देवकी चौंक कर उठ बैठीं।
वसुदेव अपनी नींद पूरी कर चुके थे, किंतु अभी लेटे ही हुए थे। उन्हें देवकी का इस प्रकार चिहुँक कर उठ बैठना कुछ विचित्र-सा लगा।
''क्या हुआ?''
''कृष्ण कहाँ गया?''
वसुदेव ने अपनी आँखें पूरी तरह विस्फारित कीं, ''कृष्ण? कृष्ण हमारे पास था ही कब?''
''वह यहीं तो था मेरे पास...।'' और वे रुक गईं, ''तो मैंने स्वप्न देखा था क्या?''
''क्या देखा था?'' वसुदेव ने पूछा।
''पर नहीं! वह सपना नहीं हो सकता।'' देवकी ने कहा, ''वह यहीं था, मेरे पास। मेरी नासिका में अभी तक उसकी वैजयंती माला के पुष्पों की गंध है। मेरे कानों में उसकी बाँसुरी के स्वर हैं। उसने छुआ भी था मुझे!...''
''तो तुम्हारा कृष्ण वंशी बजाता है?'' वसुदेव हँस पड़े, ''तुम्हें किसने बताया कि वह वंशी बजाता है? यादवों का राजकुमार वंशी बजाता है। वह ग्वाला है या चरवाहा कि वंशी बजाता है। तुमने कब देखा कि वह वैजयंती माला धारण करता है?''
''मैंने उसे देखा है।''
''सपने में ही देखा है न!'' वसुदेव बोले, ''साक्षात तो तुमने उसे उसी समय देखा था, जब एक मंजूषा में लेटा कर मैं उसे नंद के घर छोड़ने गया था।''
''सत्य कह रहे हैं आप। तभी देखा था।'' देवकी ने कहा, ''किंतु मैं भी सत्य कह रही हूँ, वह सपना नहीं था। वह आया था। उसने मेरे अश्रु पोंछे। बोला, ''मत रो माँ! मैं आ गया हूँ। अब मैं तुम्हारे साथ ही रहूँगा।'' मैंने कहा, ''पुत्र! तू यहाँ से चला जा। कंस को पता लग गया तो वह तुझे जीवित नहीं छोड़ेगा।'' ''तो क्या कहा उसने?''
उसने कहा, ''मैं उसे जीवित छोडूँगा तब तो।'' कैसी मधुर मुस्कान थी उसकी। मन हो रहा था कि उसका हाथ पकड़ कर यहीं बैठा लूँ उसे। किंतु विवेक कह रहा था कि उसे शीघ्र से शीघ्र विदा कर दूँ। भेज दूँ उसे यशोदा के पास, जहाँ वह आज तक सुरक्षित था।''
''तो फिर क्या किया तुमने? बैठा लिया या विदा कर दिया?''
''मैंने तो कुछ भी नहीं किया।'' देवकी कुछ उद्विग्न हो उठीं, ''उसने कहा, 'माँ! मैं जा नहीं सकता।'' ''क्यों?'' मैंने पूछा, ''क्या कंस ने तुम्हें भी बंदी कर यहाँ कारागार में डाल दिया है?'' वह हँस कर बोला, ''नहीं माँ! चिंता मत करो, कंस तो क्या, मुझे कोई भी बंदी नहीं कर सकता।'' ''तो फिर तुम जा क्यों नहीं सकते?' ''क्यों कि जाता तो वह है, जो आता है। मैं न आता हूँ, न जाता हूँ। मैं तो सदा रहता हूँ।'' ''सदा रहते हो तो दीखते क्यों नहीं?'' मैंने पूछा। ''जो देखना चाहता है, उसे दीखता हूँ माँ! तुमने मुझे देख लिया न!''
वसुदेव अपनी नींद पूरी कर चुके थे, किंतु अभी लेटे ही हुए थे। उन्हें देवकी का इस प्रकार चिहुँक कर उठ बैठना कुछ विचित्र-सा लगा।
''क्या हुआ?''
''कृष्ण कहाँ गया?''
वसुदेव ने अपनी आँखें पूरी तरह विस्फारित कीं, ''कृष्ण? कृष्ण हमारे पास था ही कब?''
''वह यहीं तो था मेरे पास...।'' और वे रुक गईं, ''तो मैंने स्वप्न देखा था क्या?''
''क्या देखा था?'' वसुदेव ने पूछा।
''पर नहीं! वह सपना नहीं हो सकता।'' देवकी ने कहा, ''वह यहीं था, मेरे पास। मेरी नासिका में अभी तक उसकी वैजयंती माला के पुष्पों की गंध है। मेरे कानों में उसकी बाँसुरी के स्वर हैं। उसने छुआ भी था मुझे!...''
''तो तुम्हारा कृष्ण वंशी बजाता है?'' वसुदेव हँस पड़े, ''तुम्हें किसने बताया कि वह वंशी बजाता है? यादवों का राजकुमार वंशी बजाता है। वह ग्वाला है या चरवाहा कि वंशी बजाता है। तुमने कब देखा कि वह वैजयंती माला धारण करता है?''
''मैंने उसे देखा है।''
''सपने में ही देखा है न!'' वसुदेव बोले, ''साक्षात तो तुमने उसे उसी समय देखा था, जब एक मंजूषा में लेटा कर मैं उसे नंद के घर छोड़ने गया था।''
''सत्य कह रहे हैं आप। तभी देखा था।'' देवकी ने कहा, ''किंतु मैं भी सत्य कह रही हूँ, वह सपना नहीं था। वह आया था। उसने मेरे अश्रु पोंछे। बोला, ''मत रो माँ! मैं आ गया हूँ। अब मैं तुम्हारे साथ ही रहूँगा।'' मैंने कहा, ''पुत्र! तू यहाँ से चला जा। कंस को पता लग गया तो वह तुझे जीवित नहीं छोड़ेगा।'' ''तो क्या कहा उसने?''
उसने कहा, ''मैं उसे जीवित छोडूँगा तब तो।'' कैसी मधुर मुस्कान थी उसकी। मन हो रहा था कि उसका हाथ पकड़ कर यहीं बैठा लूँ उसे। किंतु विवेक कह रहा था कि उसे शीघ्र से शीघ्र विदा कर दूँ। भेज दूँ उसे यशोदा के पास, जहाँ वह आज तक सुरक्षित था।''
''तो फिर क्या किया तुमने? बैठा लिया या विदा कर दिया?''
''मैंने तो कुछ भी नहीं किया।'' देवकी कुछ उद्विग्न हो उठीं, ''उसने कहा, 'माँ! मैं जा नहीं सकता।'' ''क्यों?'' मैंने पूछा, ''क्या कंस ने तुम्हें भी बंदी कर यहाँ कारागार में डाल दिया है?'' वह हँस कर बोला, ''नहीं माँ! चिंता मत करो, कंस तो क्या, मुझे कोई भी बंदी नहीं कर सकता।'' ''तो फिर तुम जा क्यों नहीं सकते?' ''क्यों कि जाता तो वह है, जो आता है। मैं न आता हूँ, न जाता हूँ। मैं तो सदा रहता हूँ।'' ''सदा रहते हो तो दीखते क्यों नहीं?'' मैंने पूछा। ''जो देखना चाहता है, उसे दीखता हूँ माँ! तुमने मुझे देख लिया न!''
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