Wednesday, August 7, 2013

अपनों के, अपने समाज के, अपने ही देश के द्वारा कटघरे में खड़ी की जाती हैं बेटियां ।।

अपनों के, अपने समाज के, अपने ही देश के
द्वारा कटघरे में खड़ी की जाती हैं बेटियां ।।
कसूर चाहे किसी का भी हो, गुनाहगार ठहराई जाती हैं लेकिन बेटियां ।।

घर, दफ्तर, स्कूल, कालेज या कोई सार्वजानिक स्थल,
हर जगह अपमानित होती हैं बेटियां ।।
किस्से मांगे मदद, कौन करे हिफाज़त, भरोसा करना है मुश्किल..
रिश्ते बदल जाते हैं, नज़रें बदल जाती हैं , रंग बदलती गिरगिटों से ठगी जाती हैं बेटियां ।।

हर एक आहट पर डरी सहमी सी, अपने आँचल को दानवों से बचाती हुई,
फिर भी आसमान छूना चाहती हैं बेटियां ।।
अपने स्वाभिमान के लिए, पूर्ण आत्म- विशवास के साथ,
आत्म – निर्भर बनना चाहती हैं बेटियां ।।

पुरुष समाज में अपना एक अहम् और समानता का दर्ज़ा चाहती हैं,
इससे ज्यादा और क्या चाहती हैं, मेरे वतन की बेटियां ।।
बंद करो अब यह पक्षपात, अन्याय, व्यभिचार और बलात्कार
बदलो समाज की परिपाटी को, सुखी ,सुरक्षित और खुशहाल हो हर
माँ ,बहिन ,बहू और मेरे वतन की बेटियां ।।.

अपने जीवन को अपनी मर्ज़ी से जीने के लिए आज़ादी चाहती हैं
खुली हवा में साँस लेने दो इन्हें, यह नन्ही सी चिड़िया हैं,
तितलियाँ हैं यह रंग बिरंगी, मेरे वतन की जा

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