंगे ? क्योंकि उस कथाके प्रत्येक श्लोक और प्रत्येक पदमें भी वेदोंका ही तो सारांश है | (६५) आपलोग शरणागतवत्सल हैं तथा आपका दर्शन कभी व्यर्थ नही होता; इसीलिए मेरा यह संदेह दूर कर दीजिये, इस कार्यमें विलम्ब न कीजिये | (६६)
सनकादिने कहा – श्रीमद्भागवतकी कथा वेद और उपनिषदों के सारसे बनी है | इसलिए उनसे अलग उनकी फलरूपा होने के कारण वह बड़ी उत्तम जान पडती है | जिस प्रकार रस वृक्षकी जड़से लेकर शाखाग्रपर्यंत रहता है, किन्तु इस स्थितिमें उसका आस्वादन नहीं किया जा सकता; वही जब अलग होकर फलके रूपमें आ जाता है, तब संसारमें सभी को प्रिय लगने लगता है | (६८) दूधमें घी रहता ही है, किन्तु उस समय उसका अलग स्वाद नही मिलता; वही जब उससे अलग हो जाता है, तब देवताओंके लिए भी स्वादवर्धक हो जाता है | (६९) खाँड ईखके ओर-छोर और बीचमें भी व्याप्त रहती है, तथापि अलग होनेपर उसकी कुछ और ही मिठास होती है | एसी ही यह भागवतकी कथा है | (७०) यह भागवतपुराण वेदोंके समान है | श्रीव्यासदेवने इसे भक्ति, ज्ञान और वैराग्यकी स्थापनाके लिए प्रकाशित किया है | (७१) पूर्वकालमें जिस समय वेद-वेदान्तके पारगामी और गीताकी भी रचना करनेवाले भगवान् व्यासदेव खिन्न होकर अज्ञानसमुद्रमें गोते खा रहे थे, उस समय आपने ही उन्हें चार श्लोकोंमें इसका उपदेश किया था | उसे सुनते ही उनकी सारी चिन्ता दूर हो गयी थी | (७२-७३) फिर इसमें आपको आश्चर्य क्यों हो रहा है, जो आप हमसे प्रश्न कर रहे हैं ? आपको उन्हें शोक और दुःखका विनाश करनेवाला श्रीमद्भागवतपुराण ही सुनाना चाहिए | (७४)
नारदजीने कहा – महानुभावो! आपका दर्शन जीवके सम्पूर्ण पापोंको तत्काल नष्ट कर देता है और जो संसार-दुःखरूप दावानलसे तपे हुए हैं, उनपर शीघ्र ही शान्तिकी वर्षा करता है | आप निरन्तर शेषजीके सहस्त्र मुखोंसे गाये हुए भगवत्कथामृतका ही पान करते रहते हैं | मैं प्रेमलक्षणा भक्तिका प्रकाश करनेके उद्देश्यसे आपकी शरण लेता हूँ | (७५) जब अनेकों जन्मोंके संचित पुण्यपुंजका उदय होनेसे मनुष्यको सत्संग मिलता है, तब वह उसके अज्ञानजनित मोह और मदरूप अन्धकारका नाश करके विवेक उदय होता है | (७६)

*** जय श्रीहरि ***

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