Wednesday, August 7, 2013

भागवत में शुकदेवजी अब अजामिल की कथा सुना रहे हैं।

भागवत में शुकदेवजी अब अजामिल की कथा सुना रहे हैं। 

एक ब्राह्मण था अजामिल नाम का। 
जाति का ब्राह्मण पर कर्मों से दुष्ट था। 

लूटपाट करता, साधु- संतों को लूट लेता।

एक दिन घूमने गया वो। 
एक जंगल में जाकर देखाकि एक कुंड में एक व्यक्ति, एक वैश्या के साथ जलक्रीड़ा कर रहा था। 

इसने उस वैश्या को भीगा हुआ देखा तो इसकी आंख में काम आ गया और कामांध हो गया।
उसने सोचा ये वैश्या मुझे प्राप्त हो जाए और उसने उसको प्राप्त कर लिया और घर ले आया।

फिर उससे उसकी संतानें हुईं और जो सबसे छोटी संतान थी उसका नाम उसने नारायण रखा।

देखिए हमें समझने की यह बात है कि अजामिल वन में गया उसने किसी को नहाते देखा और उसको काम जाग गया।

काम जीवन में जब भी आएगा नेत्रों से आएगा।
काम नेत्रों से प्रवेश करता है।
इसलिए क्या देखा जाए ये जीवन में बड़ा महत्वपूर्ण है।
क्या देखा जाए, कितना देखा, कब देखा जाए और कैसे देखा जाए आदमी इस मामले को लेकर बिल्कुल ध्यान ही नहीं देता।

जो भक्त हैं, जो साधक हैं वो इस बात को साधना के रूप में लें कि क्या देखा जाए? कितना देखा जाए?
क्योंकि दृष्टि से जब दृश्य का प्रवेश होता है तो वो दृश्य अपना प्रभाव लेकर आता ही है आप उससे वंचित नहीं हो सकते हैं।

जो भी देखें सोच-समझ कर देखें
हमारे यहां एक कथावाचक हुए हैं डोंगरे महाराज जी।
बड़े सिद्ध संत थे। जब वे भागवत कहा करते थे तो आंखे बंद रखते थे।

लोग उनसे पूछते कि आप आंख बंद करके क्यों बोलते हैं?
तो वह कहते थे किजब मैं भागवत बोलता हूं तो मैं परमात्मा के साथ, भागवत के प्रसंगों के साथ जीता हूं।
डोंगरे जी कहते हैं मैं तो देख नहीं पाता।
बालकृष्ण का जन्म हुआ मुझे लगता है मैं वहीं था। तुलसीदास ने रामकथा ऐसे ही लिखी थी।
सामने दृश्य घट रहा है और लिख ली।

हमें ये समझना चाहिए कि क्या देखना है और कितना।
दृष्टि को विश्राम दीजिए अकारण न देखें। पहले भारत में संयुक्त परिवार हुआ करते थे तो बच्चे लालन-पालन में माता-पिता के अलावा दादा-दादी, नाना- नानी के साथ सोते थे।
बूढ़े नाना- नानी, दादा-दादी अपने नाती- पोतों को महाभारत की कोई रामायण की कहानी सुनाते और बच्चे सो जाते।

अब हो गए छोटे- छोटे परिवार तो बच्चों को कौन कहानी सुनाए।
इसलिए सावधान रहिए।
क्या देख रहे हैं और क्या दिखा रहे हैं।
यह दृश्य कहीं न कहीं आपके मानस पटल पर प्रभाव डालेंगे।

इसीलिए तो कहते थे बच्चों को हिंसात्मक फिल्म न दिखाएं क्यों, क्योंकि वह कहीं न कहीं मानस पटल पर आकर क्रिया में आ जाती है।
इसलिए सावधान रहिए क्या देखा जाए?

अजामिल की कथा हमको ये समझा रही है कि क्या देखें?
कितना देखें और जरूरत नही है तो न देखें।

हमने पिछे पढ़ा कि अजामिल नाम का एक ब्राह्मण था जो अत्यंत दुष्ट प्रवृत्ति का था।
उसने एक वैश्या के साथ संबंध बनाए और जो संतान उत्पन्न हुई उनमें से सबसे छोटे पुत्र का नाम नारायण रखा।

एक दिन अजामिल बाहर बैठा था।
उसके गांव में साधु-संत आए।
गांव के युवकों से पूछा भैया हमें भोजन प्राप्त करना है।
तो कोई भला घर है उसके घर जाकर हम अन्न प्राप्त कर लें।

जो लड़के थे उन्होंने सोचा मजाक करते हैं साधु से, अजामिल के भी मजे ले लेंगे इस बहाने।

उन्होंने कहा एक बहुत अच्छा ब्राह्मण है, बड़ा शुद्ध है, बड़ा आचरणशील है।
आप लोग उसके घर चले जाइए वो भोजन करा देगा।

अजामिल तो अव्वल दर्जे का भ्रष्ट था लेकिन लड़कों ने साधुओं को उसके घर भेज दिया।

साधु-संत गए और साधु-संत ने अजामिल से बोला- आपके घर से भोजन चाहते हैं।

अजामिल ने कहा भोजन तो मिल जाएगा पर मैं तो अव्वल दर्जे का भ्रष्ट हूं।

उन्होंने कहा हम बना लेंगे, तुम सामग्री दे दो बस।

उसने भोजन बनाने की सामग्री दी।

उन्होंने भोजन बनाया और उनको लगा जाते-जाते कुछ भला कर जाएं इसका।

उन्होंने कहा तुम्हारी पत्नी गर्भवती है तो तुम्हारे यहां अब जो संतान हो उसका नाम तुम नारायण रख देना।
साधु उनको बोल गए।

अजामिल को कोई लेना- देना ही नहीं था उसने कहा कुछ तो नाम रखना ही है, चिंकू-पींकू तो नारायण ही रख देंगे।

नारायण नाम रख दिया।

सबसे छोटा पुत्र था तो अजामिल को बड़ा प्यार था उससे।
24 घंटे उसको बुलाए नारायण-नारायण।

नारायण पानी ला,
नारायण ये कर नारायण-नारायण।

80 साल की उम्र हो गई अजामिल की।

मृत्यु का दिन आया।


यमदूत लेने आए।

अजामिल को लगा कोई लेने आए हैं।
उसने सोचा क्या करूं-क्या करूं तो चिल्लाया नारायण-नारायण।

आवाज लगा रहा है अपने बेटे को।

नारायण जल्दी आ,

अब नारायण- नारायण चिल्लाया तो भगवान विष्णु के देवदूत दौड़े आए।

जीवन में नाम का बड़ा महत्व है भागवत कह रही है कि संतान का लालन-पालन करें तो होश में करें।
होश में रहने की जो बात यहां कही जा रही है, वो यही है कि बच्चों कों कहींन कहीं परमात्मा से जोड़े रखिए । भक्त बनाएइ ।

भक्त में सारे गुण होते हैं। भक्त एक आचरण है संपूर्ण आचरण।
कंप्लीट केरेक्टर का नाम भक्त है।
परमात्मा पूरा भक्त चाहता है।
नाम का बड़ा महत्व है इसलिए नाम लेते रहिए।
हरे कृष्ण

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