केशीघाट वृन्दावन...
एक समय सखाओं के साथ "भगवान् श्रीकृष्ण" यहाँ गोचारण कर रहे थे।
सखा मधुमंगल ने हँसते हुए श्रीकृष्ण से कहा:-
प्यारे सखा! यदि तुम अपना मोरमुकुट, मधुर मुरलिया और पीतवस्त्र मुझे दे दो तो सभी गोप-गोपियाँ मुझे ही प्यार करेंगी तथा रसीले लड्डू मुझे ही खिलाएँगी।
तुम्हें कोई पूछेगा भी नहीं।
"भगवान् श्रीकृष्ण" ने हँसकर अपना मोरपंख, पीताम्बर, मुरली और लकुटी मधुमंगल को दे दी !
मधुमंगल गइठलाता हुआ इधर-उधर घूमने लगा।
इतने में ही महापराक्रमी केशी दैत्य विशाल घोड़े का रूप धारण कर "भगवान् श्रीकृष्ण" का वध करने के लिए हिनहिनाता हुआ वहाँ उपस्थित हुआ।
उसने महाराज कंस से सुन रखा था- जिसके सिर पर मोरपंख, हाथों में मुरली, अंगों पर पीतवसन देखो, उसे कृष्ण समझकर अवश्य मार डालना।
उसने सजे हुए मधुमंगल को देखकर अपने दोनों पिछले पैरों से आक्रमण किया।
"भगवान् श्रीकृष्ण" ने झपटकर पहले मधुमंगल को बचा लिया।
इसके पश्चात केशी दैत्य का वध किया।
मधुमंगल को केशी दैत्य के पिछले पैरों की चोट तो नहीं लगी, किन्तु उसकी हवा से ही उसके होश उड़ गये।
केशीवध के पश्चात वह सहमा हुआ तथा लज्जित होता हुआ "भगवान् श्रीकृष्ण" के पास गया तथा उनकी मुरली , मयूरमुकुट, पीताम्बर लौटाते हुए बोला- मुझे लड्डू नहीं चाहिए।
प्राण बचे तो लाखों पाये।
ग्वाल-बाल हँसने लगे।
आज भी केशीघाट "भगवान् श्रीकृष्ण" की इस लीला को अपने हृदय में संजोये हुए विराजमान है।
हरे कृष्णा
एक समय सखाओं के साथ "भगवान् श्रीकृष्ण" यहाँ गोचारण कर रहे थे।
सखा मधुमंगल ने हँसते हुए श्रीकृष्ण से कहा:-
प्यारे सखा! यदि तुम अपना मोरमुकुट, मधुर मुरलिया और पीतवस्त्र मुझे दे दो तो सभी गोप-गोपियाँ मुझे ही प्यार करेंगी तथा रसीले लड्डू मुझे ही खिलाएँगी।
तुम्हें कोई पूछेगा भी नहीं।
"भगवान् श्रीकृष्ण" ने हँसकर अपना मोरपंख, पीताम्बर, मुरली और लकुटी मधुमंगल को दे दी !
मधुमंगल गइठलाता हुआ इधर-उधर घूमने लगा।
इतने में ही महापराक्रमी केशी दैत्य विशाल घोड़े का रूप धारण कर "भगवान् श्रीकृष्ण" का वध करने के लिए हिनहिनाता हुआ वहाँ उपस्थित हुआ।
उसने महाराज कंस से सुन रखा था- जिसके सिर पर मोरपंख, हाथों में मुरली, अंगों पर पीतवसन देखो, उसे कृष्ण समझकर अवश्य मार डालना।
उसने सजे हुए मधुमंगल को देखकर अपने दोनों पिछले पैरों से आक्रमण किया।
"भगवान् श्रीकृष्ण" ने झपटकर पहले मधुमंगल को बचा लिया।
इसके पश्चात केशी दैत्य का वध किया।
मधुमंगल को केशी दैत्य के पिछले पैरों की चोट तो नहीं लगी, किन्तु उसकी हवा से ही उसके होश उड़ गये।
केशीवध के पश्चात वह सहमा हुआ तथा लज्जित होता हुआ "भगवान् श्रीकृष्ण" के पास गया तथा उनकी मुरली , मयूरमुकुट, पीताम्बर लौटाते हुए बोला- मुझे लड्डू नहीं चाहिए।
प्राण बचे तो लाखों पाये।
ग्वाल-बाल हँसने लगे।
आज भी केशीघाट "भगवान् श्रीकृष्ण" की इस लीला को अपने हृदय में संजोये हुए विराजमान है।
हरे कृष्णा
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