बेटी तो दो कुलों को पवित्र करती है ...
जब सीता जी की विदा का समय आया तो सुनयना जी रोती जाती है और उपदेश करती जा रही थी,-
"सासु ससुर गुर सेवा करेहू,
पति रुख लखि आयसु अनुसरेहू,
अति सनेह बस सखी सयानीं ,
नारि धरम सिखावहिं मृदु बानी"
अर्थात - सास ससुर और गुरु की सेवा करना ,
पति रुख देखकर उनकी आज्ञा का पालन करना सयानी सखियाँ अत्यंत स्नेह के वश कोमल वाणी से स्त्रियों के धर्म सिखलाती है.
यहाँ एक बड़ी सुन्दर बात सुनयना जी ने कही -
"पति रुख आयसु अनुसरेहू"
अर्थात पति का रुख देखकर व्यवहार करना, जिस व्यवहार से पति प्रसन्न हो वही करना,और सीता जी ने इस बात को अंतिम समय तक गाँठ बांधकर रखा और निभाया.
जब सीता जी को दूसरी बार वनवास हुआ (एक बार श्री राम जी के साथ १४ वर्ष का और दूसरी बार श्री राम जी ने वनवास दिया) उस समय सीता जी ८ माह गर्भवती थी लव कुश गर्भ में थे.
जानकी जी भगवान से कह सकती थी प्रभु क्या मेरा सारा जीवन अग्नि परीक्षा में जायेगा,
आपने जिस व्यक्ति के मुख से ऐसा मेरे बारे में सुना आप उसे बुलाए, उसने ऐसा कैसे कह दिया.
प्रभु! मुझे मालूम है राजा बनते समय आपने शपथ ली थी - प्रजा की प्रसन्नता के लिए यदि मुझे जानकी को त्यागना पड़े तो त्याग दूँगा.
पर सीता जी कह सकती थी आपका तेज मेरे गर्भ में है, आठ मास हो चुके है केवल एक मास ही शेष है, उन्हें आपके चरणों में अर्पण कर मै चलि जाऊँगी, ऐसे में तो कोई मजदूर भी अपनी पत्नी को घर से नहीं निकालता.
पर जानकी जी एक शब्द भी नहीं बोली, माँ की बात याद आ गई, आज पति का रुख मेरे विपरीत हो गया है, यदि मुझे वनवास भी मिला तो क्या.!
वे मौन रही और रोई भी नहीं, प्रणाम करके चली गई.
दूसरी बात सुनयनाजी ने कही - बेटी जानकी ! गृहस्थ धर्म की गंगा में अनेक सुख दुःख के क्षण आयेगे, पर जैसे गंगा में अनेक नदी नाले मिलते है पर गंगा कभी मैली नहीं होती, इसी प्रकार अवसर आने पर भूखे रह लेना,फटे पुराने वस्त्रपहन लेना पर परिवार के रोने को लेकर किसी पडोस में नहीं जाना.
अवधपुर और जनकपुर दो कुलों की लाज मै तेरे पल्ले से बाँध रही हूँ, कोई भी कदम उठने से पहले, सोच लेना, अपने बाबू जी की याद कर लेना, मेरे पिता सुनेगे तो क्या कहेगे?
और सुनयना जी की इस बात को भी जानकी जी ने बहुत अच्छे से निभाया.
जब श्री राम जी और सीता जी वनवास के समय चित्रकूट में थे उस समय जनकजी रानी सहित चित्रकूट में गए -
"तापस बेष जनक सिय देखी भयउ प्रेमु परितोषु बिसेषी,
पुत्रि पबित्र किये कुल दोऊ
सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ,"
अर्थात - सीता जो को तपस्विनी वेष में देखकर जनकजी को विशेष प्रेम और संतोष हुआ,उन्होंने कहा - बेटी ! तूने दोनों कुल पवित्र कर दिए, तेरे निर्मल यश से सारा जगत उज्जवल हो रहा है.
ऐसा सब कोई कहते है.
"जिति सुरसरि किरति सरि तोरी,
गवनु कीन्ह बिधि अंड करोरी
गंग अवनि थल तीनि बड़ेरे,
एहिं किए साधु समाज धनेरे"
अर्थात - तेरी कीर्ति रूपी नदी देव नदीगंगा को भी जीतकर (जो एक ही ब्रह्माण्ड में बहती है )करोडो ब्रह्मांडो में बह चली है गंगा जी ने तो पृथ्वी पर तीन ही स्थानों (हरिद्वार , प्रयागराज और गंगासागर)को बड़ा बनाया है पर तेरी इस कीर्ति रूपी नदी ने तो अनेको संत समाज रूपी तीर्थ स्थान बना दिए है...
जब सीता जी की विदा का समय आया तो सुनयना जी रोती जाती है और उपदेश करती जा रही थी,-
"सासु ससुर गुर सेवा करेहू,
पति रुख लखि आयसु अनुसरेहू,
अति सनेह बस सखी सयानीं ,
नारि धरम सिखावहिं मृदु बानी"
अर्थात - सास ससुर और गुरु की सेवा करना ,
पति रुख देखकर उनकी आज्ञा का पालन करना सयानी सखियाँ अत्यंत स्नेह के वश कोमल वाणी से स्त्रियों के धर्म सिखलाती है.
यहाँ एक बड़ी सुन्दर बात सुनयना जी ने कही -
"पति रुख आयसु अनुसरेहू"
अर्थात पति का रुख देखकर व्यवहार करना, जिस व्यवहार से पति प्रसन्न हो वही करना,और सीता जी ने इस बात को अंतिम समय तक गाँठ बांधकर रखा और निभाया.
जब सीता जी को दूसरी बार वनवास हुआ (एक बार श्री राम जी के साथ १४ वर्ष का और दूसरी बार श्री राम जी ने वनवास दिया) उस समय सीता जी ८ माह गर्भवती थी लव कुश गर्भ में थे.
जानकी जी भगवान से कह सकती थी प्रभु क्या मेरा सारा जीवन अग्नि परीक्षा में जायेगा,
आपने जिस व्यक्ति के मुख से ऐसा मेरे बारे में सुना आप उसे बुलाए, उसने ऐसा कैसे कह दिया.
प्रभु! मुझे मालूम है राजा बनते समय आपने शपथ ली थी - प्रजा की प्रसन्नता के लिए यदि मुझे जानकी को त्यागना पड़े तो त्याग दूँगा.
पर सीता जी कह सकती थी आपका तेज मेरे गर्भ में है, आठ मास हो चुके है केवल एक मास ही शेष है, उन्हें आपके चरणों में अर्पण कर मै चलि जाऊँगी, ऐसे में तो कोई मजदूर भी अपनी पत्नी को घर से नहीं निकालता.
पर जानकी जी एक शब्द भी नहीं बोली, माँ की बात याद आ गई, आज पति का रुख मेरे विपरीत हो गया है, यदि मुझे वनवास भी मिला तो क्या.!
वे मौन रही और रोई भी नहीं, प्रणाम करके चली गई.
दूसरी बात सुनयनाजी ने कही - बेटी जानकी ! गृहस्थ धर्म की गंगा में अनेक सुख दुःख के क्षण आयेगे, पर जैसे गंगा में अनेक नदी नाले मिलते है पर गंगा कभी मैली नहीं होती, इसी प्रकार अवसर आने पर भूखे रह लेना,फटे पुराने वस्त्रपहन लेना पर परिवार के रोने को लेकर किसी पडोस में नहीं जाना.
अवधपुर और जनकपुर दो कुलों की लाज मै तेरे पल्ले से बाँध रही हूँ, कोई भी कदम उठने से पहले, सोच लेना, अपने बाबू जी की याद कर लेना, मेरे पिता सुनेगे तो क्या कहेगे?
और सुनयना जी की इस बात को भी जानकी जी ने बहुत अच्छे से निभाया.
जब श्री राम जी और सीता जी वनवास के समय चित्रकूट में थे उस समय जनकजी रानी सहित चित्रकूट में गए -
"तापस बेष जनक सिय देखी भयउ प्रेमु परितोषु बिसेषी,
पुत्रि पबित्र किये कुल दोऊ
सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ,"
अर्थात - सीता जो को तपस्विनी वेष में देखकर जनकजी को विशेष प्रेम और संतोष हुआ,उन्होंने कहा - बेटी ! तूने दोनों कुल पवित्र कर दिए, तेरे निर्मल यश से सारा जगत उज्जवल हो रहा है.
ऐसा सब कोई कहते है.
"जिति सुरसरि किरति सरि तोरी,
गवनु कीन्ह बिधि अंड करोरी
गंग अवनि थल तीनि बड़ेरे,
एहिं किए साधु समाज धनेरे"
अर्थात - तेरी कीर्ति रूपी नदी देव नदीगंगा को भी जीतकर (जो एक ही ब्रह्माण्ड में बहती है )करोडो ब्रह्मांडो में बह चली है गंगा जी ने तो पृथ्वी पर तीन ही स्थानों (हरिद्वार , प्रयागराज और गंगासागर)को बड़ा बनाया है पर तेरी इस कीर्ति रूपी नदी ने तो अनेको संत समाज रूपी तीर्थ स्थान बना दिए है...