|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||
|| श्री हरी ||
श्रीमद्भागवतमहात्म्य
पाँचवाँ अध्याय
धुन्धुकारीको प्रेतयोनिकी प्राप्ति और उससे उद्धार
सूतजी कहते हैं - शौनकजी! पिताके वन चले जानेपर एक दिन धुन्धुकारीने अपनी माताको बहुत पीटा और कहा – ‘बता, धन कहाँ रखा है ? नहीं तो अभी तेरी लुआठी (जलती लकड़ी) से खबर लूँगा |’ (१) उसकी इस धमकीसे डरकर और पुत्रके उपद्रवोंसे दुखी होकर वह रात्रीके समय कुएँमें जा गिरी और इसीसे उसकी मृत्यु हो गयी | (२) योगनिष्ठ गोकर्णजी तीर्थयात्राके लिये निकल गये | उन्हें इन घटनाओंसे कोई सुख या दुःख नहीं होता था; क्योंकि उनका न कोई मित्र था न शत्रु | (३)
धुन्धुकारी पाँच वेश्याओंके साथ घरमें रहने लगा | उनके लिए भोग-सामग्री जुटानेकी चिन्ताने उसकी बुद्धि नष्ट कर दी और वह नाना प्रकारके अत्यंत क्रूर कर्म करने लगा | (४) एक दिन उन कुलटाओंने उससे बहुत-से गहने माँगे | वह तो कामसे अँधा हो रहा था, मौतकी उसे कभी याद नहीं आती थी | बस, उन्हें जुटानेके लिए वह घरसे निकल पड़ा | (५) वह जहाँ-तहाँसे बहुत-सा धन चुराकर घर लौट आया तथा उन्हें कुछ सुंदर वस्त्र और आभूषण लाकर दिये | (६) चोरीका बहुत माल देखकर रात्रिके समय स्त्रियोंने विचार किया कि ‘ये नित्य ही चोरी करता है, इसलिये इसे किसी दिन अवश्य राजा पकड़ लेगा | (७) राजा यह सारा धन छीनकर इसे निश्च्रय ही प्राणदण्ड देगा | जब एक दिन इसे मरना ही है, तब हम ही धनकी रक्षाके लिए गुप्तरूपसे इसको क्यों न मार डालें | (८) इसे मारकर हम इसका माल-मता लेकर जहाँ-कहीं चली जायँगी |’ एसा निश्च्रय कर उन्होंने सोये हुए धुन्धुकारीको रस्सियोंसे कस दिया और उसके गलेमें फाँसी लगाकर उसे मारनेका प्रयत्न किया | इससे जब वह जल्दी न मरा, तो उन्हें बड़ी चिन्ता हुई | (९-१०) तब उन्होंने उसके मुखपर बहुत-से दहकते अँगारे डाले; इससे वह अग्निकी लपटोंसे बहुत छटपटाकर मर गया | (११) उन्होंने उसके शरीरको एक गड्डेमें डालकर गाड़ दिया | सच है, स्त्रियाँ प्रायः बड़ी दु:साहसी होती हैं | उनके इस कृत्यका किसीको भी पता न चला | (१२) लोगोंके पूछनेपर वह कह देती थीं कि ‘हमारे प्रियतम पैसे के लोभसे अबकी बार कहीं दूर चले गये हैं, इसी वर्षके अंदर लौट आयेंगे |’ (१३) बुद्धिमान् पुरुषको दुष्टा स्त्रियोंका कभी विश्वास न करना चाहिये | जो मुर्ख इनका विश्वास करता है, उसे दुखी होना पड़ता है | (१४) इनकी वाणी तो अमृतके समान कामियोंके ह्रदयमें रसका संचार करती है; किन्तु ह्रदय छूरेकी धारके समान तीक्ष्ण होता है | भला, इन स्त्रियोंका कौन प्यारा है ? (१५)
वे कुलटाएँ धुन्धुकारीकी सारी सम्पत्ति समेटकर वहाँसे चंपत हो गयीं; उनके ऐसे न जाने कितने पति थे | और धुन्धुकारी अपने कुकर्मोंके कारण भयंकर प्रेत हुआ | (१६) वह बवंडरके रूपमें सर्वदा दासों दिशाओंमें भटकता रहता था तथा शीत-धामसे सन्तप्त और भूख-प्याससे व्याकुल होनेके कारण ‘हा दैव! हा दैव!’ चिल्लाता रहता था | परन्तु उसे कहीं भी कोई आश्रय न मिला | कुछ काल बीतनेपर गोकर्णने भी लोगोंके मुखसे धुन्धुकारीकी मृत्युका समाचार सुना | (१७-१८) तब उसे अनाथ समझकर उन्होंने उसका गयाजीमें श्राद्ध किया; और भी जहाँ-जहाँ वे जाते थे, उसका श्राद्ध अवश्य करते थे | (१९)
इस प्रकार घूमते-घूमते गोकर्णजी अपने नगरमें आये और रात्रिके समय दूसरोंकी दृष्टिसे बचकर सीधे अपने घरके आँगनमें सोनेके लिए पहुँचे | (२०) वहाँ अपने भाईको सोया देख आधी रातके समय धुन्धुकारीने अपना बड़ा विकट रूप दिखाया | (२१) वह कभी भेड़ा, कभी हाथी, कभी भैंसा, कभी इन्द्र और कभी अग्निका रूप धारण करता | अन्तमें वह मनुष्यके आकारमें प्रकट हुआ | (२२) ये विपरीत अवस्थाएँ देखकर गोकर्णने निश्च्रय किया कि यह कोई दुर्गतिको प्राप्त हुआ जीव है | तब उन्होंने उससे धैर्यपूर्वक पूछा | (२३)
गोकर्णने कहा – तू कौन है ? रात्रिके समय ऐसे भयानक रूप क्यों दिखा रहा है ? तेरी यह दशा कैसे हुई ? हमें बता तो सही – तू प्रेत है, पिशाच है अथवा कोई राक्षस है ? (२४)
सूतजी कहते हैं – गोकर्णके इस प्रकार पूछनेपर वह बार-बार जोर-जोरसे रोने लगा | उसमें बोलनेकी शक्ति नहीं थी, इसलिए उसने केवल संकेतमात्र किया | (२५) तब गोकर्णने अंजलिमें जल लेकर उसे अभिमन्त्रित करके उसपर छिड़का | इससे उसके पापोंका कुछ शमन हुआ और वह इस प्रकार कहने लगा | (२६)
प्रेत बोला – ‘मैं तुम्हारा भाई हूँ | मेरा नाम है धुन्धुकारी | मैंने अपने ही दोषसे अपना ब्राह्मणत्व नष्ट कर दिया | (२७) मेरे कुकर्मोंकी गिनती नहीं की जा सकती | मैं तो महान् अज्ञानमें चक्कर काट रहा था | इसीसे मैंने लोगोंकी बड़ी हिंसा की | अन्तमें कुलटा स्त्रियोंने मुझे तड़पा-तड़पाकर मार डाला | (२८) इसीसे अब प्रेत-योनिमें पड़कर यह दुर्दशा भोग रहा हूँ | अब दैववश कर्मफलका उदय होनेसे मैं केवल वायुभक्षण करके जी रहा हूँ | (२९) भाई! तुम दयाके समुद्र हो; अब किसी प्रकार जल्दी ही मुझे इस योनीसे छुड़ाओ |’ गोकर्णने धुन्धुकारीकी सारी बातें सुनीं और तब उससे बोले | (३०)
गोकर्णने कहा – भाई! मुझे इस बातका बड़ा आश्चर्य है – मैंने तुम्हारे लिए विधिपूर्वक गयाजीमें पिण्डदान किया, फिर भी तुम प्रेतयोनिसे मुक्त कैसे नहीं हुए ? (३१) यदि गया-श्राद्धसे भी तुम्हारी मुक्ति नहीं हुई, तब इसका और कोई उपाय ही नहीं है | अच्छा, तुम सब बात खोलकर कहो – मुझे अब क्या करना चाहिये ? (३२)
प्रेतने कहा – मेरी मुक्ति सैकड़ों गया-श्राद्ध करनेसे भी नहीं हो सकती | अब तो तुम इसका कोई और उपाय सोचो | (३३)
प्रेतकी यह बात सुनकर गोकर्णको बड़ा आश्चर्य हुआ | वे कहने लगे – ‘यदि सैकड़ों गया-श्राद्धोंसे भी तुम्हारी मुक्ति नहीं हो सकती, तब तो तुम्हारी मुक्ति असम्भव ही है | (३४) अच्छा, अभी तो तुम निर्भय होकर अपने स्थान पर रहो; मैं विचार करके तुम्हारी मुक्तिके लिये कोई दूसरा उपाय करूँगा |’ (३५)
गोकर्णकी आज्ञा पाकर धुन्धुकारी वहाँसे अपने स्थानपर चला आया | इधर गोकर्णने रातभर विचार किया, तब भी उन्हें कोई उपाय नहीं सूझा | (३६) प्रातःकाल उनको आया देख लोग प्रेमसे उनसे मिलने आये | तब गोकर्णने रातमें जो कुछ जिस प्रकार हुआ था, वह सब उन्हें सुना दिया | (३७) उनमें जो लोग विद्वान्, योगनिष्ठ, ज्ञानी और वेदज्ञ थे, उन्होंने भी अनेकों शास्त्रोंको उलट-पलटकर देखा; तो भी उसकी मुक्तिका कोई उपाय न मिला | (३८) तब सबने यही निश्च्रय किया कि इस विषयमें सूर्यनारायण जो आज्ञा करें, वही करना चाहिये | अतः गोकर्णने अपने तपोबलसे सूर्यकी गतिको रोक दिया | (३९) उन्होंने स्तुति की – ‘भगवन्! आप सारे संसारके साक्षी हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ | आप मुझे कृपा करके धुन्धुकारीकी मुक्तिका साधन बताइये |’ गोकर्णकी यह प्रार्थना सुनकर सूर्यदेवने दूरसे ही स्पष्ट शब्दोंमें कहा – ‘श्रीमद्भागवतसे मुक्ति हो सकती है, इसलिए तुम उसका सप्ताह-परायण करो |’ सूर्यका यह धर्ममय वचन वहाँ सभीने सुना | (४०-४१) तब सबने यही कहा कि ‘प्रयत्नपूर्वक यही करो, है भी यह साधन बहुत सारल |’ अतः गोकर्णजी भी तदनुसार निश्च्रय करके कथा सुनानेके लिए तैयार हो गये | (४२)
देश और गाँवोंसे अनेकों लोग कथा सुननेके लिये आये | बहुत-से लँगड़े-लूले, अंधे, बूढ़े और मन्दबुद्धि पुरुष भी अपने पापोंकी निवृत्तिके उद्देश्यसे वहाँ आ पहुँचे | (४३) इस प्रकार वहाँ इतनी भीड़ हो गयी कि उसे देखकर देवताओंको भी आश्चर्य होता था | जब गोकर्णजी व्यासगद्दीपर बैठकर कथा कहने लगे, तब वह प्रेत भी वहाँ आ पहुँचा और इधर-उधर बैठनेके लिये स्थान ढूँढने लगा | इतनेमें ही उसकी दृष्टि एक सीधे रखे हुए सात गाँठके बाँसपर पड़ी | (४४-४५) उसीके नीचेके छिद्रमें घुसकर वह कथा सुननेके लिये बैठ गया | वायुरूप होनेके कारण वह बाहर कहीं बैठ नहीं सकता था, इसलिये बाँसमें घुस गया | (४६)
गोकर्णजीने एक वैष्णव ब्राह्मणको मुख्य श्रोता बनाया और प्रथमस्कन्धसे ही स्पष्ट स्वरमें कथा सुनानी आरम्भ कर दी | (४७) सायंकालमें जब कथाको विश्राम दिया, तब एक बड़ी विचित्र बात हुई | वहाँ सभासदोंके देखते-देखते उस बाँसकी एक गाँठ तड़-तड़ शब्द करती फट गयी | (४८) इसी प्रकार दूसरे दिन सायंकालमें दूसरी गाँठ फटी और तीसरे दिन उसी समय तीसरी | (४९) इस प्रकार सात दिनोंमें सातों गाठोंको फोड़कर धुन्धुकारी बारहों स्कन्धोंके सुनने से पवित्र होकर प्रेतयोनिसे मुक्त हो गया और दिव्यरूप धारण करके सबके सामने प्रकट हुआ | उसका मेघके समान श्याम शरीर पीताम्बर और तुलसीकी मालाओंसे सुशोभित था तथा सरपर मनोहर मुकुट और कानोंमें कमनीय कुंडल झिलमिला रहे थे | (५०-५१) उसने तुरंत अपने भाई गोकर्ण को प्रणाम करके कहा – ‘भाई! तुमने कृपा करके मुझे प्रेतयोनिकी यातनाओंसे मुक्त कर दिया | (५२) यह प्रेतपीड़ाका नाश करनेवाली श्रीमद्भागवतकी कथा धन्य है तथा श्रीकृष्णचन्द्रके धामकी प्राप्ति करानेवाला इसका सप्ताह-परायण भी धन्य है! | (५३) जब सप्ताह-श्रवणका योग लगता है, तब सब पाप थर्रा उठते हैं कि अब यह भागवतकी कथा जल्दी ही हमारा अन्त कर देगी | (५४) जिस प्रकार आग गीली-सूखी, छोटी-बड़ी – सब तरह की लकड़ियोंको जला डालती है, उसी प्रकार यह सप्ताह-श्रवण मन, वचन और कर्मद्वारा किये हुए नये-पुराने, छोटे-बड़े – सभी प्रकारके पापोंको भस्म कर देता है | (५५)
विद्वानोंने देवताओंकी सभामें कहा है कि जो लोग इस भारतवर्षमें श्रीमद्भागवतकी कथा नहीं सुनते, उनका जन्म वृथा ही है | (५६) भला, मोहपूर्वक लालन-पालन करके यदि इस अनित्य शरीरको हष्ट-पुष्ट और बलवान् भी बना लिया तो भी श्रीमद्भागवतकी कथा सुने बिना इससे क्या लाभ हुआ ? (५७) अस्थियाँ ही इस शरीरके आधारस्तम्भ हैं, नस-नाडीरूप रस्सियोंसे यह बँधा हुआ है, ऊपरसे इसपर मांस और रक्त थोपकर इसे चर्मसे मँढ़ दिया गया है | इसके प्रत्येक अंगमें दुर्गन्ध आती है; क्योंकि है तो यह मल-मूत्रका भाण्ड ही | (५८) वृद्धावस्था और शोकके कारण यह परिणाममें दुःखमय ही है, रोगोंका तो घर ही ठहरा | यह निरन्तर किसी-न-किसी कामनासे पीड़ित रहता है, कभी इसकी तृप्ति नहीं होती | इसे धारण किये रहना भी एक भार ही है; इसके रोम-रोममें दोष भरे हुए हैं और नष्ट होनेमें इसे एक क्षण भी नहीं लगता | (५९) अन्तमें यदि इसे गाड़ दिया जाता है तो इसके कीड़े बन जाते हैं; कोई पशु खा जाता है तो यह विष्ठा हो जाता है और अग्निमें जला दिया जाता है तो भस्मकी ढेरी हो जाता है | ये तीन ही इसकी गतियाँ बतायी गयी हैं | ऐसे अस्थिर शरीरसे मनुष्य अविनाशी फल देनेवाला काम क्यों नहीं बना लेता ? (६०) जो अन्न प्रातःकाल पकाया जाता है, वह सायंकालतक बिगड़ जाता है; फिर उसीके रससे पुष्ट हुए शरीरकी नित्यता कैसी | (६१)
इस लोकमें सप्ताहश्रवण करनेसे भगवान् की शीघ्र ही प्राप्ति हो सकती है | अतः सब प्रकारके दोषोंकी निवृत्तिके लिये एकमात्र यही साधन है | (६२) जो लोग भागवतकी कथासे वंचित हैं, वे तो जलमें बुद्बुदे और जीवोंमें मच्छरोंके समान केवल मरनेके लिए ही पैदा होते हैं | (६३) भला, जिसके प्रभावसे जड़ और सूखे हुए बाँसकी गाँठे फट सकती हैं, उस भागवतकथाका श्रवण करनेसे चितकी गाँठोंका खुल जाना कौन बड़ी बात है | (६४) सप्ताह-श्रवण करनेसे मनुष्यके ह्रदयकी गाँठ खुल जाती है, उसके समस्त संशय छिन्न-भिन्न हो जाते हैं और सारे कर्म क्षीण हो जाते हैं | (६५) यह भागवतकथारूप तीर्थ संसारके कीचड़को धोनेमें बड़ा ही पटु है | विद्वानोंका कथन है कि जब यह ह्रदयमें स्थित हो जाता है, तब मनुष्य की मुक्ति निश्च्रित ही समझनी चाहिये |’ (६६)
जिस समय धुन्धुकारी ये सब बातें कह रहा था, जिसके लिये वैकुण्ठवासी पार्षदोंके सहित एक विमान उतरा; उससे सब ओर मण्डलाकार प्रकाश फैल रहा था | (६७) सब लोगोंके सामने ही धुन्धुकारी उस विमानपर चढ़ गया | तब उस विमानपर आये हुए पार्षदोंको देखकर उनसे गोकर्णने यह बात कही | (६८)
गोकर्णने पूछा – भगवान् के प्रिय पार्षदो! यहाँ तो हमारे अनेकों शुद्धह्रदय श्रोतागण हैं, उन सबके लिये आपलोग एक साथ बहुत-से विमान क्यों नहीं लाये ? हम देखते हैं की यहाँ सभीने समानरूपसे कथा सुनी है, फिर फलमें इस प्रकारका भेद क्यों हुआ, यह बताइये | (६९-७०)
भगवान् के सेवकोंने कहा – हे मानद! इस फलभेदका कारण इनके श्रवणका भेद ही है | यह ठीक है की श्रवण तो सबने सामानरूपसे ही किया है, किन्तु इसके-जैसा मनन नहीं किया | इसीके साथ भजन करनेपर भी उसके फलमें भेद रहा | (७१) इस प्रेतने सात दिनोंतक निराहार रहकर श्रवण किया था, तथा सुने हुए विषयका स्थिरचितसे यह खूब मनन-निदिध्यासन भी करता रहता था | (७२) जो ज्ञान दृढ़ नहीं होता, वह व्यर्थ हो जाता है | इसी प्रकार ध्यान न देनेसे श्रवणका, संदेहसे मन्त्रका और चित्त के इधर-उधर भटकते रहनेसे जपका भी कोई फल नहीं होता | (७३) वैष्णवहीन देश, अपात्रको कराया हुआ श्राद्धका भोजन, अश्रोत्रियको दिया हुआ दान एवं आचारहीन कुल – इन सबका नाश हो जाता है | (७४) गुरुवचनोंमें विश्वास, दीनताका भाव, मनके दोषोंपर विजय और कथामें चित्तकी एकाग्रता इत्यादि नियमोंका यदि पालन किया जाय तो श्रवणका यथार्थ फल मिलता है | यदि ये श्रोता फिरसे श्रीमद्भागवतकी कथा सुनें तो निश्चय ही सबको वैकुण्ठकी प्राप्ति होगी | (७५-७६) और गोकर्णजी! आपको तो भगवान् स्वयं आकर गोलोकधाममें ले जायँगे | यों कहकर वे सब पार्षद हरिकिर्तन करते वैकुण्ठलोकको चले गये | (७७)
श्रावण मासमें गोकर्णजीने फिर उसी प्रकार सप्ताहक्रमसे कथा कही और उन श्रोताओंने उसे फिर सुना | (७८) नारदजी! इस कथा की समाप्तिपर जो कुछ हुआ, वह सुनिये | (७९) वहाँ भक्तोंसे भरे हुए विमानोंके साथ भगवान् प्रकट हुए | सब ओरसे खूब जय-जयकार और नमस्कारकी ध्वनियाँ होने लगीं | (८०) भगवान् स्वयं हर्षित होकर अपने पाञ्चजन्य शङ्खकी ध्वनि करने लगे और उन्होंने गोकर्णको ह्रदयसे लगाकर अपने ही समान बना लिया | (८१) उन्होंने क्षणभरमें ही अन्य सब श्रोताओंको भी मेघके समान श्यामवर्ण, रेशमी पीताम्बरधारी तथा किरीट और कुण्डलादि से विभूषित कर दिया | (८२) उस गाँवमें कुत्ते और चाण्डालपर्यन्त जितने भी जीव थे, वे सभी गोकर्णजीकी कृपासे विमानोंपर चढ़ा लिये गये | (८३) तथा जहाँ योगीजन जाते हैं, उस भगवद्धाममें वे भेज दिए गये | इस प्रकार भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण कथाश्रवणसे प्रसन्न होकर गोकर्णजीको साथ ले अपने ग्वालबालोंके प्रिय गोलोकधाममें चले गये | (८४) पूर्वकालमें जैसे अयोध्यावासी भगवान् श्रीरामके साथ साकेतधाम सिधारे थे, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण उन सबको योगिदुर्लभ गोलोकधामको ले गये | (८५) जिस लोकमें सूर्य, चन्द्रमा और सिद्धोंकी भी कभी गति नहीं हो सकती, उसमें वे श्रीमद्भागवत श्रवण करनेसे चले गये | (८६)
नारदजी! सप्ताहयज्ञके द्वारा कथा-श्रवण करनेसे जैसा उज्जवल फल संचित होता है, उसके विषयमें हम आपसे क्या कहें ? अजी! जिन्होंने अपने कर्णपुटसे गोकर्णजीकी कथाके एक अक्षरका भी पान किया था, वे फिर माताके गर्भमें नहीं आये | (८७) जिस गतिको लोग वायु, जल या पत्ते खाकर शरीर सुखानेसे, बहुत कालतक घोर तपस्या करनेसे और योगाभ्याससे भी नहीं पा सकते, उसे वे सप्ताहश्रवणसे सहजमें ही प्राप्त कर लेते हैं | (८८) इस परम पवित्र इतिहासका पाठ चित्रकूटपर विराजमान मुनीश्वर शाण्डिल्य भी ब्रह्मानन्दमें मग्न होकर करते रहते हैं | (८९) यह कथा बड़ी ही पवित्र है | एक बारके श्रवणसे ही समस्त पाप-राशिको भस्म कर देती है | यदि इसका श्राद्धके समय पाठ किया जाय, तो इससे पितृगणको बड़ी तृप्ति होती है और नित्य पाठ करनेसे मोक्षकी प्राप्ति होती है | (९०)
*** जय श्रीहरि ***
|| श्री हरी ||
श्रीमद्भागवतमहात्म्य
पाँचवाँ अध्याय
धुन्धुकारीको प्रेतयोनिकी प्राप्ति और उससे उद्धार
सूतजी कहते हैं - शौनकजी! पिताके वन चले जानेपर एक दिन धुन्धुकारीने अपनी माताको बहुत पीटा और कहा – ‘बता, धन कहाँ रखा है ? नहीं तो अभी तेरी लुआठी (जलती लकड़ी) से खबर लूँगा |’ (१) उसकी इस धमकीसे डरकर और पुत्रके उपद्रवोंसे दुखी होकर वह रात्रीके समय कुएँमें जा गिरी और इसीसे उसकी मृत्यु हो गयी | (२) योगनिष्ठ गोकर्णजी तीर्थयात्राके लिये निकल गये | उन्हें इन घटनाओंसे कोई सुख या दुःख नहीं होता था; क्योंकि उनका न कोई मित्र था न शत्रु | (३)
धुन्धुकारी पाँच वेश्याओंके साथ घरमें रहने लगा | उनके लिए भोग-सामग्री जुटानेकी चिन्ताने उसकी बुद्धि नष्ट कर दी और वह नाना प्रकारके अत्यंत क्रूर कर्म करने लगा | (४) एक दिन उन कुलटाओंने उससे बहुत-से गहने माँगे | वह तो कामसे अँधा हो रहा था, मौतकी उसे कभी याद नहीं आती थी | बस, उन्हें जुटानेके लिए वह घरसे निकल पड़ा | (५) वह जहाँ-तहाँसे बहुत-सा धन चुराकर घर लौट आया तथा उन्हें कुछ सुंदर वस्त्र और आभूषण लाकर दिये | (६) चोरीका बहुत माल देखकर रात्रिके समय स्त्रियोंने विचार किया कि ‘ये नित्य ही चोरी करता है, इसलिये इसे किसी दिन अवश्य राजा पकड़ लेगा | (७) राजा यह सारा धन छीनकर इसे निश्च्रय ही प्राणदण्ड देगा | जब एक दिन इसे मरना ही है, तब हम ही धनकी रक्षाके लिए गुप्तरूपसे इसको क्यों न मार डालें | (८) इसे मारकर हम इसका माल-मता लेकर जहाँ-कहीं चली जायँगी |’ एसा निश्च्रय कर उन्होंने सोये हुए धुन्धुकारीको रस्सियोंसे कस दिया और उसके गलेमें फाँसी लगाकर उसे मारनेका प्रयत्न किया | इससे जब वह जल्दी न मरा, तो उन्हें बड़ी चिन्ता हुई | (९-१०) तब उन्होंने उसके मुखपर बहुत-से दहकते अँगारे डाले; इससे वह अग्निकी लपटोंसे बहुत छटपटाकर मर गया | (११) उन्होंने उसके शरीरको एक गड्डेमें डालकर गाड़ दिया | सच है, स्त्रियाँ प्रायः बड़ी दु:साहसी होती हैं | उनके इस कृत्यका किसीको भी पता न चला | (१२) लोगोंके पूछनेपर वह कह देती थीं कि ‘हमारे प्रियतम पैसे के लोभसे अबकी बार कहीं दूर चले गये हैं, इसी वर्षके अंदर लौट आयेंगे |’ (१३) बुद्धिमान् पुरुषको दुष्टा स्त्रियोंका कभी विश्वास न करना चाहिये | जो मुर्ख इनका विश्वास करता है, उसे दुखी होना पड़ता है | (१४) इनकी वाणी तो अमृतके समान कामियोंके ह्रदयमें रसका संचार करती है; किन्तु ह्रदय छूरेकी धारके समान तीक्ष्ण होता है | भला, इन स्त्रियोंका कौन प्यारा है ? (१५)
वे कुलटाएँ धुन्धुकारीकी सारी सम्पत्ति समेटकर वहाँसे चंपत हो गयीं; उनके ऐसे न जाने कितने पति थे | और धुन्धुकारी अपने कुकर्मोंके कारण भयंकर प्रेत हुआ | (१६) वह बवंडरके रूपमें सर्वदा दासों दिशाओंमें भटकता रहता था तथा शीत-धामसे सन्तप्त और भूख-प्याससे व्याकुल होनेके कारण ‘हा दैव! हा दैव!’ चिल्लाता रहता था | परन्तु उसे कहीं भी कोई आश्रय न मिला | कुछ काल बीतनेपर गोकर्णने भी लोगोंके मुखसे धुन्धुकारीकी मृत्युका समाचार सुना | (१७-१८) तब उसे अनाथ समझकर उन्होंने उसका गयाजीमें श्राद्ध किया; और भी जहाँ-जहाँ वे जाते थे, उसका श्राद्ध अवश्य करते थे | (१९)
इस प्रकार घूमते-घूमते गोकर्णजी अपने नगरमें आये और रात्रिके समय दूसरोंकी दृष्टिसे बचकर सीधे अपने घरके आँगनमें सोनेके लिए पहुँचे | (२०) वहाँ अपने भाईको सोया देख आधी रातके समय धुन्धुकारीने अपना बड़ा विकट रूप दिखाया | (२१) वह कभी भेड़ा, कभी हाथी, कभी भैंसा, कभी इन्द्र और कभी अग्निका रूप धारण करता | अन्तमें वह मनुष्यके आकारमें प्रकट हुआ | (२२) ये विपरीत अवस्थाएँ देखकर गोकर्णने निश्च्रय किया कि यह कोई दुर्गतिको प्राप्त हुआ जीव है | तब उन्होंने उससे धैर्यपूर्वक पूछा | (२३)
गोकर्णने कहा – तू कौन है ? रात्रिके समय ऐसे भयानक रूप क्यों दिखा रहा है ? तेरी यह दशा कैसे हुई ? हमें बता तो सही – तू प्रेत है, पिशाच है अथवा कोई राक्षस है ? (२४)
सूतजी कहते हैं – गोकर्णके इस प्रकार पूछनेपर वह बार-बार जोर-जोरसे रोने लगा | उसमें बोलनेकी शक्ति नहीं थी, इसलिए उसने केवल संकेतमात्र किया | (२५) तब गोकर्णने अंजलिमें जल लेकर उसे अभिमन्त्रित करके उसपर छिड़का | इससे उसके पापोंका कुछ शमन हुआ और वह इस प्रकार कहने लगा | (२६)
प्रेत बोला – ‘मैं तुम्हारा भाई हूँ | मेरा नाम है धुन्धुकारी | मैंने अपने ही दोषसे अपना ब्राह्मणत्व नष्ट कर दिया | (२७) मेरे कुकर्मोंकी गिनती नहीं की जा सकती | मैं तो महान् अज्ञानमें चक्कर काट रहा था | इसीसे मैंने लोगोंकी बड़ी हिंसा की | अन्तमें कुलटा स्त्रियोंने मुझे तड़पा-तड़पाकर मार डाला | (२८) इसीसे अब प्रेत-योनिमें पड़कर यह दुर्दशा भोग रहा हूँ | अब दैववश कर्मफलका उदय होनेसे मैं केवल वायुभक्षण करके जी रहा हूँ | (२९) भाई! तुम दयाके समुद्र हो; अब किसी प्रकार जल्दी ही मुझे इस योनीसे छुड़ाओ |’ गोकर्णने धुन्धुकारीकी सारी बातें सुनीं और तब उससे बोले | (३०)
गोकर्णने कहा – भाई! मुझे इस बातका बड़ा आश्चर्य है – मैंने तुम्हारे लिए विधिपूर्वक गयाजीमें पिण्डदान किया, फिर भी तुम प्रेतयोनिसे मुक्त कैसे नहीं हुए ? (३१) यदि गया-श्राद्धसे भी तुम्हारी मुक्ति नहीं हुई, तब इसका और कोई उपाय ही नहीं है | अच्छा, तुम सब बात खोलकर कहो – मुझे अब क्या करना चाहिये ? (३२)
प्रेतने कहा – मेरी मुक्ति सैकड़ों गया-श्राद्ध करनेसे भी नहीं हो सकती | अब तो तुम इसका कोई और उपाय सोचो | (३३)
प्रेतकी यह बात सुनकर गोकर्णको बड़ा आश्चर्य हुआ | वे कहने लगे – ‘यदि सैकड़ों गया-श्राद्धोंसे भी तुम्हारी मुक्ति नहीं हो सकती, तब तो तुम्हारी मुक्ति असम्भव ही है | (३४) अच्छा, अभी तो तुम निर्भय होकर अपने स्थान पर रहो; मैं विचार करके तुम्हारी मुक्तिके लिये कोई दूसरा उपाय करूँगा |’ (३५)
गोकर्णकी आज्ञा पाकर धुन्धुकारी वहाँसे अपने स्थानपर चला आया | इधर गोकर्णने रातभर विचार किया, तब भी उन्हें कोई उपाय नहीं सूझा | (३६) प्रातःकाल उनको आया देख लोग प्रेमसे उनसे मिलने आये | तब गोकर्णने रातमें जो कुछ जिस प्रकार हुआ था, वह सब उन्हें सुना दिया | (३७) उनमें जो लोग विद्वान्, योगनिष्ठ, ज्ञानी और वेदज्ञ थे, उन्होंने भी अनेकों शास्त्रोंको उलट-पलटकर देखा; तो भी उसकी मुक्तिका कोई उपाय न मिला | (३८) तब सबने यही निश्च्रय किया कि इस विषयमें सूर्यनारायण जो आज्ञा करें, वही करना चाहिये | अतः गोकर्णने अपने तपोबलसे सूर्यकी गतिको रोक दिया | (३९) उन्होंने स्तुति की – ‘भगवन्! आप सारे संसारके साक्षी हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ | आप मुझे कृपा करके धुन्धुकारीकी मुक्तिका साधन बताइये |’ गोकर्णकी यह प्रार्थना सुनकर सूर्यदेवने दूरसे ही स्पष्ट शब्दोंमें कहा – ‘श्रीमद्भागवतसे मुक्ति हो सकती है, इसलिए तुम उसका सप्ताह-परायण करो |’ सूर्यका यह धर्ममय वचन वहाँ सभीने सुना | (४०-४१) तब सबने यही कहा कि ‘प्रयत्नपूर्वक यही करो, है भी यह साधन बहुत सारल |’ अतः गोकर्णजी भी तदनुसार निश्च्रय करके कथा सुनानेके लिए तैयार हो गये | (४२)
देश और गाँवोंसे अनेकों लोग कथा सुननेके लिये आये | बहुत-से लँगड़े-लूले, अंधे, बूढ़े और मन्दबुद्धि पुरुष भी अपने पापोंकी निवृत्तिके उद्देश्यसे वहाँ आ पहुँचे | (४३) इस प्रकार वहाँ इतनी भीड़ हो गयी कि उसे देखकर देवताओंको भी आश्चर्य होता था | जब गोकर्णजी व्यासगद्दीपर बैठकर कथा कहने लगे, तब वह प्रेत भी वहाँ आ पहुँचा और इधर-उधर बैठनेके लिये स्थान ढूँढने लगा | इतनेमें ही उसकी दृष्टि एक सीधे रखे हुए सात गाँठके बाँसपर पड़ी | (४४-४५) उसीके नीचेके छिद्रमें घुसकर वह कथा सुननेके लिये बैठ गया | वायुरूप होनेके कारण वह बाहर कहीं बैठ नहीं सकता था, इसलिये बाँसमें घुस गया | (४६)
गोकर्णजीने एक वैष्णव ब्राह्मणको मुख्य श्रोता बनाया और प्रथमस्कन्धसे ही स्पष्ट स्वरमें कथा सुनानी आरम्भ कर दी | (४७) सायंकालमें जब कथाको विश्राम दिया, तब एक बड़ी विचित्र बात हुई | वहाँ सभासदोंके देखते-देखते उस बाँसकी एक गाँठ तड़-तड़ शब्द करती फट गयी | (४८) इसी प्रकार दूसरे दिन सायंकालमें दूसरी गाँठ फटी और तीसरे दिन उसी समय तीसरी | (४९) इस प्रकार सात दिनोंमें सातों गाठोंको फोड़कर धुन्धुकारी बारहों स्कन्धोंके सुनने से पवित्र होकर प्रेतयोनिसे मुक्त हो गया और दिव्यरूप धारण करके सबके सामने प्रकट हुआ | उसका मेघके समान श्याम शरीर पीताम्बर और तुलसीकी मालाओंसे सुशोभित था तथा सरपर मनोहर मुकुट और कानोंमें कमनीय कुंडल झिलमिला रहे थे | (५०-५१) उसने तुरंत अपने भाई गोकर्ण को प्रणाम करके कहा – ‘भाई! तुमने कृपा करके मुझे प्रेतयोनिकी यातनाओंसे मुक्त कर दिया | (५२) यह प्रेतपीड़ाका नाश करनेवाली श्रीमद्भागवतकी कथा धन्य है तथा श्रीकृष्णचन्द्रके धामकी प्राप्ति करानेवाला इसका सप्ताह-परायण भी धन्य है! | (५३) जब सप्ताह-श्रवणका योग लगता है, तब सब पाप थर्रा उठते हैं कि अब यह भागवतकी कथा जल्दी ही हमारा अन्त कर देगी | (५४) जिस प्रकार आग गीली-सूखी, छोटी-बड़ी – सब तरह की लकड़ियोंको जला डालती है, उसी प्रकार यह सप्ताह-श्रवण मन, वचन और कर्मद्वारा किये हुए नये-पुराने, छोटे-बड़े – सभी प्रकारके पापोंको भस्म कर देता है | (५५)
विद्वानोंने देवताओंकी सभामें कहा है कि जो लोग इस भारतवर्षमें श्रीमद्भागवतकी कथा नहीं सुनते, उनका जन्म वृथा ही है | (५६) भला, मोहपूर्वक लालन-पालन करके यदि इस अनित्य शरीरको हष्ट-पुष्ट और बलवान् भी बना लिया तो भी श्रीमद्भागवतकी कथा सुने बिना इससे क्या लाभ हुआ ? (५७) अस्थियाँ ही इस शरीरके आधारस्तम्भ हैं, नस-नाडीरूप रस्सियोंसे यह बँधा हुआ है, ऊपरसे इसपर मांस और रक्त थोपकर इसे चर्मसे मँढ़ दिया गया है | इसके प्रत्येक अंगमें दुर्गन्ध आती है; क्योंकि है तो यह मल-मूत्रका भाण्ड ही | (५८) वृद्धावस्था और शोकके कारण यह परिणाममें दुःखमय ही है, रोगोंका तो घर ही ठहरा | यह निरन्तर किसी-न-किसी कामनासे पीड़ित रहता है, कभी इसकी तृप्ति नहीं होती | इसे धारण किये रहना भी एक भार ही है; इसके रोम-रोममें दोष भरे हुए हैं और नष्ट होनेमें इसे एक क्षण भी नहीं लगता | (५९) अन्तमें यदि इसे गाड़ दिया जाता है तो इसके कीड़े बन जाते हैं; कोई पशु खा जाता है तो यह विष्ठा हो जाता है और अग्निमें जला दिया जाता है तो भस्मकी ढेरी हो जाता है | ये तीन ही इसकी गतियाँ बतायी गयी हैं | ऐसे अस्थिर शरीरसे मनुष्य अविनाशी फल देनेवाला काम क्यों नहीं बना लेता ? (६०) जो अन्न प्रातःकाल पकाया जाता है, वह सायंकालतक बिगड़ जाता है; फिर उसीके रससे पुष्ट हुए शरीरकी नित्यता कैसी | (६१)
इस लोकमें सप्ताहश्रवण करनेसे भगवान् की शीघ्र ही प्राप्ति हो सकती है | अतः सब प्रकारके दोषोंकी निवृत्तिके लिये एकमात्र यही साधन है | (६२) जो लोग भागवतकी कथासे वंचित हैं, वे तो जलमें बुद्बुदे और जीवोंमें मच्छरोंके समान केवल मरनेके लिए ही पैदा होते हैं | (६३) भला, जिसके प्रभावसे जड़ और सूखे हुए बाँसकी गाँठे फट सकती हैं, उस भागवतकथाका श्रवण करनेसे चितकी गाँठोंका खुल जाना कौन बड़ी बात है | (६४) सप्ताह-श्रवण करनेसे मनुष्यके ह्रदयकी गाँठ खुल जाती है, उसके समस्त संशय छिन्न-भिन्न हो जाते हैं और सारे कर्म क्षीण हो जाते हैं | (६५) यह भागवतकथारूप तीर्थ संसारके कीचड़को धोनेमें बड़ा ही पटु है | विद्वानोंका कथन है कि जब यह ह्रदयमें स्थित हो जाता है, तब मनुष्य की मुक्ति निश्च्रित ही समझनी चाहिये |’ (६६)
जिस समय धुन्धुकारी ये सब बातें कह रहा था, जिसके लिये वैकुण्ठवासी पार्षदोंके सहित एक विमान उतरा; उससे सब ओर मण्डलाकार प्रकाश फैल रहा था | (६७) सब लोगोंके सामने ही धुन्धुकारी उस विमानपर चढ़ गया | तब उस विमानपर आये हुए पार्षदोंको देखकर उनसे गोकर्णने यह बात कही | (६८)
गोकर्णने पूछा – भगवान् के प्रिय पार्षदो! यहाँ तो हमारे अनेकों शुद्धह्रदय श्रोतागण हैं, उन सबके लिये आपलोग एक साथ बहुत-से विमान क्यों नहीं लाये ? हम देखते हैं की यहाँ सभीने समानरूपसे कथा सुनी है, फिर फलमें इस प्रकारका भेद क्यों हुआ, यह बताइये | (६९-७०)
भगवान् के सेवकोंने कहा – हे मानद! इस फलभेदका कारण इनके श्रवणका भेद ही है | यह ठीक है की श्रवण तो सबने सामानरूपसे ही किया है, किन्तु इसके-जैसा मनन नहीं किया | इसीके साथ भजन करनेपर भी उसके फलमें भेद रहा | (७१) इस प्रेतने सात दिनोंतक निराहार रहकर श्रवण किया था, तथा सुने हुए विषयका स्थिरचितसे यह खूब मनन-निदिध्यासन भी करता रहता था | (७२) जो ज्ञान दृढ़ नहीं होता, वह व्यर्थ हो जाता है | इसी प्रकार ध्यान न देनेसे श्रवणका, संदेहसे मन्त्रका और चित्त के इधर-उधर भटकते रहनेसे जपका भी कोई फल नहीं होता | (७३) वैष्णवहीन देश, अपात्रको कराया हुआ श्राद्धका भोजन, अश्रोत्रियको दिया हुआ दान एवं आचारहीन कुल – इन सबका नाश हो जाता है | (७४) गुरुवचनोंमें विश्वास, दीनताका भाव, मनके दोषोंपर विजय और कथामें चित्तकी एकाग्रता इत्यादि नियमोंका यदि पालन किया जाय तो श्रवणका यथार्थ फल मिलता है | यदि ये श्रोता फिरसे श्रीमद्भागवतकी कथा सुनें तो निश्चय ही सबको वैकुण्ठकी प्राप्ति होगी | (७५-७६) और गोकर्णजी! आपको तो भगवान् स्वयं आकर गोलोकधाममें ले जायँगे | यों कहकर वे सब पार्षद हरिकिर्तन करते वैकुण्ठलोकको चले गये | (७७)
श्रावण मासमें गोकर्णजीने फिर उसी प्रकार सप्ताहक्रमसे कथा कही और उन श्रोताओंने उसे फिर सुना | (७८) नारदजी! इस कथा की समाप्तिपर जो कुछ हुआ, वह सुनिये | (७९) वहाँ भक्तोंसे भरे हुए विमानोंके साथ भगवान् प्रकट हुए | सब ओरसे खूब जय-जयकार और नमस्कारकी ध्वनियाँ होने लगीं | (८०) भगवान् स्वयं हर्षित होकर अपने पाञ्चजन्य शङ्खकी ध्वनि करने लगे और उन्होंने गोकर्णको ह्रदयसे लगाकर अपने ही समान बना लिया | (८१) उन्होंने क्षणभरमें ही अन्य सब श्रोताओंको भी मेघके समान श्यामवर्ण, रेशमी पीताम्बरधारी तथा किरीट और कुण्डलादि से विभूषित कर दिया | (८२) उस गाँवमें कुत्ते और चाण्डालपर्यन्त जितने भी जीव थे, वे सभी गोकर्णजीकी कृपासे विमानोंपर चढ़ा लिये गये | (८३) तथा जहाँ योगीजन जाते हैं, उस भगवद्धाममें वे भेज दिए गये | इस प्रकार भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण कथाश्रवणसे प्रसन्न होकर गोकर्णजीको साथ ले अपने ग्वालबालोंके प्रिय गोलोकधाममें चले गये | (८४) पूर्वकालमें जैसे अयोध्यावासी भगवान् श्रीरामके साथ साकेतधाम सिधारे थे, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण उन सबको योगिदुर्लभ गोलोकधामको ले गये | (८५) जिस लोकमें सूर्य, चन्द्रमा और सिद्धोंकी भी कभी गति नहीं हो सकती, उसमें वे श्रीमद्भागवत श्रवण करनेसे चले गये | (८६)
नारदजी! सप्ताहयज्ञके द्वारा कथा-श्रवण करनेसे जैसा उज्जवल फल संचित होता है, उसके विषयमें हम आपसे क्या कहें ? अजी! जिन्होंने अपने कर्णपुटसे गोकर्णजीकी कथाके एक अक्षरका भी पान किया था, वे फिर माताके गर्भमें नहीं आये | (८७) जिस गतिको लोग वायु, जल या पत्ते खाकर शरीर सुखानेसे, बहुत कालतक घोर तपस्या करनेसे और योगाभ्याससे भी नहीं पा सकते, उसे वे सप्ताहश्रवणसे सहजमें ही प्राप्त कर लेते हैं | (८८) इस परम पवित्र इतिहासका पाठ चित्रकूटपर विराजमान मुनीश्वर शाण्डिल्य भी ब्रह्मानन्दमें मग्न होकर करते रहते हैं | (८९) यह कथा बड़ी ही पवित्र है | एक बारके श्रवणसे ही समस्त पाप-राशिको भस्म कर देती है | यदि इसका श्राद्धके समय पाठ किया जाय, तो इससे पितृगणको बड़ी तृप्ति होती है और नित्य पाठ करनेसे मोक्षकी प्राप्ति होती है | (९०)
*** जय श्रीहरि ***
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