Thursday, August 15, 2013

श्रीमद्भागवतमहात्म्य पाँचवाँ अध्याय धुन्धुकारीको प्रेतयोनिकी प्राप्ति और उससे उद्धार

|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||
|| श्री हरी ||
श्रीमद्भागवतमहात्म्य
पाँचवाँ अध्याय
धुन्धुकारीको प्रेतयोनिकी प्राप्ति और उससे उद्धार

सूतजी कहते हैं - शौनकजी! पिताके वन चले जानेपर एक दिन धुन्धुकारीने अपनी माताको बहुत पीटा और कहा – ‘बता, धन कहाँ रखा है ? नहीं तो अभी तेरी लुआठी (जलती लकड़ी) से खबर लूँगा |’ (१) उसकी इस धमकीसे डरकर और पुत्रके उपद्रवोंसे दुखी होकर वह रात्रीके समय कुएँमें जा गिरी और इसीसे उसकी मृत्यु हो गयी | (२) योगनिष्ठ गोकर्णजी तीर्थयात्राके लिये निकल गये | उन्हें इन घटनाओंसे कोई सुख या दुःख नहीं होता था; क्योंकि उनका न कोई मित्र था न शत्रु | (३)
धुन्धुकारी पाँच वेश्याओंके साथ घरमें रहने लगा | उनके लिए भोग-सामग्री जुटानेकी चिन्ताने उसकी बुद्धि नष्ट कर दी और वह नाना प्रकारके अत्यंत क्रूर कर्म करने लगा | (४) एक दिन उन कुलटाओंने उससे बहुत-से गहने माँगे | वह तो कामसे अँधा हो रहा था, मौतकी उसे कभी याद नहीं आती थी | बस, उन्हें जुटानेके लिए वह घरसे निकल पड़ा | (५) वह जहाँ-तहाँसे बहुत-सा धन चुराकर घर लौट आया तथा उन्हें कुछ सुंदर वस्त्र और आभूषण लाकर दिये | (६) चोरीका बहुत माल देखकर रात्रिके समय स्त्रियोंने विचार किया कि ‘ये नित्य ही चोरी करता है, इसलिये इसे किसी दिन अवश्य राजा पकड़ लेगा | (७) राजा यह सारा धन छीनकर इसे निश्च्रय ही प्राणदण्ड देगा | जब एक दिन इसे मरना ही है, तब हम ही धनकी रक्षाके लिए गुप्तरूपसे इसको क्यों न मार डालें | (८) इसे मारकर हम इसका माल-मता लेकर जहाँ-कहीं चली जायँगी |’ एसा निश्च्रय कर उन्होंने सोये हुए धुन्धुकारीको रस्सियोंसे कस दिया और उसके गलेमें फाँसी लगाकर उसे मारनेका प्रयत्न किया | इससे जब वह जल्दी न मरा, तो उन्हें बड़ी चिन्ता हुई | (९-१०) तब उन्होंने उसके मुखपर बहुत-से दहकते अँगारे डाले; इससे वह अग्निकी लपटोंसे बहुत छटपटाकर मर गया | (११) उन्होंने उसके शरीरको एक गड्डेमें डालकर गाड़ दिया | सच है, स्त्रियाँ प्रायः बड़ी दु:साहसी होती हैं | उनके इस कृत्यका किसीको भी पता न चला | (१२) लोगोंके पूछनेपर वह कह देती थीं कि ‘हमारे प्रियतम पैसे के लोभसे अबकी बार कहीं दूर चले गये हैं, इसी वर्षके अंदर लौट आयेंगे |’ (१३) बुद्धिमान् पुरुषको दुष्टा स्त्रियोंका कभी विश्वास न करना चाहिये | जो मुर्ख इनका विश्वास करता है, उसे दुखी होना पड़ता है | (१४) इनकी वाणी तो अमृतके समान कामियोंके ह्रदयमें रसका संचार करती है; किन्तु ह्रदय छूरेकी धारके समान तीक्ष्ण होता है | भला, इन स्त्रियोंका कौन प्यारा है ? (१५)
वे कुलटाएँ धुन्धुकारीकी सारी सम्पत्ति समेटकर वहाँसे चंपत हो गयीं; उनके ऐसे न जाने कितने पति थे | और धुन्धुकारी अपने कुकर्मोंके कारण भयंकर प्रेत हुआ | (१६) वह बवंडरके रूपमें सर्वदा दासों दिशाओंमें भटकता रहता था तथा शीत-धामसे सन्तप्त और भूख-प्याससे व्याकुल होनेके कारण ‘हा दैव! हा दैव!’ चिल्लाता रहता था | परन्तु उसे कहीं भी कोई आश्रय न मिला | कुछ काल बीतनेपर गोकर्णने भी लोगोंके मुखसे धुन्धुकारीकी मृत्युका समाचार सुना | (१७-१८) तब उसे अनाथ समझकर उन्होंने उसका गयाजीमें श्राद्ध किया; और भी जहाँ-जहाँ वे जाते थे, उसका श्राद्ध अवश्य करते थे | (१९)
इस प्रकार घूमते-घूमते गोकर्णजी अपने नगरमें आये और रात्रिके समय दूसरोंकी दृष्टिसे बचकर सीधे अपने घरके आँगनमें सोनेके लिए पहुँचे | (२०) वहाँ अपने भाईको सोया देख आधी रातके समय धुन्धुकारीने अपना बड़ा विकट रूप दिखाया | (२१) वह कभी भेड़ा, कभी हाथी, कभी भैंसा, कभी इन्द्र और कभी अग्निका रूप धारण करता | अन्तमें वह मनुष्यके आकारमें प्रकट हुआ | (२२) ये विपरीत अवस्थाएँ देखकर गोकर्णने निश्च्रय किया कि यह कोई दुर्गतिको प्राप्त हुआ जीव है | तब उन्होंने उससे धैर्यपूर्वक पूछा | (२३)
गोकर्णने कहा – तू कौन है ? रात्रिके समय ऐसे भयानक रूप क्यों दिखा रहा है ? तेरी यह दशा कैसे हुई ? हमें बता तो सही – तू प्रेत है, पिशाच है अथवा कोई राक्षस है ? (२४)
सूतजी कहते हैं – गोकर्णके इस प्रकार पूछनेपर वह बार-बार जोर-जोरसे रोने लगा | उसमें बोलनेकी शक्ति नहीं थी, इसलिए उसने केवल संकेतमात्र किया | (२५) तब गोकर्णने अंजलिमें जल लेकर उसे अभिमन्त्रित करके उसपर छिड़का | इससे उसके पापोंका कुछ शमन हुआ और वह इस प्रकार कहने लगा | (२६)
प्रेत बोला – ‘मैं तुम्हारा भाई हूँ | मेरा नाम है धुन्धुकारी | मैंने अपने ही दोषसे अपना ब्राह्मणत्व नष्ट कर दिया | (२७) मेरे कुकर्मोंकी गिनती नहीं की जा सकती | मैं तो महान् अज्ञानमें चक्कर काट रहा था | इसीसे मैंने लोगोंकी बड़ी हिंसा की | अन्तमें कुलटा स्त्रियोंने मुझे तड़पा-तड़पाकर मार डाला | (२८) इसीसे अब प्रेत-योनिमें पड़कर यह दुर्दशा भोग रहा हूँ | अब दैववश कर्मफलका उदय होनेसे मैं केवल वायुभक्षण करके जी रहा हूँ | (२९) भाई! तुम दयाके समुद्र हो; अब किसी प्रकार जल्दी ही मुझे इस योनीसे छुड़ाओ |’ गोकर्णने धुन्धुकारीकी सारी बातें सुनीं और तब उससे बोले | (३०)
गोकर्णने कहा – भाई! मुझे इस बातका बड़ा आश्चर्य है – मैंने तुम्हारे लिए विधिपूर्वक गयाजीमें पिण्डदान किया, फिर भी तुम प्रेतयोनिसे मुक्त कैसे नहीं हुए ? (३१) यदि गया-श्राद्धसे भी तुम्हारी मुक्ति नहीं हुई, तब इसका और कोई उपाय ही नहीं है | अच्छा, तुम सब बात खोलकर कहो – मुझे अब क्या करना चाहिये ? (३२)
प्रेतने कहा – मेरी मुक्ति सैकड़ों गया-श्राद्ध करनेसे भी नहीं हो सकती | अब तो तुम इसका कोई और उपाय सोचो | (३३)
प्रेतकी यह बात सुनकर गोकर्णको बड़ा आश्चर्य हुआ | वे कहने लगे – ‘यदि सैकड़ों गया-श्राद्धोंसे भी तुम्हारी मुक्ति नहीं हो सकती, तब तो तुम्हारी मुक्ति असम्भव ही है | (३४) अच्छा, अभी तो तुम निर्भय होकर अपने स्थान पर रहो; मैं विचार करके तुम्हारी मुक्तिके लिये कोई दूसरा उपाय करूँगा |’ (३५)
गोकर्णकी आज्ञा पाकर धुन्धुकारी वहाँसे अपने स्थानपर चला आया | इधर गोकर्णने रातभर विचार किया, तब भी उन्हें कोई उपाय नहीं सूझा | (३६) प्रातःकाल उनको आया देख लोग प्रेमसे उनसे मिलने आये | तब गोकर्णने रातमें जो कुछ जिस प्रकार हुआ था, वह सब उन्हें सुना दिया | (३७) उनमें जो लोग विद्वान्, योगनिष्ठ, ज्ञानी और वेदज्ञ थे, उन्होंने भी अनेकों शास्त्रोंको उलट-पलटकर देखा; तो भी उसकी मुक्तिका कोई उपाय न मिला | (३८) तब सबने यही निश्च्रय किया कि इस विषयमें सूर्यनारायण जो आज्ञा करें, वही करना चाहिये | अतः गोकर्णने अपने तपोबलसे सूर्यकी गतिको रोक दिया | (३९) उन्होंने स्तुति की – ‘भगवन्! आप सारे संसारके साक्षी हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ | आप मुझे कृपा करके धुन्धुकारीकी मुक्तिका साधन बताइये |’ गोकर्णकी यह प्रार्थना सुनकर सूर्यदेवने दूरसे ही स्पष्ट शब्दोंमें कहा – ‘श्रीमद्भागवतसे मुक्ति हो सकती है, इसलिए तुम उसका सप्ताह-परायण करो |’ सूर्यका यह धर्ममय वचन वहाँ सभीने सुना | (४०-४१) तब सबने यही कहा कि ‘प्रयत्नपूर्वक यही करो, है भी यह साधन बहुत सारल |’ अतः गोकर्णजी भी तदनुसार निश्च्रय करके कथा सुनानेके लिए तैयार हो गये | (४२)
देश और गाँवोंसे अनेकों लोग कथा सुननेके लिये आये | बहुत-से लँगड़े-लूले, अंधे, बूढ़े और मन्दबुद्धि पुरुष भी अपने पापोंकी निवृत्तिके उद्देश्यसे वहाँ आ पहुँचे | (४३) इस प्रकार वहाँ इतनी भीड़ हो गयी कि उसे देखकर देवताओंको भी आश्चर्य होता था | जब गोकर्णजी व्यासगद्दीपर बैठकर कथा कहने लगे, तब वह प्रेत भी वहाँ आ पहुँचा और इधर-उधर बैठनेके लिये स्थान ढूँढने लगा | इतनेमें ही उसकी दृष्टि एक सीधे रखे हुए सात गाँठके बाँसपर पड़ी | (४४-४५) उसीके नीचेके छिद्रमें घुसकर वह कथा सुननेके लिये बैठ गया | वायुरूप होनेके कारण वह बाहर कहीं बैठ नहीं सकता था, इसलिये बाँसमें घुस गया | (४६)
गोकर्णजीने एक वैष्णव ब्राह्मणको मुख्य श्रोता बनाया और प्रथमस्कन्धसे ही स्पष्ट स्वरमें कथा सुनानी आरम्भ कर दी | (४७) सायंकालमें जब कथाको विश्राम दिया, तब एक बड़ी विचित्र बात हुई | वहाँ सभासदोंके देखते-देखते उस बाँसकी एक गाँठ तड़-तड़ शब्द करती फट गयी | (४८) इसी प्रकार दूसरे दिन सायंकालमें दूसरी गाँठ फटी और तीसरे दिन उसी समय तीसरी | (४९) इस प्रकार सात दिनोंमें सातों गाठोंको फोड़कर धुन्धुकारी बारहों स्कन्धोंके सुनने से पवित्र होकर प्रेतयोनिसे मुक्त हो गया और दिव्यरूप धारण करके सबके सामने प्रकट हुआ | उसका मेघके समान श्याम शरीर पीताम्बर और तुलसीकी मालाओंसे सुशोभित था तथा सरपर मनोहर मुकुट और कानोंमें कमनीय कुंडल झिलमिला रहे थे | (५०-५१) उसने तुरंत अपने भाई गोकर्ण को प्रणाम करके कहा – ‘भाई! तुमने कृपा करके मुझे प्रेतयोनिकी यातनाओंसे मुक्त कर दिया | (५२) यह प्रेतपीड़ाका नाश करनेवाली श्रीमद्भागवतकी कथा धन्य है तथा श्रीकृष्णचन्द्रके धामकी प्राप्ति करानेवाला इसका सप्ताह-परायण भी धन्य है! | (५३) जब सप्ताह-श्रवणका योग लगता है, तब सब पाप थर्रा उठते हैं कि अब यह भागवतकी कथा जल्दी ही हमारा अन्त कर देगी | (५४) जिस प्रकार आग गीली-सूखी, छोटी-बड़ी – सब तरह की लकड़ियोंको जला डालती है, उसी प्रकार यह सप्ताह-श्रवण मन, वचन और कर्मद्वारा किये हुए नये-पुराने, छोटे-बड़े – सभी प्रकारके पापोंको भस्म कर देता है | (५५)
विद्वानोंने देवताओंकी सभामें कहा है कि जो लोग इस भारतवर्षमें श्रीमद्भागवतकी कथा नहीं सुनते, उनका जन्म वृथा ही है | (५६) भला, मोहपूर्वक लालन-पालन करके यदि इस अनित्य शरीरको हष्ट-पुष्ट और बलवान् भी बना लिया तो भी श्रीमद्भागवतकी कथा सुने बिना इससे क्या लाभ हुआ ? (५७) अस्थियाँ ही इस शरीरके आधारस्तम्भ हैं, नस-नाडीरूप रस्सियोंसे यह बँधा हुआ है, ऊपरसे इसपर मांस और रक्त थोपकर इसे चर्मसे मँढ़ दिया गया है | इसके प्रत्येक अंगमें दुर्गन्ध आती है; क्योंकि है तो यह मल-मूत्रका भाण्ड ही | (५८) वृद्धावस्था और शोकके कारण यह परिणाममें दुःखमय ही है, रोगोंका तो घर ही ठहरा | यह निरन्तर किसी-न-किसी कामनासे पीड़ित रहता है, कभी इसकी तृप्ति नहीं होती | इसे धारण किये रहना भी एक भार ही है; इसके रोम-रोममें दोष भरे हुए हैं और नष्ट होनेमें इसे एक क्षण भी नहीं लगता | (५९) अन्तमें यदि इसे गाड़ दिया जाता है तो इसके कीड़े बन जाते हैं; कोई पशु खा जाता है तो यह विष्ठा हो जाता है और अग्निमें जला दिया जाता है तो भस्मकी ढेरी हो जाता है | ये तीन ही इसकी गतियाँ बतायी गयी हैं | ऐसे अस्थिर शरीरसे मनुष्य अविनाशी फल देनेवाला काम क्यों नहीं बना लेता ? (६०) जो अन्न प्रातःकाल पकाया जाता है, वह सायंकालतक बिगड़ जाता है; फिर उसीके रससे पुष्ट हुए शरीरकी नित्यता कैसी | (६१)
इस लोकमें सप्ताहश्रवण करनेसे भगवान् की शीघ्र ही प्राप्ति हो सकती है | अतः सब प्रकारके दोषोंकी निवृत्तिके लिये एकमात्र यही साधन है | (६२) जो लोग भागवतकी कथासे वंचित हैं, वे तो जलमें बुद्बुदे और जीवोंमें मच्छरोंके समान केवल मरनेके लिए ही पैदा होते हैं | (६३) भला, जिसके प्रभावसे जड़ और सूखे हुए बाँसकी गाँठे फट सकती हैं, उस भागवतकथाका श्रवण करनेसे चितकी गाँठोंका खुल जाना कौन बड़ी बात है | (६४) सप्ताह-श्रवण करनेसे मनुष्यके ह्रदयकी गाँठ खुल जाती है, उसके समस्त संशय छिन्न-भिन्न हो जाते हैं और सारे कर्म क्षीण हो जाते हैं | (६५) यह भागवतकथारूप तीर्थ संसारके कीचड़को धोनेमें बड़ा ही पटु है | विद्वानोंका कथन है कि जब यह ह्रदयमें स्थित हो जाता है, तब मनुष्य की मुक्ति निश्च्रित ही समझनी चाहिये |’ (६६)
जिस समय धुन्धुकारी ये सब बातें कह रहा था, जिसके लिये वैकुण्ठवासी पार्षदोंके सहित एक विमान उतरा; उससे सब ओर मण्डलाकार प्रकाश फैल रहा था | (६७) सब लोगोंके सामने ही धुन्धुकारी उस विमानपर चढ़ गया | तब उस विमानपर आये हुए पार्षदोंको देखकर उनसे गोकर्णने यह बात कही | (६८)
गोकर्णने पूछा – भगवान् के प्रिय पार्षदो! यहाँ तो हमारे अनेकों शुद्धह्रदय श्रोतागण हैं, उन सबके लिये आपलोग एक साथ बहुत-से विमान क्यों नहीं लाये ? हम देखते हैं की यहाँ सभीने समानरूपसे कथा सुनी है, फिर फलमें इस प्रकारका भेद क्यों हुआ, यह बताइये | (६९-७०)
भगवान् के सेवकोंने कहा – हे मानद! इस फलभेदका कारण इनके श्रवणका भेद ही है | यह ठीक है की श्रवण तो सबने सामानरूपसे ही किया है, किन्तु इसके-जैसा मनन नहीं किया | इसीके साथ भजन करनेपर भी उसके फलमें भेद रहा | (७१) इस प्रेतने सात दिनोंतक निराहार रहकर श्रवण किया था, तथा सुने हुए विषयका स्थिरचितसे यह खूब मनन-निदिध्यासन भी करता रहता था | (७२) जो ज्ञान दृढ़ नहीं होता, वह व्यर्थ हो जाता है | इसी प्रकार ध्यान न देनेसे श्रवणका, संदेहसे मन्त्रका और चित्त के इधर-उधर भटकते रहनेसे जपका भी कोई फल नहीं होता | (७३) वैष्णवहीन देश, अपात्रको कराया हुआ श्राद्धका भोजन, अश्रोत्रियको दिया हुआ दान एवं आचारहीन कुल – इन सबका नाश हो जाता है | (७४) गुरुवचनोंमें विश्वास, दीनताका भाव, मनके दोषोंपर विजय और कथामें चित्तकी एकाग्रता इत्यादि नियमोंका यदि पालन किया जाय तो श्रवणका यथार्थ फल मिलता है | यदि ये श्रोता फिरसे श्रीमद्भागवतकी कथा सुनें तो निश्चय ही सबको वैकुण्ठकी प्राप्ति होगी | (७५-७६) और गोकर्णजी! आपको तो भगवान् स्वयं आकर गोलोकधाममें ले जायँगे | यों कहकर वे सब पार्षद हरिकिर्तन करते वैकुण्ठलोकको चले गये | (७७)
श्रावण मासमें गोकर्णजीने फिर उसी प्रकार सप्ताहक्रमसे कथा कही और उन श्रोताओंने उसे फिर सुना | (७८) नारदजी! इस कथा की समाप्तिपर जो कुछ हुआ, वह सुनिये | (७९) वहाँ भक्तोंसे भरे हुए विमानोंके साथ भगवान् प्रकट हुए | सब ओरसे खूब जय-जयकार और नमस्कारकी ध्वनियाँ होने लगीं | (८०) भगवान् स्वयं हर्षित होकर अपने पाञ्चजन्य शङ्खकी ध्वनि करने लगे और उन्होंने गोकर्णको ह्रदयसे लगाकर अपने ही समान बना लिया | (८१) उन्होंने क्षणभरमें ही अन्य सब श्रोताओंको भी मेघके समान श्यामवर्ण, रेशमी पीताम्बरधारी तथा किरीट और कुण्डलादि से विभूषित कर दिया | (८२) उस गाँवमें कुत्ते और चाण्डालपर्यन्त जितने भी जीव थे, वे सभी गोकर्णजीकी कृपासे विमानोंपर चढ़ा लिये गये | (८३) तथा जहाँ योगीजन जाते हैं, उस भगवद्धाममें वे भेज दिए गये | इस प्रकार भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण कथाश्रवणसे प्रसन्न होकर गोकर्णजीको साथ ले अपने ग्वालबालोंके प्रिय गोलोकधाममें चले गये | (८४) पूर्वकालमें जैसे अयोध्यावासी भगवान् श्रीरामके साथ साकेतधाम सिधारे थे, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण उन सबको योगिदुर्लभ गोलोकधामको ले गये | (८५) जिस लोकमें सूर्य, चन्द्रमा और सिद्धोंकी भी कभी गति नहीं हो सकती, उसमें वे श्रीमद्भागवत श्रवण करनेसे चले गये | (८६)
नारदजी! सप्ताहयज्ञके द्वारा कथा-श्रवण करनेसे जैसा उज्जवल फल संचित होता है, उसके विषयमें हम आपसे क्या कहें ? अजी! जिन्होंने अपने कर्णपुटसे गोकर्णजीकी कथाके एक अक्षरका भी पान किया था, वे फिर माताके गर्भमें नहीं आये | (८७) जिस गतिको लोग वायु, जल या पत्ते खाकर शरीर सुखानेसे, बहुत कालतक घोर तपस्या करनेसे और योगाभ्याससे भी नहीं पा सकते, उसे वे सप्ताहश्रवणसे सहजमें ही प्राप्त कर लेते हैं | (८८) इस परम पवित्र इतिहासका पाठ चित्रकूटपर विराजमान मुनीश्वर शाण्डिल्य भी ब्रह्मानन्दमें मग्न होकर करते रहते हैं | (८९) यह कथा बड़ी ही पवित्र है | एक बारके श्रवणसे ही समस्त पाप-राशिको भस्म कर देती है | यदि इसका श्राद्धके समय पाठ किया जाय, तो इससे पितृगणको बड़ी तृप्ति होती है और नित्य पाठ करनेसे मोक्षकी प्राप्ति होती है | (९०)

*** जय श्रीहरि ***

श्रीमद्भागवतमहात्म्य छठा अध्याय सप्ताहयज्ञकी विधि

|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||
|| श्री हरी ||
श्रीमद्भागवतमहात्म्य
छठा अध्याय
सप्ताहयज्ञकी विधि

श्रीसनकादि कहते हैं – नारदजी! अब हम आपको सप्ताहश्रवणकी विधि बताते हैं | यह विधि प्रायः लोगोंकी सहायता और धनसे साध्य कही गयी है | (१) पहले तो यत्नपूर्वक ज्योतिषीको बुलाकर मुहूर्त पूछना चाहिये तथा विवाहके लिये जिस प्रकार धनका प्रबन्ध किया जाता है उस प्रकार ही धनकी व्यवस्था इसके लिये करनी चाहिए | (२) कथा आरम्भ करनेमें भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, आषाढ़ और श्रावण – ये छः महीने श्रोताओंके लिये मोक्षकी प्राप्तिके कारण हैं | (३) देवर्षे! इन महीनोंमें भी भद्रा-व्यतीपात आदि कुयोंगोंको सर्वथा त्याग देना चाहिये | तथा दुसरे लोग जो उत्साही हों, उन्हें अपना सहायक बना लेना चाहिये | (४) फिर प्रयत्न करके देश-देशान्तरोंमें यह संवाद भेजना चाहिये कि यहाँ कथा होगी, सब लोगोंको सपरिवार पधारना चाहिये | (५) स्त्री और शूद्रादी भगवत्कथा एवं संकीर्तनसे दूर पड़ गये हैं | उनको भी सूचना हो जाय, ऐसा प्रबन्ध करना चाहिए | (६) देश-देशमें जो विरक्त वैष्णव और हरिकीर्तनके प्रेमी हों, उनके पास निमन्त्रण अवश्य भेजे | उसे लिखनेकी विधि इस प्रकार बतायी गयी है | (७) ‘महानुभावो! यहाँ सात दिनतक सत्पुरुषों का बड़ा दुर्लभ समागम रहेगा और अपूर्व रसमयी श्रीमद्भागवतकी कथा होगी | (८) आपलोग भगवद्रसके रसिक हैं, अतः श्रीमद्भागवतामृतका पान करनेके लिए प्रेमपूर्वक शीघ्र ही पधारनेकी कृपा करें | (९) यदि आपको विशेष अवकाश न हो, तो भी एक दिनके लिए तो अवश्य ही कृपा करनी चाहिये; क्योंकि यहाँका तो एक क्षण भी अत्यन्त दुर्लभ है |’ (१०) इस प्रकार विनयपूर्वक उन्हें निमन्त्रित करे और जो लोग आयें, उनके लिए यथोचित निवासस्थानका प्रबन्ध करे | (११)
कथा का श्रवण किसी तीर्थमें, वनमें अथवा अपने घरपर भी अच्छा माना गया है | जहाँ लंबा-चौड़ा मैदान हो, वहीं कथास्थल रखना चाहिये | (१२) भूमिका शोधन, मार्जन और लेपन करके रंग-बिरंगी धातुओंसे चौक पूरे | घरकी सारी सामग्री उठाकर एक कोनेमें रख दे | (१३) पाँच दिन पहलेसे ही यत्नपूर्वक बहुत-से बिछानेके वस्त्र एकत्र कर ले तथा केलेके खंभोंसे सुशोभित एक ऊँचा मण्डप तैयार कराये | (१४) उसे सब ओर फल, पुष्प, पत्र और चॅंदोवेसे अलंकृत करे तथा चारों ओर झंडियाँ लगाकर तरह-तरहके सामानोंसे सजा दे | (१५) उस मण्डपमें कुछ ऊँचाईपर सात विशाल लोकोंकी कल्पना करे और उनमें विरक्त ब्राह्मणोंको बुला-बुलाकर बैठाये | (१६) आगेकी ओर उनके लिये वहाँ यथोचित आसन तैयार रखे | इनके पीछे वक्ताके लिए भी एक दिव्य सिंहासनका प्रबन्ध करे | (१७) यदि वक्ताका मुख उत्तरकी ओर रहे, तो श्रोता पूर्वाभिमुख होकर बैठे और यदि वक्ता पूर्वाभिमुख रहे तो श्रोताको उत्तरकी ओर मुख करके बैठना चाहिये | (१८) अथवा वक्ता और श्रोताको पूर्वमुख होकर बैठना चाहिये | देश-काल आदिको जाननेवाले महानुभावोंने श्रोताके लिये ऐसा ही नियम बताया है | (१९) जो वेद-शास्त्रकी स्पष्ट व्याख्या करनेमें समर्थ हो, तरह-तरहके दृष्टान्त दे सकता हो तथा विवेकी और अत्यंत निःस्पृह हो, ऐसे विरक्त और विष्णुभक्त ब्राह्मणको वक्ता बनाना चाहिये | (२०) श्रीमद्भागवतके प्रवचनमें ऐसे लोगोंको नियुक्त नहीं करना चाहिये जो पण्डित होनेपर भी अनेक धर्मोंके चक्करमें पड़े हुए, स्त्री-लम्पट एवं पाखण्डके प्रचारक हों | (२१) वक्ताके पास ही उसकी सहायताके लिये एक वैसा ही विद्वान और स्थापित करना चाहिये | वह भी सब प्रकारके संशयोंकी निवृत्ति करनेमें समर्थ और लोगोंको समझानेमें कुशल हो | (२२)
कथा-प्रारम्भके दिनसे एक दिन पूर्व व्रत ग्रहण करनेके लिये वक्ताको क्षौर करा लेना चाहिये | तथा अरुणोदयके समय शौचसे निवृत्त होकर अच्छी तरह स्नान करे | (२३) और संध्यादि अपने नित्यकर्मों को संक्षेपसे समाप्त करके कथाके विघ्नोंकी निवृत्तिके लिए गणेशजी का पूजन करे | (२४) तदनंतर पितृगणका तर्पण कर पूर्व पापोंकी शुद्धिके लिए प्रायश्च्रित करे और एक मण्डल बनाकर श्रीहरि को स्थापित करे | (२५) फिर भगवान् श्रीकृष्णको लक्ष्य करके मंत्रोच्चारणपूर्वक क्रमशः षोडशोपचारविधिसे पूजन करे और उसके पश्चात् प्रदक्षिणा तथा नमस्कारादि कर इस प्रकार स्तुति करे | (२६) ‘करुणानिधान! मैं संसार-सागरमें डूबा हुआ और बड़ा दीन हूँ | कर्मोंके मोहरूपी ग्राहने मुझे पकड़ रक्खा है | आप इस संसार-सागरसे मेरा उद्धार कीजिये |’ (२७) इसके पश्चात् धुप-दीप आदि सामग्रियोंसे श्रीमद्भागवतकी भी बड़े उत्साह और प्रीतीपूर्वक विधि-विधानसे पूजा करे | (२८) फिर पुस्तकके आगे नारियल रखकर नमस्कार करे और प्रसन्नचितसे इस प्रकार स्तुति करे - (२९) ‘श्रीमद्भागवतके रूपमें आप साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्र ही विराजमान हैं | नाथ! मैंने भवसागरसे छुटकारा पानेके लिए आपकी शरण ली है | (३०) मेरा यह मनोरथ आप बिना किसी विघ्न-बाधाके सांगोपांग पूरा करें | केशव! मैं आपका दास हूँ |’ (३१)
इस प्रकार दीन वचन कहकर फिर वक्ताका पूजन करे | उसे सुन्दर वस्त्राभूषणसे विभूषित करे और फिर पूजाके पश्चात् उसकी इस प्रकार स्तुति करे – (३२) ‘शुकस्वरुप भगवन्! आप समझानेकी कलामें कुशल और सब शास्त्रोंमें पारंगत हैं; कृपया इस कथाको प्रकाशित करके मेरा अज्ञान दूर करें |’ (३३) फिर अपने कल्याणके लिए प्रसन्नतापूर्वक उसके सामने नियम ग्रहण करे और सात दिनोंतक यथाशक्ति उसका पालन करे | (३४) कथामें विघ्न न हो, इसके लिए पाँच ब्राह्मणोंको और वरण करे; वे द्वादशाक्षर मन्त्रद्वारा भगवानके नामोंका जप करें | (३५) फिर ब्राह्मण, अन्य विष्णुभक्त एवं कीर्तन करनेवालोको नमस्कार करके उनकी पूजा करे और उनकी आज्ञा पाकर स्वयं भी आसनपर बैठ जाय | (३६) जो पुरुष लोक, सम्पत्ति, धन, घर और पुत्रादिकी चिंता छोड़कर शुद्धचितसे केवल कथामें ही ध्यान रखता है, उसे इसके श्रवणका उत्तम फल मिलता है | (३७)
बुद्धिमान् वक्ताको चाहिये कि सूर्योदयसे कथा आरम्भ करके साढ़े तीन पहरतक माध्यम स्वरसे अच्छी तरह कथा बाँचे | (३८) दोपहरके समय दो घड़ीतक कथा बंद रखे | उस समय कथाके प्रसंगके अनुसार वैष्णवोंको भगवान् के गुणोंका कीर्तन करना चाहिये – व्यर्थ बातें नहीं करनी चाहिये | (३९) कथा के समय मल-मूत्रके वेगको काबूमें रखनेके लिए अल्पाहार सुखकारी होता है; इसलिये श्रोता केवल एक ही समय हविष्यान्न भोजन करे | (४०) यदि शक्ति हो तो सातों दिन निराहार रहकर कथा सुने अथवा केवल घी य दूध पीकर सुखपूर्वक श्रवण करे | (४१) अथवा फलाहार या एक समय ही भोजन करे | जिससे जैसा नियम सुभीतेसे सध सके, उसीको कथाश्रवणके लिए ग्रहण करे | (४२) मैं तो उपवासकी अपेक्षा भोजन करना अच्छा समझता हूँ, यदि वह कथाश्रवणमें सहायक हो | यदि उपवाससे श्रवणमें बाधा पहुँचती हो तो वह किसी कामका नहीं | (४३)
नारदजी! नियमसे सप्ताह सुननेवाले पुरुषोंके नियम सुनिये | विष्णुभक्तकी दीक्षासे रहित पुरुष कथाश्रवणका अधिकारी नहीं है | (४४) जो पुरुष नियमसे कथा सुने, उसे ब्रह्मचर्यसे रहना, भूमिपर सोना और नित्यप्रति कथा समाप्त होनेपर पत्तलमें भोजन करना चाहिए | (४५) दाल, मधु, तेल, गरिष्ठ अन्न, भावदूषित पदार्थ और बासी अन्न – इनका उसे सर्वदा ही त्याग करना चाहिये | (४६) काम, क्रोध, मद, मान, मत्सर, लोभ, दंभ, मोह और द्वेषको तो अपने पास भी नहीं फटकने देना चाहिये | (४७) वह वेद, वैष्णव, ब्राह्मण, गुरु, गोसेवक तथा स्त्री, राजा और महापुरुषोंकी निन्दासे भी बचे | (४८) नियमसे कथा सुननेवाले पुरुषको रजस्वला स्त्री, अन्त्यज, म्लेच्छ, पतित, गायत्रीहीन द्विज, ब्राह्मणोंसे द्वेष करनेवाले तथा वेदको न माननेवाले पुरुषोंसे बात नहीं करनी चाहिये | (४९) सर्वदा सत्य, शौच, दया, मौन, सरलता, विनय और उदारताका बर्ताव करना चाहिये | (५०) धनहीन, क्षयरोगी, किसी अन्य रोगसे पीड़ित, भाग्यहीन, पापी, पुत्रहीन और मुमुक्षु भी यह कथा श्रवण करे | (५१) जिस स्त्रीका रजोदर्शन रुक गया हो, जिसके एक ही संतान होकर रह गयी हो, जो बाँझ हो, जिसकी संतान होकर मर जाती हो अथवा जिसका गर्भ गिर जाता हो, वह यत्नपूर्वक इस कथा को सुने | (५२) ये सब यदि विधिवत् कथा सुनें तो इन्हें अक्षय फलकी प्राप्ति हो सकती है | यह अत्युत्तम दिव्य कथा करोड़ो यज्ञोंका फल देनेवाली है | (५३)
इस प्रकार इस व्रतकी विधियोंका पालन करके फिर उद्दापन करे | जिन्हें इसके विशेष फल की इच्छा हो, वे जन्माष्टमी-व्रतके समान ही इस कथाव्रतका उद्दापन करें | (५४) किन्तु जो भगवानके अकिञ्चन भक्त हैं, उनके लिए उद्दापनका कोई आग्रह नहीं है | वे श्रवणसे ही पवित्र हैं; क्योकि वे तो निष्काम भगवद्भक्त हैं | (५५)
इस प्रकार जब सप्ताहयज्ञ समाप्त हो जाय, तब श्रोताओंको अत्यंत भक्तिपूर्वक पुस्तक और वक्ताकी पूजा करनी चाहिये | (५६) फिर वक्ता श्रोताओंको प्रसाद, तुलसी और प्रसादी मालाएँ दे तथा सब लोग मृदंग और झाँझकी मनोहर ध्वनिसे सुंदर कीर्तन करें | (५७) जय-जयकार, नमस्कार और शङ्खध्वनिका घोष कराये तथा ब्राह्मण और याचकोंको धन और अन्न दे | (५८) श्रोता विरक्त हो तो कर्मकी शान्तिके लिए दुसरे दिन गीतापाठ करे; गृहस्थ हो तो हवन करे | (५९) उस हवनमें दशमस्कन्धका एक-एक श्लोक पढ़कर विधिपूर्वक खीर, मधु, घृत, तिल और अन्नादि सामग्रियोंसे आहुति दे | (६०)
अथवा एकाग्र चित्तसे गायत्री-मन्त्रद्वारा हवन करे; क्योंकि तत्वतः यह महापुराण गायत्रीस्वरुप ही है | (६१) होम करनेकी शक्ति न हो तो उसका फल प्राप्त करनेके लिये ब्राह्मणोंको हवनसामग्री दान करे तथा नाना प्रकारकी त्रुटियोंको दूर करनेके लिए और विधिमें फिर जो न्युनाधिकता रह गयी हो, उसके दोषोंकी शान्ति के लिये विष्णुसहस्रनामका पाठ करे | उससे सभी कर्म सफल हो जाते हैं; क्योकि कोई भी कर्म इससे बढ़कर नहीं है | (६२-६३)
फिर बारह ब्राह्मणोंको खीर और मधु आदि उत्तम-उत्तम पदार्थ खिलाये तथा व्रतकी पूर्तीके लिए गौ और सुवर्णका दान करे | (६४) सामर्थ्य हो तो तीन तोले सोनेका एक सिंहासन बनवाये, उसपर सुन्दर अक्षरोंमें लिखी हुई श्रीमद्भागवतकी पोथी रखकर उसकी आवाहनादि विविध उपचारोंसे पूजा करे और फिर जितेन्द्रिय आचार्यको – उसका वस्त्र, आभूषण एवं गन्धादिसे पूजनकर – दक्षिणाके सहित समर्पण कर दे | (६४-६६) यों करनेसे वह बुद्धिमान् दाता जन्म-मरणके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है | यह सप्ताहपारायण विधि सब पापोंकी निवृत्ति करनेवाली है | इसका इस प्रकार ठीक-ठीक पालन करनेसे यह मंगलमय भागवतपुराण अभीष्ट फल प्रदान करता है तथा अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष – चारोंकी प्राप्ति का साधन हो जाता है – इसमें संदेह नहीं | (६७-६८)
सनकादि कहते हैं – नारदजी! इस प्रकार तुम्हे यह सप्ताहश्रवण की विधि हमने पूरी-पूरी सुना दी, अब और क्या सुनना चाहते हो ? इस श्रीमद्भागवतसे भोग और मोक्ष दोनों ही हाथ लग जाते हैं | (६९)
सूतजी कहते हैं – शौनकजी! यों कहकर महामुनि सनकादिने एक सप्ताहतक विधिपूर्वक इस सर्व-पापनाशिनी, परम पवित्र तथा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली भागवतकथाका प्रवचन किया | सब प्राणियोंने नियमपूर्वक इसे श्रवण किया | इसके पश्चात् उन्होंने विधिपूर्वक भगवान् पुरुषोत्तमकी स्तुति की | (७०-७१) कथाके अन्तमें ज्ञान-वैराग्य और भक्तिको बड़ी पुष्टि मिली और वे तीनों एकदम तरुण होकर सब जीवोंका चित अपनी ओर आकर्षित करने लगे | (७२) अपना मनोरथ पूरा होनेसे नारदजीको भी बड़ी प्रसन्नता हुई, उनके सारे शरीरमें रोमाञ्च हो आया और वे परमानन्दसे पूर्ण हो गये | (७३) इस प्रकार कथा श्रवणकर भगवान् के प्यारे नारदजी हाथ जोड़कर प्रेमगद्गद् वाणीमें सनकादिसे कहने लगे | (७४)
नारदजीने कहा – मैं धन्य हूँ, आपलोगोंने करुणा करके मुझे बड़ा ही अनुग्रहित किया है, आज मुझे सर्वपापहारी भगवान् श्रीहरिकी प्राप्ति हो गयी | (७५) तपोधानो! मैं श्रीमद्भागवतश्रवणको ही सब धर्मोंसे श्रेष्ठ मानता हूँ; क्योंकि इसके श्रवणसे वैकुण्ठ (गोलोक) – विहारी श्रीकृष्णकी प्राप्ति होती है | (७६)
सूतजी कहते हैं – शौनकजी! वैष्णवश्रेष्ठ नारदजी यों कह ही रहे थे कि वहाँ घूमते-फिरते योगेश्वर शुकदेवजी आ गये | (७७) कथा समाप्त होते ही व्यासनन्दन श्रीशुकदेवजी वहाँ पधारे | सोलह वर्षकी-सी आयु, आत्मलाभसे पूर्ण, ज्ञानरूपी महासागरका संवर्धन करनेके लिये चन्द्रमाके सामान वे प्रेमसे धीरे-धीरे श्रीमद्भागवतका पाठ कर रहे थे | (७८) परम तेजस्वी शुकदेवजीको देखकर सारे सभासद् झटपट खड़े हो गये और उन्हें एक ऊँचे आसनपर बैठाया | फिर देवर्षि नारदजीने उनका प्रेमपूर्वक पूजन किया | उन्होंने सुखपूर्वक बैठकर कहा – ‘आपलोग मेरी निर्मल वाणी सुनिये |’ (७९)
श्रीशुकदेवजी बोले – रसिक एवं भावुक जन! यह श्रीमद्भागवत वेदरूप कल्पवृक्षका परिपक्त फल है | श्रीशुकदेवरूप शुकके मुखका संयोग होनेसे अमृतरससे परिपूर्ण है | यह रस-ही-रस है – इसमें न छिलका है न गुठली | यह इसी लोकमें सुलभ है | जबतक शरीरमें चेतना रहे, तबतक आपलोग बार-बार इसका पान करें | (८०) महामुनि व्यासदेवने श्रीमद्भागवत महापुराणकी रचना की है | इसमें निष्कपट – निष्काम परमधर्मका निरूपण है | इसमें शुद्धान्तःकरण सत्पुरुषोंके जानने योग्य कल्याणकारी वास्तविक वास्तुका वर्णन है, जिससे तीनों तापोंकी शान्ति होती है | इसका आश्रय लेनेपर दुसरे शास्त्र अथवा साधनकी आवश्यकता नहीं रहती | जब कभी पुण्यात्मा पुरुष इसके श्रवणकी इच्छा करते हैं, तभी ईश्वर अविलम्ब उनके ह्रदयमें अवरुद्ध हो जाता है | (८१) यह भागवत पुराणोंका तिलक और वैष्णवोंका धन है | इसमें परमहंसोंके प्राप्य विशुद्ध ज्ञान का ही वर्णन किया गया है तथा ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के सहित निवृत्तिमार्गको प्रकाशित किया गया है | जो पुरुष भक्तिपूर्वक इसके श्रवण, पठन और मननमें तत्पर रहता है, वह मुक्त हो जाता है | (८२) यह रस स्वर्गलोक, सत्यलोक, कैलास और वैकुण्ठमें भी नहीं है | इसलिए भाग्यवान् श्रोताओं! तुम इसका खूब पान करो; उसे कभी मत छोड़ो, मत छोड़ो | (८३)
सूतजी कहते हैं – श्रीशुकदेवजी इस प्रकार कह ही रहे थे कि उस सभाके बीचोबीच प्रह्र्लाद, बलि, उद्धव और अर्जुन आदि पार्षदोंके सहित साक्षात् श्रीहरि प्रकट हो गये | तब देवर्षि नारदने भगवान् और उनके भक्तोंकी यथोचित पूजा की | (८४) भगवानको प्रसन्न देखकर देवर्षिने उन्हें एक विशाल सिंहासनपर बैठा दिया और सब लोग उनके सामने संकीर्तन करने लगे | उस कीर्तनको देखनेके लिये श्रीपार्वतीजीके सहित महादेवजी और ब्रह्माजी भी आये | (८५) कीर्तन आरम्भ हुआ | प्रह्र्लादजी तो चञ्चलगति (फुर्तीले) होनेके कारण करताल बजाने लगे, उद्धवजीने झाँझें उठा लीं, देवर्षि नारद वीणाकी ध्वनि करने लगे, स्वर-विज्ञान (गान-विद्या) में कुशल होनेके कारण अर्जुन राग अलापने लगे, इन्द्रने मृदंग बजाना आरम्भ किया, सनकादि बीच-बीचमें जयघोष करने लगे और इन सबके आगे शुकदेवजी तरह-तरहकी सरस अंगभंगी करके भाव बताने लगे | (८६) इन सबके बीचमें परम तेजस्वी भक्ति, ज्ञान और वैराग्य नटोंके समान नाचने लगे | एसा अलौकिक कीर्तन देखकर भगवान् प्रसन्न हो गये और इस प्रकार कहने लगे - | (८७) ‘मैं तुम्हारी इस कथा और कीर्तनसे बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हारे भक्तिभावने इस समय मुझे अपने वशमें कर लिया है | अतः तुमलोग मुझसे वर माँगो |’ भगवानके ये वचन सुनकर सब लोग बड़े प्रसन्न हुए और प्रेमार्द्र चित्तसे भगवान् से कहने लगे | (८८) ‘भगवन्! हमारी यही अभिलाषा है कि भविष्यमें भी जहाँ-कहीं सप्ताह-कथा हो, वहाँ आप इन पार्षदोंके सहित अवश्य पधारें | हमारा यह मनोरथ पूर्ण कर दीजिये |’ भगवान् ‘तथास्तु’ कहकर अन्तर्धान हो गये | (८९)
इसके पश्चात् नारदजीने भगवान् तथा उनके पार्षदोंके चरणोंको लक्ष्य करके प्रणाम किया और फिर शुकदेवजी आदि तपस्वियोंको भी नमस्कार किया | कथामृतका पान करनेसे सब लोगोंको बड़ा ही आनन्द हुआ, उनका सारा मोह नष्ट हो गया | फिर वे सब लोग अपने-अपने स्थानोंको चले गये | (९०) उस समय शुकदेवजीने भक्तिको उसके पुत्रोंसहित अपने शास्त्रमें स्थापित कर दिया | इसीसे भागवतका सेवन करने से श्रीहरि वैष्णवोंके ह्रदयमें आ विराजते हैं | (१२) जो लोग दरिद्रताके दुःखज्वरकी ज्वालासे दग्ध हो रहे हैं, जिन्हें माया-पिशाचोने रौंद डाला है तथा जो संसार-समुद्रमें डूब रहे हैं, उनका कल्याण करनेके लिए श्रीमद्भागवत सिंहनाद कर रहा है | (९२)
शौनकजीने पूछा - सूतजी! शुकदेवजीने राजा परीक्षित् को, गोकर्णने धुन्धुकारीको और सनकादिने नारदजीको किस-किस समय यह ग्रन्थ सुनाया था – मेरा यह संशय दूर कीजिये! (९३)
सूतजीने कहा – भगवान् श्रीकृष्णके स्वधामगमनके बाद कलियुगके तीस वर्षसे कुछ अधिक बीत जानेपर भाद्रपद मासकी शुक्ला नवमीको शुकदेवजीने कथा आरम्भ की थी | (९४) राजा परीक्षित् के कथा सुननेके बाद कलियुगके दो सौ वर्ष बीत जाने पर आषाढ़ मासकी शुक्ला नवमीको गोकर्णजीने यह कथा सुनाई थी | (९५) इसके पीछे कलियुगके तीस वर्ष और निकल जानेपर कार्तिक शुक्ला नवमीसे सनकादिने कथा आरम्भ की थी | (१६) निष्पाप शौनकजी! आपने जो कुछ पूछा था, उसका उत्तर मैंने आपको दे दिया | इस कलियुगमें भागवतकी कथा भवरोगकी रामबाण औषध है | (९७)
संतजन! आपलोग आदरपूर्वक उस कथामृतका पान कीजिये | यह श्रीकृष्णको अत्यंत प्रिय, सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला, मुक्तिका एकमात्र कारण और भक्तिको बढ़ानेवाला है | लोकमें अन्य कल्याणकारी साधनोंका विचार करने और तीर्थों का सेवन करनेसे क्या होगा | (९८) अपने दूतको हाथमें पाश लिए देखकर यमराज उसके कानमें कहते हैं – ‘देखो, जो भगवानकी कथावार्तामें मत्त हो रहे हों, उनसे दूर रहना; मैं औरोंको ही दण्ड देनेकी शक्ति रखता हूँ, वैष्णवोंको नही |’ (९९) इस असार संसारमें विषयरूप विषकी आसक्तिके कारण व्याकुल बुद्धिवाले पुरुषो! अपने कल्याणके उद्देश्यसे आधे क्षणके लिये भी इस शुककथारूप अनुपम सुधाका पान करो | प्यारे भाइयो! निन्दित कथाओंसे युक्त कुपथमें व्यर्थ ही क्यों भटक रहे हो ? इस कथाके कान में प्रवेश करते ही मुक्ति हो जाती है, इस बातके साक्षी राजा परीक्षित् हैं | (१००) श्रीशुकदेवजीने प्रेमरसके प्रवाहमें स्थिर होकर इस कथाको कहा था | इसका जिसके कण्ठसे सम्बन्ध हो जाता है, वह वैकुण्ठका स्वामी बन जाता है | (१०१) शौनकजी! मैंने अनेक शास्त्रोंको देखकर आपको यह परम गोप्य रहस्य अभी-अभी सुनाया है | सब शास्त्रोंके सिद्धान्तोंका यही निचोड़ है | संसारमें इस शुक्शास्त्रसे अधिक पवित्र और कोई वास्तु नहीं है; अतः आपलोग परमानन्दकी प्राप्तिके लिये इस द्वादशस्कन्धरूप रसका पान करें | (१०२) जो पुरुष नियमपूर्वक इस कथाका भक्ति-भावसे श्रवण करता है, और जो शुद्धान्तःकरण भगवद्भक्तोंके सामने इसे सुनाता है, वे दोनों ही विधिका पूरा-पूरा पालन करनेके कारण इसका यथार्थ फल पाते हैं – उनके लिये त्रिलोकीमें कुछ भी असाध्य नहीं रह जाता | (१०३)

|| श्रीमद्भागवतमहात्म्य समाप्त ||
|| हरिः ॐ तत्सत् ||
*** जय श्रीहरि ***

Wednesday, August 7, 2013

यहाँ सब कुछ बिक रहा है......

घोडा रेस में बिक रहा है,
वकील केस में बिक रहा है,
अदालत में जज बिक रहा है,
वर्दी में फर्ज बिक रहा है !
यहाँ सब कुछ बिक रहा है.......
♻
मज़बूरी में इंसान बिक रहा है,
जुल्म का हैवान बिक रहा है,
पैसों कि खातिर ईमान बिक रहा है,
गरीबों का प्राण बिक रहा है !
यहाँ सब कुछ बिक रहा है.......
♻
फिल्मों में गाना बिक रहा है,
गरीब बच्चों का दाना बिक रहा है,
स्कूल का मास्टर बिक रहा है,
अस्पताल का डाक्टर बिक रहा है !
यहाँ सब कुछ बिक रहा है.......
♻
सड़कों पर मन बिक रहा है,
ब्यूटी पार्लरों में तन बिक रहा है,
गरीबों का गुर्दा बिक रहा है,
शर्म-हया का पर्दा बिक रहा है !
यहाँ सब कुछ बिक रहा है.......
♻
सर्कस का जोकर बिक रहा है,
बैंक का लाकर बिक रहा है,
अखबार का हाकर बिक रहा है,
कोठी का नौकर बिक रहा है !
यहाँ सब कुछ बिक रहा है.......
♻
गेट का संत्री बिक रहा है,
पार्टी का मंत्री बिक रहा है,
खिलाडी खेल में बिक रहा है,
कानून जेल में बिक रहा है !
यहाँ सब कुछ बिक रहा है......

एक संत ने एक रात स्वप्न देखा

एक संत ने एक रात स्वप्न देखा कि उनके पास एक देवदूत आया है, देवदूत के हाथ में एक सूची है। उसने कहा, ‘यह उन लोगों की सूची है, जो प्रभु से प्रेम करतेहैं।’ संत ने कहा, ‘मैं भी प्रभु से प्रेम करता हूँ, मेरा नाम तो इसमें अवश्य होगा।’ देवदूत बोला, ‘नहीं, इसमें आप का नाम नहीं है।’ संत उदास हो गए - फिर उन्होंने पूछा, ‘इसमें मेरा नाम क्यों नहीं है। मैं ईश्वर से ही नहीं अपितु गरीब, असहाय, जरूरतमंद सबसे प्रेम करताहूं। मैं अपना अधिकतर समय दूसरो की सेवा में लगाता हूँ, उसके बाद जो समय बचता है उसमें प्रभु का स्मरण करता हूँ - तभी संत की आंख खुल गई।
दिन में वह स्वप्न को याद कर उदास थे, एक शिष्य ने उदासी का कारण पूछा तो संत ने स्वप्न की बात बताई और कहा, ‘वत्स, लगता है सेवा करने में कहीं कोई कमी रह गई है।’ तभी मैं ईश्वर को प्रेम करने वालो की सूची में नहीं हूँ - दूसरे दिन संत ने फिर वही स्वप्न देखा, वही देवदूत फिर उनके सामने खड़ा था। इस बार भी उसके हाथ में कागज था। संत ने बेरुखी से कहा, ‘अब क्यों आए हो मेरे पास - मुझे प्रभु से कुछ नहीं चाहिए।’ देवदूत ने कहा, ‘आपको प्रभु से कुछ नहीं चाहिए, लेकिन प्रभु का तो आप पर भरोसा है। इस बार मेरे हाथ में दूसरी सूची है।’ संत ने कहा, ‘तुम उनके पास जाओ जिनके नाम इस सूची में हैं, मेरे पास क्यों आएहो ?’
देवदूत बोला, ‘इस सूची में आप का नाम सबसे ऊपर है।’ यह सुन कर संत को आश्चर्य हुआ - बोले, ‘क्या यह भी ईश्वर सेप्रेम करने वालों की सूची है।’ देवदूत ने कहा, ‘नहीं, यह वह सूची है जिन्हें प्रभु प्रेम करते हैं, ईश्वर से प्रेम करने वाले तो बहुत हैं, लेकिन प्रभु उसको प्रेम करते हैं जो सभी से प्रेम करता हैं। प्रभु उसको प्रेम नहीं करते जो दिन रात कुछ पाने के लिए प्रभु का गुणगान करते है।’ - प्रभु आप जैसे निर्विकार, निस्वार्थ लोगो से ही प्रेम करते है ।संत की आँखे गीली हो चुकी थी - उनकी नींद फिर खुल गयी -वो आँसू अभी भी उनकी आँखों में थे .

अपनों के, अपने समाज के, अपने ही देश के द्वारा कटघरे में खड़ी की जाती हैं बेटियां ।।

अपनों के, अपने समाज के, अपने ही देश के
द्वारा कटघरे में खड़ी की जाती हैं बेटियां ।।
कसूर चाहे किसी का भी हो, गुनाहगार ठहराई जाती हैं लेकिन बेटियां ।।

घर, दफ्तर, स्कूल, कालेज या कोई सार्वजानिक स्थल,
हर जगह अपमानित होती हैं बेटियां ।।
किस्से मांगे मदद, कौन करे हिफाज़त, भरोसा करना है मुश्किल..
रिश्ते बदल जाते हैं, नज़रें बदल जाती हैं , रंग बदलती गिरगिटों से ठगी जाती हैं बेटियां ।।

हर एक आहट पर डरी सहमी सी, अपने आँचल को दानवों से बचाती हुई,
फिर भी आसमान छूना चाहती हैं बेटियां ।।
अपने स्वाभिमान के लिए, पूर्ण आत्म- विशवास के साथ,
आत्म – निर्भर बनना चाहती हैं बेटियां ।।

पुरुष समाज में अपना एक अहम् और समानता का दर्ज़ा चाहती हैं,
इससे ज्यादा और क्या चाहती हैं, मेरे वतन की बेटियां ।।
बंद करो अब यह पक्षपात, अन्याय, व्यभिचार और बलात्कार
बदलो समाज की परिपाटी को, सुखी ,सुरक्षित और खुशहाल हो हर
माँ ,बहिन ,बहू और मेरे वतन की बेटियां ।।.

अपने जीवन को अपनी मर्ज़ी से जीने के लिए आज़ादी चाहती हैं
खुली हवा में साँस लेने दो इन्हें, यह नन्ही सी चिड़िया हैं,
तितलियाँ हैं यह रंग बिरंगी, मेरे वतन की जा

बेटियां

बहुत चंचल बहुत खुशनुमा सी होती हैं बेटियां,
नाजुक सा दिल रखती हैं मासूम सी हैं बेटियां..

बात बात पर रोटी हैं नादान सी होती हैं बेटियां,
है रहमत से भरपूर खुदा की निमत ये बिटियाँ..

घर भी महक उठता हैं जब मुस्कराती हैं बेटियां,
होती हैं अजीब सी हलचल जब छोड़ जाती हैं बेटियां,

घर लगता हैं सुना सुना कितना रुला जाती हैं बेटियां,
बाबुल की लाडली होती हैं बेटियां.. ये हम नहीं कहते
ये तो खुदा कहता हैं
की जब में बहुत खुश होता हैं तो पैदा होती हैं बेटियां...

एक धनी व्यापारी

पहले समय में किसी नगर में एक
धनी व्यापारी रहता था. दूर-दूर तक उसका व्यापार
फैला हुआ था. नगर के सभी लोग उस
व्यापारी का सम्मान करते थे. इतना सब कुछ से
संपन्न होने के बाद भी वह व्यापारी बहुत दुखी था,
क्योंकि उसका कोई पुत्र नहीं था. जिस कारण अपने
मृत्यु के पश्चात् व्यापार के
उत्तराधिकारी की चिंता उसे हमेशा सताती रहती थी.
पुत्र प्राप्ति की इच्छा से व्यापरी प्रत्येक सोमवार
भगवान् शिव की व्रत-पूजा कि या करता था और शाम
के समय शिव मंदिर में जाकर शिवजी के सामने
घी का दीपक जलाया करता था. उसकी भक्ति देखकर
मां पार्वती प्रसन्न हो गई और भगवान शिव से उस
व्यापारी की मनोकामना पूर्ण करने का निवेदन किया.
भगवान शिव बोले- इस संसार में सबको उसके कर्म
के अनुसार फल की प्राप्ति होती है.
जो प्राणी जैसा कर्म करते हैं, उन्हें वैसा ही फल
प्राप्त होता है.
शिवजी द्वारा समझाने के बावजूद
मां पार्वती नहीं मानी और उस
व्यापारी की मनोकामना पूर्ति हेतु वे शिवजी से बार-
बार अनुरोध करती रही. अंततः माता के आग्रह
को देखकर भगवान भोलेनाथ को उस व्यापारी को पुत्र
प्राप्ति का वरदान देना पड़ा. वरदान देने के पश्चात्
भोलेनाथ मां पार्वती से बोले- आपकेआग्रह पर मैंने
पुत्र प्राप्ति का वरदान तो दे दिया परन्तु इसका यह
पुत्र 16 वर्ष से अधिक समय तक जीवित
नहीं रहेगा. उसी रात भगवान शिव उस व्यापारी के
स्वप्न में आए और उसे पुत्र प्राप्ति का वरदान
दिया और उसके पुत्र के 16 वर्ष तक जीवित रहने
की भी बात बताई.
भगवान के वरदान से व्यापारी को ख़ुशी तो हुई, लेकिन
पुत्र की अल्पायु की चिंता ने उस ख़ुशी को नष्ट कर
दिया. व्यापारी पहले की तरह सोमवार के दिन भगवान
शिव का विधिवत व्रत करता रहा. कुछ महीनों के बाद
उसके घर अति सुन्दर बालक जन्म लिया, घर में
खुशियां भर गई. बहुत धूमधाम से पुत्र जन्म
का समारोह मनाया गया परन्तु व्यापारी को पुत्र-
जन्म की अधिक ख़ुशी नहीं हुई क्योंकि उसे पुत्र
की अल्प आयु के रहस्य का पता था. जब पुत्र 12
वर्ष का हुआतो व्यापारी ने उसे उसके मामा के साथ
पढ़ने के लिए वाराणसी भेज दिया. लड़का अपने
मामा के साथ शिक्षा प्राप्ति हेतु चल दिया. रास्ते में
जहां भी मामा-भांजा विश्राम हेतु रुकते, वहीं यज्ञ
करते और ब्राह्मणों को भोजन कराते.
लम्बी यात्रा के बाद मामा और भांजा एक नगर में
पहुंचे. उस दिन नगर के राजाकी कन्या का विवाह था,
जिस कारण पूरे नगर को सजाया गया था. निश्चित
समय पर बारात आ गई लेकिन वर का पिता अपने बेटे
के एक आंख से काने होने के कारण बहुत चिंतित था.
उसे भय था कि इस बात का पता चलने पर
कहीं राजा विवाह से इनकार न कर दे. इससे
उसकी बदनामी भी होगी. जब वर के पिता ने
व्यापारी के पुत्र को देखा तो उसके मस्तिष्क में एक
विचार आया. उसने सोचा क्यों न इस लड़के
को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूं. विवाह
केबाद इसको धन देकर विदा कर दूंगा और
राजकुमारी को अपने नगर ले जाऊंगा.
वर के पिता ने लड़के के मामासे इस सम्बन्ध में बात
की. मामा ने धन मिलने के लालच में वर के
पिता की बात स्वीकार कर ली. लड़के को दूल्हे
का वस्त्र पहनाकर राजकुमारी से विवाह कर
दिया गया. राजा ने बहुत सारा धन देकर
राजकुमारी को विदा किया. शादी के बाद लड़का जब
राजकुमारी से साथ लौट रहा था तो वह सच
नहीं छिपा सका और उसने राजकुमारी के ओढ़नी पर
लिख दिया- राजकुमारी, तुम्हारा विवाह मेरे साथ हुआ
था, मैं तो वाराणसी पढ़ने के लिए जा रहा हूं और अब
तुम्हें जिस नवयुवक की पत्नी बनना पड़ेगा, वह
काना है.
जब राजकुमारी ने अपनी ओढ़नी पर लिखा हुआ
पढ़ा तो उसने काने लड़के के साथ जाने से इनकार कर
दिया. राजा सब बातें जानकार राजकुमारी को महल में
रख लिया. उधर लड़का अपने मामा के साथ
वाराणसी पहुंच गया और गुरुकुल में पढ़ना शुरू कर
दिया. जब उसकी आयु 16 वर्ष की हुई तो उसने
यज्ञ किया. यज्ञ के समाप्ति पर
ब्राह्मणों को भोजन करायाऔर खूब अन्न, वस्त्र दान
किए. रात को वह अपने शयनकक्ष में सो गया. शिव
केवरदान के अनुसार शयनावस्था में ही उसके प्राण-
पखेड़ू उड़ गए. सूर्योदय पर मामा मृत भांजे
को देखकर रोने-पीटने लगा. आसपास के लोग
भी एकत्र होकर दुःख प्रकट करने लगे.
लड़के के मामा के रोने, विलाप करने के स्वर समीप से
गुजरते हुए भगवान शिव और माता पार्वती भी सुने.
पार्वती ने भगवान से कहा- प्राणनाथ, मुझे इसके रोने
के स्वर सहन नहीं हो रहे. आप इस व्यक्ति के कष्ट
को अवश्य दूर करें. भगवान शिव ने पार्वती के साथ
अदृश्य रूप में समीप जाकर देखा तो भोलेनाथ
पार्वती से बोले- यह तो उसी व्यापारी का पुत्र है,
जिसे मैंने 16 वर्ष की आयु का वरदान दिया था.
इसकी आयु पूरी हो गई है. मां पार्वती ने फिर भगवान
शिव से निवेदन कर उस बालक को जीवन देने
का आग्रह किया. माता पार्वती के आग्रह पर
भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान
दिया और कुछ ही पल में वह जीवित होकर उठ बैठा.
शिक्षा समाप्त करके लड़कामामा के साथ अपने नगर
की ओरचल दिया. दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुंचे,
जहां उसका विवाह हुआ था. उस नगर में भी यज्ञ
का आयोजन किया.समीप से गुजरते हुए नगर के
राजा ने यज्ञ का आयोजन देखा और उसने तुरंत
ही लड़के और उसके मामा को पहचान लिया. यज्ञ के
समाप्त होने पर राजा मामा और लड़के को महल में ले
गया और कुछ दिन उन्हें महल में रखकर बहुत-सा-धन,
वस्त्र आदि देकर राजकुमारी के साथ विदा कर दिया.
इधर भूखे-प्यासे रहकर व्यापारी और उसकी पत्नी बेटे
की प्रतीक्षा कर रहे थे. उन्होंने प्रतिज्ञा कर
रखी थी कि यदि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु का समाचार
मिला तो दोनों अपने प्राण त्याग देंगे परन्तु जैसे
ही उसने बेटे के जीवित वापस लौटने का समाचार
सुना तो वह बहुत प्रसन्न हुआ. वह अपने पत्नी और
मित्रो के साथ नगर के द्वार पर पहुंचा. अपने बेटे के
विवाह का समाचार सुनकर, पुत्रवधू
राजकुमारी को देखकर उसकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा.
उसीरात भगवान शिव ने व्यापारी के स्वप्न में आकर
कहा- हे श्रेष्ठी, मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और
व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र
को लम्बी आयु प्रदान की है. पुत्र की लम्बी आयु
जानकार व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ.
सोमवार का व्रत करने से व्यापारी के घर में
खुशियां लौट आईं. शास्त्रों में लिखा है कि जो स्त्री-
पुरुष सोमवार का विधिवत व्रत करते और
व्रतकथा सुनते हैं उनकी सभी इच्छाएं
पूरी होती हैं.