Thursday, August 15, 2013

श्रीमद्भागवतमहात्म्य तीसरा अध्याय भक्तिके कष्टकी निवृत्ति

|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||
|| श्री हरी ||
श्रीमद्भागवतमहात्म्य
तीसरा अध्याय
भक्तिके कष्टकी निवृत्ति 

नारदजी कहते हैं – अब मैं भक्ति, ज्ञान और वैराग्यको स्थापित करनेके लिए प्रयत्नपूर्वक श्रीशुकदेवजीके कहे हुए भागवतशास्त्रकी कथाद्वारा उज्जवल ज्ञानयज्ञ करूँगा | (१) यह यज्ञ मुझे कहाँ करना चाहिये, आप इसके लिए कोई स्थान बता दीजिये | आपलोग वेदके पारगामी हैं, इसलिए मुझे इस शुकशास्त्रकी महिमा सुनाइये | (२) यह भी बताइये कि श्रीमद्भागवतकी कथा कितने दिनोंमें सुनानी चाहिए और उसके सुननेकी विधि क्या है | (३)
सनकादि बोले – नारदजी! आप बड़े विनीत और विवेकी हैं | सुनिये, हम आपको ये सब बातें बताते हैं | हरिद्वारके पास आनंद नामका एक घाट है | (४) वहाँ अनेकों ऋषि रहते हैं तथा देवता और सिद्धलोग भी उसका सेवन करते रहते हैं | भाँती-भाँतीके वृक्ष और लताओंके कारण वह बड़ा सघन है और वहाँ बड़ी कोमल नवीन बालू बिछी हुई है | (५) वह घाट बड़ा ही सुरम्य और एकान्त प्रदेशमें है, वहाँ हर समय सुनहले कमलोंकी सुगन्ध आया करती है | उसके आस-पास रहनेवाले सिंह, हाथी आदि परस्पर-विरोधी जीवोंके चितमें भी वैरभाव नहीं है | (६) वहाँ आप बिना किसी विशेष प्रयत्नके ही ज्ञानयज्ञ आरम्भ कर दीजिये, उस स्थानपर कथामें अपूर्व रसका उदय होगा | (७) भक्ति भी अपनी आखोंके ही सामने निर्बल और जराजीर्ण अवस्थामें पड़े हुए ज्ञान और वैराग्यको साथ लेकर वहाँ आ जायगी | (८) क्योंकि जहाँ भी श्रीमद्भागवतकी कथा होती है, वहाँ ये भक्ति आदि अपने-आप पहुँच जाते हैं | वहाँ कानोंमें कथाके शब्द पड़नेसे ये तीनों तरुण हो जायेंगे | (९)
सूतजी कहते हैं – इस प्रकार कहकर नारदजी के साथ सनकादि भी श्रीमद्भागवतकथामृतका पान करनेके लिए वहाँसे तुरंत गंगातटपर चले आये | (१०) जिस समय वे तटपर पहुंचे, भूलोक, देवलोक और ब्रह्मलोक – सभी जगह इस कथाका हल्ला हो गया | (११) जो-जो भगवतकथाके रसिक विष्णुभक्त थे, वे सभी श्रीमद्भागवतकथामृतका पान करनेके लिये सबसे आगे दौड़-दौड़कर आने लगे | (१२) भृगु, वसिष्ठ, च्यवन, गौतम, मेधातिथि, देवल, देवरात, परशुराम, विश्वामित्र, शाकल, मार्कण्डेय, दत्तात्रेय, पिप्पलाद, योगेश्वर व्यास और पराशर, छायाशुक, जाजलि और जहू आदि सभी प्रधान-प्रधान मुनिगण अपने-अपने पुत्र, शिष्य और स्त्रियोंसमेत बड़े प्रेमसे वहाँ आये | (१३-१४) इनके सिवा वेद, वेदान्त (उपनिषद), मन्त्र, तन्त्र, सत्रह पुराण और छहों शास्त्र भी मूर्तिमान् होकर वहाँ उपस्थित हुए | (१५)
गंगा आदि नदियाँ, पुष्कर आदि सरोवर, कुरुक्षेत्र आदि समस्त क्षेत्र, सारी दिशाएँ, दण्डक आदि वन हिमालय आदि पर्वत तथा देव, गन्धर्व और दानव आदि सभी कथा सुनने चले आये | जो लोग अपने गौरवके कारण नहीं आये, महर्षि भृगु उन्हें समझाबुझाकर ले आये | (१६-१७)
तब कथा सुनानेके लिए दीक्षित होकर श्रीकृष्ण-परायण सनकादि नांरदजीके दिए हुए श्रेष्ठ आसनपर विराजमान हुए | उस समय सभी श्रोताओंने उनकी वन्दना की | (१८) श्रोताओंमें वैष्णव, विरक्त, संन्यासी और ब्रह्मचारी लोग आगे बैठे और उन सबके आगे नारदजी विराजमान हुए | (१९) एक ओर ऋषिगण, एक ओर देवता, एक ओर वेद और उपनिषदादि तथा एक ओर तीर्थ बैठे और दूसरी ओर स्त्रियाँ बैठीं | (२०) उस समय सब ओर जय-जयकार, नमस्कार और शङ्खोंका शब्द होने लगा और अबीर-गुलाल, खील एवं फूलोंकी खूब वर्षा होने लगी | (२१) कोई-कोई देवश्रेष्ठ तो विमानोंपर चढ़कर, वहाँ बैठे हुए सब लोगोंपर कल्पवृक्षके पुष्पोंकी वर्षा करने लगे | (२२)
सूतजी कहते हैं – इस प्रकार पूजा समाप्त होनेपर जब सब लोग एकाग्रचित हो गये, तब सनकादि ऋषि महात्मा नारदको श्रीमद्भागवतका महात्म्य स्पष्ट करके सुनाने लगे | (२३)
सनकादिने कहा – अब हम आपको इस भागवतशास्त्रकी महिमा सुनाते हैं | इसके श्रवणमात्रसे मुक्ति हाथ लग जाती है | (२४) श्रीमद्भागवतकी कथाका सदा-सर्वदा सेवन, आस्वादन करना चाहिए | इसके श्रवणमात्रसे श्रीहरि ह्रदयमें आ विराजते हैं | (२५) इस ग्रन्थमें अठारह हजार श्लोक और बारह स्कन्द हैं तथा श्रीशुकदेव और राजा परीक्षित् का संवाद है | आप यह भागवतशास्त्र ध्यान देकर सुनिये | (२६) यह जीव तभीतक अज्ञानवश इस संसारचक्रमें भटकता है, जबतक क्षणभरके लिए भी कानो में इस शुकशास्त्रकी कथा नही पड़ती | (२७) बहुत-से शास्त्र और पुराण सुननेसे क्या लाभ है, इससे तो व्यर्थका भ्रम बढ़ता है | मुक्ति देनेके लिए तो एकमात्र भागवतशास्त्र ही गरज रहा है | (२८) जिस घरमें नित्यप्रति श्रीमद्भागवतकी कथा होती है, वह तीर्थरूप हो जाता है और जो लोग उसमें रहते हैं, उनके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं | (२९) हजारों अश्वमेघ और सैकड़ों वाजपेय यज्ञ इस शुकशास्त्रकी कथाका सोलहवाँ अंश भी नहीं हो सकते | (३०) तपोधनो! जबतक लोग अच्छी तरह श्रीमद्भागवतका श्रवण नहीं करते, तभीतक उनके शरीरमें पाप निवास करते हैं | (३१) फलकी दृष्टिसे इस शुकशास्त्रकथाकी समता गंगा, गया, काशी, पुष्कर या प्रयाग – कोई तीर्थ भी नहीं कर सकता | (३२)
यदि आपको परम गतिकी इच्छा है तो अपने मुखसे ही श्रीमद्भागवतके आधे अथवा चौथाई श्लोकका भी नित्य नियमपूर्वक पाठ कीजिये | (३३) ॐकार, गायत्री, पुरुषसूक्त, तीनों वेद, श्रीमद्भागवत, ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ – यह द्वादशाक्षर मन्त्र, बारह मूर्तियोंवाले सूर्यभगवान, प्रयाग, संवत्सररूप काल, ब्राह्मण, अग्निहोत्र, गौ, द्वादशी तिथि, तुलसी, वसन्त ऋतु और भगवान पुरुषोत्तम – इन सबमें बुद्धिमान् लोग वस्तुतः कोई अन्तर नहीं मानते | (३४-३६) जो पुरुष अहर्निश अर्थसहित श्रीमद्भागवत-शास्त्रका पाठ करता है, उसके करोड़ों जन्मोंका पाप नष्ट हो जाता है – इसमें तनिक भी संदेह नहीं है | (३७) जो पुरुष नित्यप्रति भागवतका आधा य चौथाई श्लोक भी पढ़ता है, उसे राजसूय और अश्वमेघयज्ञोंका फल मिलता है | (३८) नित्य भागवतका पाठ करना, भगवान् का चिंतन करना, तुलसीको सींचना और गौकी सेवा करना – ये चारों समान हैं | (३९) जो पुरुष अन्तसमयमें श्रीमद्भागवतका वाक्य सुन लेता है, उसपर प्रसन्न होकर भगवान् उसे वैकुण्ठधाम देते हैं | (४०) जो पुरुष इसे सोनेके सिंहासनपर रखकर विष्णुभक्तों को दान करता है, वाह अवश्य ही भगवान् का सायुज्य प्राप्त करता है | (४१)
जिस दुष्टने अपनी सारी आयुमें चितको एकाग्र करके श्रीमद्भागवतकथामृतका थोडा-सा भी रसास्वादन नहीं किया, उसने तो अपना सारा जन्म चाण्डाल और गधेके समान व्यर्थ ही गँवा दिया; वह तो अपनी माताको प्रसव-पीड़ा पहुचानेके लिये ही उत्पन्न हुआ | (४२) जिसने इस शुकशास्त्रके थोड़े-से भी वचन नहीं सुने, वह पापात्मा तो जीता हुआ ही मुर्देके समान है | ‘पृथ्वीके भारस्वरुप उस पशुतुल्य मनुष्यको धिक्कार है’ – यों स्वर्गलोकमें देवताओंमें प्रधान इन्द्रादि कहा करते हैं | (४३)
संसारमें श्रीमद्भागवतकी कथाका मिलना अवश्य ही कठिन है; जब करोड़ों जन्मों का पुण्य होता है, तभी इसकी प्राप्ति होती है | (४४) नारदजी! आप बड़े ही बुद्धिमान और योगनिधि हैं | आप प्रयत्नपूर्वक कथाका श्रवण कीजिये | इसे सुननेके लिए दिनोंका कोई नियम नहीं है, इसे तो सर्वदा ही सुनना अच्छा है | (४५) इसे सत्यभाषण और ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक सर्वदा ही सुनना श्रेष्ठ माना गया है | किन्तु कलियुगमें एसा होना कठिन है; इसलिए इसकी शुकदेवजीने जो विशेष विधि वतायी है, वह जान लेनी चाहिये | (४६) कलियुग में बहुत दिनोंतक चित्तकी वृत्तियोंको वशमें रखना, नियमोंमें बँधे रहना और किसी पुण्यकार्यके लिए दीक्षित रहना कठिन है; इसीलिए सप्ताह-श्रवणकी विधि है | (४७) श्रद्धापूर्वक कभी भी श्रवण करनेसे अथवा माघमासमें श्रवण करनेसे जो फल होता है, वही फल श्रीशुकदेवजीने सप्ताहश्रवनमें निर्धारित किया है | (४८) मनके असंयम, रोगोंकी बहुलता और आयुकी अल्पताके कारण तथा कलियुगमें अनेकों दोषोंकी सम्भावनासे ही सप्ताहश्रवणका विधान किया गया है | (४९) जो फल तप, योग और समाधिसे भी प्राप्त नहीं हो सकता, वह सर्वांगरूपमें सप्ताहश्रवणसे सहजमें ही मिल जाता है | (५०) सप्ताहश्रवण यज्ञसे बढ़कर है, व्रतसे बढ़कर है, तप से बढ़कर है | तीर्थसेवनसे तो सदा ही बड़ा है, योगसे बढ़कर है – यहाँतक कि ध्यान और ज्ञानसे भी बढ़कर है, अजी! इसकी विशेषता कहाँतक वर्णन करें, यह तो सभी से बढ़-चढ़कर है | (५१-५२)
शौनकजीने पूछा – सूतजी! यह तो आपने बड़े आश्चर्यकी बात कही | अवश्य ही यह भागवतपुराण योगवेता ब्रह्माजीके भी आदिकारण श्रीनारायणका निरूपण करता है; परन्तु यह मोक्षकी प्राप्तिमें ज्ञानादि सभी साधनोंका तिरस्कार करके इस युगमें उनसे भी कैसे बढ़ गया ? (५३)
सूतजीने कहा – शौनकजी! जब भगवान् श्रीकृष्णा इस धराधामको छोड़कर अपने नित्यधामको जाने लगे, तब उनके मुखारविन्दसे एकादश स्कन्धका ज्ञानोपदेश सुनकर भी उद्धवजीने पूछा | (५४)
उद्धवजी बोले – गोविन्द! अब आप तो अपने भक्तोंका कार्य करके परमधामको पधारना चाहते हैं; किन्तु मेरे मनमें एक बड़ी चिंता है | उसे सुनकर आप मुझे शांत कीजिये | (५५) अब घोर कलिकाल आया ही समझिये, इसलिए संसारमें फिर अनेकों दुष्ट प्रकट हो जायँगे; उनके संसर्गसे जब अनेकों सत्पुरुष भी उग्र प्रकृति के हो जायँगे, तब उनके भारसे दबकर यह गोरूपिणी पृथ्वी किसकी शरणमें जायगी ? कमलनयन! मुझे तो आपको छोड़कर इसकी रक्षा करनेवाला कोई दूसरा नहीं दिखायी देता | (५६-५७) इसलिये भक्तवत्सल! आप साधुओंपर कृपा करके यहाँसे मत जाइये | भगवन्! आपने निराकार और चिन्मात्र होकर भी भक्तोंके लिए ही तो यह सगुण रूप धारण किया है | (५८) फिर भला, आपका वियोग होनेपर वे भक्तजन पृथ्वीपर कैसे रह सकेंगे ? निर्गुणोपासनामें तो बड़ा कष्ट है | इसलिये कुछ और विचार कीजिये | (५९)
प्रभासक्षेत्रमें उद्धवजीके ये वचन सुनकर भगवान् सोचने लगे कि भक्तोंके अवलम्बके लिये मुझे क्या व्यवस्था करनी चाहिये | (६०) शौनकजी! तब भगवान् ने अपनी सारी शक्ति भागवतमें रख दी; वे अन्तरर्धान होकर इस भागवतसमुद्रमें प्रवेश कर गये | (६१) इसलिए यह भगवानकी साक्षात् शब्दमयी मूर्ति है | इसके सेवन, श्रवण, पाठ अथवा दर्शनसे ही मनुष्यके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं | (६२) इसीसे इसका सप्ताहश्रवण सबसे बढ़कर माना गया है और कलियुगमें तो अन्य सब साधनोंको छोड़कर यही प्रधान धर्म बताया गया है | (६३) कलिकालमें यही ऐसा धर्म है, जो दुःख, दरिद्रता, दुर्भाग्य और पापोंकी सफाई कर देता है तथा काम-क्रोधादि शत्रुओंपर विजय दिलाता है | (६४) अन्यथा, भगवानकी इस माया से पीछा छुड़ाना देवताओंके लिए भी कठिन है, मुनष्य तो इसे छोड़ ही कैसे सकते हैं | अतः इससे छुटनेके लिए भी सप्ताहश्रवणका विधान किया गया है | (६५)
सूतजी कहते हैं – शौनकजी! जिस समय सनकादि मुनीश्वर इस प्रकार सप्ताहश्रवण की महिमा का बखान कर रहे थे, उस सभामें एक बड़ा आश्चर्य हुआ; उसे मैं तुम्हे बतलाता हूँ, सुनो | (६६) वहाँ तरुणावस्थाको प्राप्त हुए अपने दोनों पुत्रोंको साथ लिये विशुद्ध प्रेमरूपा भक्ति बार-बार ‘श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे! मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव!’ आदि भगवन्नामोंका उच्चारण करती हुई अकस्मात् प्रकट हो गयीं | (६७) सभी सदस्योंने देखा कि परम सुन्दरी भक्तिरानी भागवतके अर्थोंका आभूषण पहने वहाँ पधारीं | मुनियोंकी उस सभामें सभी यह तर्क-वितर्क करने लगे कि ये कैसे आयीं, कैसे प्रविष्ट हुईं | (६८) तब सनकादिने कहा – ‘ये भक्तिदेवी अभी-अभी कथा के अर्थसे निकली हैं |’ उनके ये वचन सुनकर भक्तिने अपने पुत्रोंसमेत अत्यंत विनम्र होकर सनत्कुमारजी से कहा | (६९)
भक्ति बोलीं – मैं कलियुगमें नष्टप्राय हो गयी थी, आपने कथामृतसे सींचकर मुझे फिर पुष्ट कर दिया | अब आप यह बताइये की मैं कहाँ रहूँ ? यह सुनकर सनकादि ने उससे कहा – (७०) ‘तुम भक्तोंको भगवानका स्वरुप प्रदान करनेवाली, अनन्यप्रेमका सम्पादन करनेवाली और संसार-रोग को निर्मूल करनेवाली हो; अतः तुम धैर्य धारण करके नित्य-निरंतर विष्णुभक्तोंके ह्रदयोंमें ही निवास करो | (७१) ये कलियुगके दोष भले ही सारे संसारपर अपना प्रभाव डालें, किन्तु वहाँ तुमपर इनकी दृष्टि भी नहीं पड़ सकेगी |’ इस प्रकार उनकी आज्ञा पाते ही भक्ति तुरन्त भगवद् भक्तोंके ह्रदय में जा विराजी | (७२)
जिनके ह्रदयमें एकमात्र श्रीहरिकी भक्ति निवास करती है; वे त्रिलोकीमें अत्यन्त निर्धन होनेपर भी परम धन्य हैं; क्योंकि इस भक्तिकी डोरीसे बँधकर तो साक्षात् भगवान् भी अपना परमधाम छोड़कर उनके ह्रदयमें आकर बस जाते हैं | (७३) भूलोकमें यह भागवत साक्षात् परब्रह्मका विग्रह है, हम इसकी महिमा कहाँतक वर्णन करें | इसका आश्रय लेकर इसे सुनानेसे तो सुनने और सुनानेवाले दोनोंको ही भगवान् श्रीकृष्णकी समता प्राप्त हो जाती है | अतः इसे छोड़कर अन्य धर्मोंसे क्या प्रयोजन है | (७४)

*** जय श्रीहरि ***

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